नए शोध ने पृथ्वी पर पानी के पहले स्रोत पर डाला प्रकाश, जानिए क्यों है यह खास

नए शोध ने पृथ्वी पर पानी के पहले स्रोत पर डाला प्रकाश, जानिए क्यों है यह खास
पृथ्वी पर पानी कैसे आया इस पर शोध का कहना है कि जरूरी नहीं यह बर्फीले स्रोत से ही आया हो. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

एक ताजा अध्ययन में पाया गया है कि वे अंतरिक्षीय जैविक पदार्थ (Interstellar Organic Matter) भी पृथ्वी (Earth) पर पानी (Water) के स्रोत हो सकते हैं जिनमें बर्फ (Ice) नहीं हैं.

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पृथ्वी (Earth) पर पानी (Water) कैसे आया इस बारे में बहुत से मत हैं लेकिन इस मामले में वैज्ञानिकों में सहमति नहीं हैं. ताजा अध्ययन ने इस मामले में एक नई रोशनी डाली है. वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि अगर अंतरिक्ष में मौजूद जैविक पदार्थ (Interstellar organic matter) को गर्म किया जाए तो वह बड़ी मात्रा में पानी पैदा कर सकता है. इस पड़ताल से वैज्ञानिकों को लगता है कि जैविक पदार्थ ही पृथ्वी पर पानी के पहले स्रोत हो सकते हैं.

क्या है प्रचलित धारणा
कई सक्रिय अध्ययन कहते हैं कि पृथ्वी पर हाइड्रस सिलिकेट (hydrous silicates) वाले पानी बर्फीले पुच्छल तारों और उल्कापिंडों के जरिए आया था. ये पिंड हिम रेखा (snow line) के बाहर थे. हिम रेखा वह सीमा ही है जिसके आगे बर्फ कम तापनाम के कारण संघनित हो सकती है. हाल के कुछ अध्ययनों में एक अलग तरह का मत सामने आया है जो उल्कापिंड से पानी आने वाले मत के विपरीत है, लेकिन यह पूर्व की धारणा को बदलने की स्थिति में नहीं है.

बर्फ ही स्रोत हो जरूरी नहीं
होकाइदो यूनिवर्सीटी की प्लैनेटरी वैज्ञानिक अकीरा कोउची का कहना है, “इस मामले में बर्फ और सिलिकेट की तुलना में अब तक जैविक पदार्थ पर बहुत कम ध्यान दिया गया था. जबकि हिम रेखा के पहले ही काफी प्रचुर मात्रा में पानी है. साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित वर्तमान शोध में अकीरा कोउची की अगुआई वाले वैज्ञानिकों के एक समूह ने दर्शाया कि अंतरिक्ष के जैविक पदार्थ को बहुत ज्यादा गर्म करने पर उससे बहुत ज्यादा मात्रा में पानी और तेल निकल सकता है. इससे पता चला है कि पानी हिमरेखा के पहले ही पैदा हो सकता है, जिसके लिए हिमरेखा के बाहर से पुच्छल तारों या फिर उल्कापिंडों के योगदान की जरूरत नहीं है.



Earth
पृथ्वी पर पानी के पहले स्रोत के बारे में बहुत सारे मत प्रचलित हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


कैसे किया अध्ययन
सबसे पहले शोधकर्ताओं ने अंतरिक्षीय अणुओं के बादलों में मौजूद एक जैविक पदार्थ के जैसा पदार्थ बनाया. इसके लिए उन्होंने रासायनिक रिएजेंट्स (Chemical Reagents) का उपयोग किया. यह पदार्थ बनाने के लिए शोधर्ताओं ने अंतरिक्षीय जैविकों के विश्लेषणात्मक आंकड़ों की मदद ली. यह जैविक पानी, कार्बनमोनोऑक्साइड, और अमोनिया के मिश्रण पर पराबैंगनी किरणों को डालने से बना था, जो प्राकृतिक प्रक्रिया की नकल से बना था.

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जैविक पदार्थ का उच्च तापमान में बर्ताव
इसके बात उन्होंने इस जैविक पदार्थ के अनुरूप पदार्थ को उच्च दाब की स्थितियों में  धीरे-धीरे  24 डिग्री से 400 डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म किया. सौ डिग्री तक पदार्थ समरूप रहा, सके बाद 200 डिग्री पर वह दो अवस्थाओं में बंट गया. 350 डिग्री के आसपास पानी की बूंदे स्पष्ट दिखने लगीं और तापमान के साथ उनका आकार भी बढ़ने लगा, लेकिन 400 डिग्री के बाद  पानी की बूंदों के साथ काला तेल भी बनने लगा.

Comet
प्रचलित मत है कि हमारी पृथ्वी पर पानी पुच्छल तारे से आया था. (प्रतीकात्मक तस्वीर))


इस समूह ने इस तरह के प्रयोग कई तरह के जैविक पदार्थों पर किया जिसमें भी नतीजे के तौर पर पानी और तेल निकला. इनके एब्जॉर्ब्शन स्पैक्ट्रम के अध्ययन से पता चला कि पानी वाले हिस्से में प्रमुख तत्व शुद्ध पानी था. वहीं तेल के रासायनिक विश्लेषण से पता चला कि उसमें वहीं गुण हैं जो पृथ्वी के नीचे से क्रूड तेल मिलता है.

क्या मायने निकले अध्ययन के
अकीरा का कहना है कि उनके नतीजे दर्शाते हैं कि अंतरिक्षीय जैविक पदार्थ जो बर्फीली स्थिति में नहीं हैं उनमें भी पृथ्वी के लिए पानी के प्रचुर स्रोत होने की भरपूर संभावना है. इसके अलावा जो अजैविक तेल बना है वह यह बताता है कि पृथ्वी में जितना सोचा गया है उससे कहीं अधिक पैट्रोलियम के स्रोत हो सकते हैं.

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अकीरा को विश्वास है कि जापान का क्षुद्रग्रह का अन्वेषण यान हायाबासु-2 (Hayabasu-2) इस साल के अंत तक  जो क्षुद्रग्रह रियूगू (Ryugu) से नमूने लेकर आएगा. उससे पृथ्वी पर पानी आने के बारे में बेहतर समझ विकसित हो सकेगी.
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