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कोरोना वायरस से जुड़े इन 11 सवालों का अब तक नहीं मिल पाया है सही जवाब

कोरोना वायरस से जुड़े इन 11 सवालों का अब तक नहीं मिल पाया है सही जवाब

दुनियाभर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता अभी भी कोरोना वायरस से संंबंधित कई सवालों के जवाब नहीं ढूंढ पाए हैं.

दुनियाभर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता अभी भी कोरोना वायरस से संंबंधित कई सवालों के जवाब नहीं ढूंढ पाए हैं.

वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की तमाम कोशिशों के बाद भी कोरोना वायरस (Coronavirus) से जुड़े ऐसे बहुत से सवाल हैं, जिनका अब तक कोई सटीक जवाब नहीं मिल पाया है. इनमें संक्रमितों की असली संख्‍या से लेकर वैक्‍सीन (Corona Vaccine) बनने के समय तक से संबंधित सवाल हैं.

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    दुनियाभर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता कोरोना वायरस (Coronavirus) से जुड़े हर सवाल का जवाब ढूंढने में जुटे हैं. फिर भी अब कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनका कोई एक या ठोस जवाब नहीं (Unanswered) मिल पाया है. इनमें सबसे बड़ा सवाल संक्रमितों की वास्‍तविक संख्‍या से जुड़ा है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अब तक दुनियाभर में 43.44 लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें 2.92 लोगों की मौत हो चुकी है. संक्रमितों में 14 लाख से ज्‍यादा मरीज सिर्फ अमेरिका (US) में ही हैं, जिनमें 83.42 हजार लोगों की मौत हो गई है.

    दुनियाभर के विशेषज्ञों का मानना है कि ये संक्रमितों और मरने वालों की वास्‍तविक संख्‍या नहीं है. उनका कहना है कि सरकारें कोरोना वायरस के कारण होने वाली मौतों का आकलन सही तरीके से नहीं कर रही हैं. कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक, ज्‍यादातर देश में कोविड-19 की वजह से अस्‍पतालों में होने वाली मौतों की गणना तो कर रहे हैं, लेकिन घरों या केयर होम्‍स में मरने वाले लोगों पर ध्‍यान ही नहीं दिया जा रहा है. कोविड-19 के वास्‍तविक असर का आकलन करने के लिए इन पर भी ध्‍यान देना जरूरी है. आईए जानते हैं कि इसके अलावा और कौन से सवाल हैं, जिनके सही जवाब अब तक नहीं मिल पाए हैं...

    >> कोरोना टेस्टिंग की संख्‍या को लेकर अलग-अलग देशों के अपने-अपने दावे हैं. कुछ देशों का कहना है कि उन्‍होंने पर्याप्‍त टेस्‍ट किए हैं. साथ ही कोरोना संक्रमितों के संपर्क में आए लोगों को तलाशने को लेकर सटीक जवाब मिलना थोड़ा मुश्किल है. शुरुआत से कहा जा रहा है कि कोरोना वायरस को काबू करने के लिए टेस्टिंग और ट्रेसिंग पर ध्‍यान देना जरूरी है. वहीं, इस सवाल का जवाब भी नहीं मिल पाया है कि प्रति 10 लाख लोगों पर कितने कोरोना टेस्‍ट करना पर्याप्‍त होगा.

    सोशल डिस्‍टेंसिंग के नियमों को लेकर अब तक स्‍पष्‍टता नहीं है.


    >> सोशल डिस्‍टेंसिंग को लेकर भी कोई स्‍पष्‍ट नियम अब तक तय नहीं हो पाया है. शुरुआत में कहा कि संक्रमण से बचने के लिए करीब 1 मीटर की दूरी पर्याप्‍त है. फिर कहा गया कि कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए 6 फिट की दूरी बनाए रखें. इसके बाद पता चला कि छींकने या खांसने से 8.5 मीटर की दूरी तक वायरस फैल सकता है. वहीं, यह भी स्‍पष्‍ट नहीं है कि किस जगह पर कितने लोगों का एकसाथ रहना ठीक माना जाएगा. भारत में कुछ ऑफिस खुल गए हैं. ऐसे में ये तय होना जरूरी है कि प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में कितने लोग किस तरह बैठ या खड़े हो सकते हैं.

    >> अभी तक देखने में आ रहा है कि कुछ देशों में कोरोना वायरस का असर काफी कम है तो कहीं मृत्‍यु दर बहुत ज्‍यादा है. यही नहीं, एक ही देश के किसी राज्‍य में संक्रमण फैलने की रफ्तार और मृत्‍यु दर काबू में है तो कहीं बहुत ज्‍यादा है. जैसे जापान के टोक्‍यो की स्थिति अमेरिका के न्‍यूयॉर्क सिटी से बेहतर है. बता दें कि टोक्‍यो की आबादी न्‍यूयॉर्क सिटी के मुकाबले ज्‍यादा घनी है. वहीं, दोनों शहरों का मौसम लगभग एकजैसा है. टोक्‍यो में लोग सार्वजनिक वाहनों का ज्‍यादा इस्‍तेमाल करते हैं.

    >> कोरोना वायरस पर मौसम के असर को लेकर अब तक वैज्ञानिक व शोधकर्ता कुछ भी साफ तौर पर नहीं कह पाए हैं. कभी कहा जाता है कि मौसम गर्म होने के साथ वायरस निष्क्रिय हो जाएगा तो कभी कहा जा रहा है कि इसका कोई असर नहीं होगा. अगर गर्मी, तेज रोशनी और आर्द्रता से कोरोना वायरस खत्‍म हो सकता तो लुसियाना, इक्‍वाडोर और सिंगापुर में इतने लोग संक्रमित नहीं होते. इन सभी देशों में रोज का तापमान 80 डिग्री फारेनहाइट से ज्‍यादा और ह्यूमिडिटी 60 फीसदी से ऊपर रहती है.

    कोरोना वायरस से इम्‍युनिटी को लेकर वैज्ञानिक कुछ भी साफ तौर पर कहने को तैयार नहीं हैं.


    >> वैज्ञानिक व स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ पुख्‍ता तौर पर नहीं पा रहे हैं कि अगर कोई एक बार संक्रमण से उबर जाता है तो वो कोरोना वायरस से इम्‍यून हो जाएगा. दरअसल, दुनियाभर में कुछ प्रतिशत लोगों के संक्रमण से उबरने के बाद फिर कोरोना पॉजिटिव पाए जाने पर वैज्ञानिकों को नए सिरे से सोचने पनर मजबूर होना पड़ा है. अब वैज्ञानिकों का कहना है कि संक्रमण से उबरने के बाद आपकी वायरस के खिलाफ इम्‍युनिटी कुछ दिन बाद ही खत्‍म हो सकती है. कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि ये इम्‍युनिटी, हफ्तों, महीनों या सालों तक भी रह सकती है.

    >> वैक्‍सीन बनने के समय को लेकर अभी कुछ भी कहना आसान नहीं है. आप सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है कि 12 या 18 महीने में कोविड-19 की वैक्‍सीन तैयार हो जाएगी. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बारे में कुछ भी कहना फिलहाल जल्‍दबाजी ही होगा. अब तक सबसे तेजी से वैक्‍सीन बनाए जाने का रिकॉर्ड भी 4 साल का है. स्‍टुअर्ट थॉमसन का कहना है कि इसमें 6 महीने से लेकर 16 साल तक का वक्‍त लग सकता है. केजर फैमिली फायउंडेशन में ग्‍लोबल हेल्‍थ पॉलिसी के एसोसिएट डायरेक्‍टर जॉश मिशॉद का कहना है कि इस साल के आखिर तक या अगले साल तक भी वैक्‍सीन आने की उम्‍मीद जताना बहुत ज्‍यादा आशावादी होने जैसा है.

    >> एक तरफ वैक्‍सीन आने के समय को लेकर अस्‍पष्‍टता है तो दूसरी ओर अब तक इसका कोई कारगर उपाय भी नहीं ढूंढा जा सका है. अब तक दुनियाभर में डॉक्‍टर्स अलग-अलग दवा या दवाइयों के कॉम्बिनेशन का क्‍लीनिकल ट्रायल ही कर रहे हैं. कुछ देशों में मलेरिया की दवा हाइड्रॉक्‍सीक्‍लोरोक्‍वीन को कोरोना वायरस के इलाज में प्रभावी माना जा रहा है तो कहीं डॉक्‍टर्स मलेरिया, एचआईवी और इंफ्लुएंजा की दवाइयों को मिलाकर ट्रीटमेंट कर रहे हैं. ब्रिटेन में पैरासिटामोल को इलाज में सहायक दवा के तौर पर जमकर इस्‍तेमाल किया गया. वहीं, कई जगह अभी भी अलग-अलग दवाइयों के इस वायरस पर असर को लेकर शोध चल रहा है.

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    वैक्‍सीन बनने के समय और दवाई ढूंढे जाने को लेकर अब तक पुख्‍ता तौर पर कुछ भी नहीं कहा गया है.


    >> कोरोना के गंभीर संक्रमितों के इलाज में वेंटिलेटर की जरूरत पर डॉक्‍टर्स एकमत नहीं हैं. कुछ डॉक्‍टरों का मानना है कि वेंटिलेटर्स से मरीजों की हालात तेजी से खराब हो रही है और ऐसे मरीजों की मृत्‍यु दर ज्‍यादा है. वहीं, कुछ डॉक्‍टरों का कहना है कि गंभीर मामलों में वेंटिलेटर बहुत जरूरी है. इसके बाद पूरी दुनिया में सस्‍ते वेंटिलेटर्स बनाने की होड़ सी मच गई.

    >> शुरुआत में कहा गया कि बच्‍चे कोरोना वायरस से सुरक्षित हैं. फिर इस दिशा में कई शोध किए गए कि आखिर बच्‍चों को संक्रमण क्‍यों नहीं हो रहा है. इसके बाद अचानक बच्‍चों में भी संक्रमण के मामले सामने आने लगे. हालांकि, ज्‍यादातर बच्‍चे बड़ों के मुकाबले मामूली तौर पर बीमार हुए और जल्‍द ठीक हो गए, लेकिन ये साफ हो गया कि बच्‍चे भी संक्रमित हो सकते हैं. हालांकि, अभी भी इस पर शोध चल रहे हैं कि बच्‍चे संक्रमण को आगे फैला सकते हैं या नहीं.

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