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Electric Propulsion इंजन बनाएंगे अंतरिक्ष यानों का सफर आसान, जानिए कैसे

Electric Propulsion इंजन बनाएंगे अंतरिक्ष यानों का सफर आसान, जानिए कैसे

विद्युत प्रणोदय इंजन (Electric Propulsion Engine) में जीनॉन या आयोडीन जैसी गैस के अणु आयान बनाकर यान को बल प्रदान करते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

विद्युत प्रणोदय इंजन (Electric Propulsion Engine) में जीनॉन या आयोडीन जैसी गैस के अणु आयान बनाकर यान को बल प्रदान करते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

विद्युत प्रणोदय इंजन (Electric Propulsion Engine) का अंतरिक्ष यानों (Spacecraft) का उपोयग अब तक केवल आशावान क्षेत्र ही था. अभी तक अंतरिक्ष में यानों के पहुंचने के बाद सुदूर यात्राओं के लिए ईंधन एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है. लेकिन इस तकनीक ने काफी उम्मीदें जगाई थी, जिसमें जीनॉन गैस को आयनीकृत करने से एक ऐसा प्रक्षेप बल (Thrust) पैदा होता है जो यानों को काफी तेज गति से आगे ले जा सकता है. अभी तक जीनॉन गैस इसके ईंधन के तौर पर इसकी संभावानाओं को काफी कम कर ही थी. लेकिन अब आयोडीन इंजन के अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रह पर आजमाने से यह क्षेत्र खुल गया है.

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    आज के अंतरिक्ष यानों (Spacecraft) को सूदूर यात्राओं के लिए बहुत अधिक ईंधन की जरूरत होती है जो एक बड़ी चुनौती है क्योंकि इतना अधिक ईंधन पृथ्वी से ले जाना बहुत मुश्किल काम है. इस समस्या का एक समाधान विद्युत का उपयोग कर जीनॉन (Xenon) के कणों को आयनीकृत करना हो सकता है. क्योंकि आयनीकृत जीनॉन के परमाणु एक प्रक्षेप बल (Thrust) पैदा कर अंतरिक्ष यान को बहुत तेजी से आगे बढ़ा सकता है. लेकिन जीनॉन एक दुर्लभ और महंगी गैस है. थ्रस्टमी कंपनी ने कक्षा में घूम रहे सौटेलाइट को आयोडीन गैस से विद्युत प्रणोदय इंजन (Electric Propulsion Engine) के जरिए संचालित कर इस क्षेत्र में बहुत सी संभावनाएं जगा दी हैं.

    जीनॉन गैस के साथ समस्याएं
    इस तकनीक से वैज्ञानिकों को बहुत आशाएं थी, लेकिन जीनॉन गैस के साथ बहुत सी समस्याएं थीं. महंगी होने साथ ही इस दुर्लभ गैस का भंडारण भी एक बड़ी समस्या है, लेकिन थ्रस्टमी के आयोडीन गैस के साथ सफल प्रयोग ने आशा जगाई है कि अब सैटेलाइट प्रणोदन तंत्र अब पहले से ज्यादा कारगर और वहनीय हो जाएंगे.

    आयोजीन जीनॉन से बेहतर
    ट्रस्टमी के सह संस्थापक और कंपनी के सीटीओ दिमित्रो राफलस्कायी का कहना है कि जीनॉन की तुलना में आयोडीन प्रचुर मात्रा में मिल जाता है और जीनॉन की तुलना में सस्ता भी है. इसके साथ एक और लाभ यह भी है इसे बिना किसी दबाव के ठोस रूप में भी रखा जा सकता है.

    भविष्य हैं ऐसे इंजन
    जहां इससे पहले के जमीन पर किए गए आयोडीन प्रणोदन इंजन के परीक्षणों ने काफी उम्मीदें जगाई है, अंतरिक्ष में इसका काम करना साफ तौर पर दर्शाता है कि ये भविष्य के छोटे पैमाने के  अंतरिक्ष यानों के इंजन हो सकते हैं. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हम इंसानों के अंतरिक्ष अवलोकन के कार्यक्रम अब आगे बढ़ सकते हैं.

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    इस उपलब्धि से भविष्य में सैटेलाइट (Satellite) उपयोग की तस्वीर बदल जाएगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    प्रयोग पूरी तरह से रहा सफल
    टीम ने आयोडीन का उपयोग ईंधन के तौर पर किया. 6 नवंबर 2020 को एनपीटी30-12 नाम के क्यूबसैट सैटेलाइट के इंजन में 20 किलो के आयोडीन ईंधन का उपयोग कर इस सैटेलाइट को प्रक्षेपित किया गया. यह प्रयोग पूरी तरह से सफल रहा और इसमें आयोडीन ने जीनॉन से ज्यादा आयानीकरण कारगरता भी दिखाई.

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    एक बड़ा फायदा यह भी
    अन्य लाभों  के साथ आयोडीन आधारित तंत्र आज के सौटेलाइट की तुलना में बहुत छोटे आकार और सरल रूप में बनाए जा सकते हैं. जीनॉन और अन्य प्रणोदकों के मुकाबले आयोडीन को गैस में बदलने से पहले उसका ठोस रूप में भंडारण किया जा सकता है यानि हमें भारी भारकम उच्च दबाव वाले गैस टैंकों की जरूरत नहीं पड़ेगी.

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    अगले एक दशक में हजारों सैटेलाइट (Satellite) प्रक्षेपित होने हैं और यह तकनीक उन्हें प्रभावित करेगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    तकनीक को किया बेहतर
    राफलस्कायी ने बताया, “एनपीटी30-12 का सफल प्रदर्शन का मतलब है कि आयोडीन प्रणोदय इंजन के विकास में हम अगले चरण की ओर बढ़ सकते हैं. अंतरिक्ष में हुए परीक्षण के साथ ही हमने नए समाधान भी विकसित किए हैं जिससे इन इंजन के कार्यनिष्पादन में इजाफा हुआ है और इस तकनीक को और बेहतर एवं कारगर बनाने के लिए भी कई नए प्रयोग किए हैं.

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    अगले दश में हजारों सैटेलाइट  पृथ्वी की कक्षा में प्रक्षेपित किए जाने हैं इसलिए उन्हें और कारगर और वहनीय बनाना बहुत जरूरी है यदि हमें पृथ्वी और ब्रह्माण्ड का अवलोकन करते रहना चाहते हैं. फिर भी आयोडीन इंजन वाले सैटेलाइट के साथ कुछ चुनौतियां भी  हैं आयोडीन में जंग लग सकती है. यानि सैटेलाइट के अन्य हिस्सों को आयोडीन से रक्षा की जरूरत भी पड़ेगी. यह अध्ययन नेचर में प्रकाशित हुआ है.

    Tags: Research, Science, Space

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