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जानिए क्यों खास है रूस का नए प्रिचल डॉकिंग मॉड्यूल

जानिए क्यों खास है रूस का नए प्रिचल डॉकिंग मॉड्यूल

यह डॉकिंग मॉड्यूल अब तक का सबसे उन्नत रूसी मॉड्यूल बताया जा रहा है.  (प्रतीकात्मक तस्वीर: NASA)

यह डॉकिंग मॉड्यूल अब तक का सबसे उन्नत रूसी मॉड्यूल बताया जा रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: NASA)

रूस (Russia) का नया प्रिचल (Prihal) डॉकिंग मॉड्यूल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) से जुड़ गया है. इस भविष्य के स्पेस स्टेशनों के लिहाज से क्रांतिकारी साबित हो सकता है. इसमें स्पेस स्टेशन के हिस्सों से जुड़ने की तकनीक में नई डिजाइन अपनाई गई है जिससे उसमें डॉकिंग क्षमताओं में खासा विस्तार हो गया है. इसमें छह मॉड्यूल जुड़ सकते हैं जिसमें से पांच पर नए अंतरिक्ष यान जुड़ सकते हैं.

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    देरूस (Russia) का नया  ‘डॉकिंग मॉड्यूल’ (Docking Module) शुक्रवार को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से जुड़ गया है. इसे दो दिन पहले रूस के कजाकिस्तान स्थित बैकोनूर प्रक्षेपण केंद्र से इसे प्रक्षेपित किया गया था. यह यूरोपीय समयानुसान शुक्रवार को सुबह 10.19 पर आईएसएस से सफलतापूर्वक जुड़ गया. प्रिचल (Prichal) नाम का यह  उन्नत मॉड्यूल आईएसएस के नौका मॉड्यूल के पृथ्वी की ओर मुंह करने वाले हिस्से से जुड़ा है. प्रिचल के बारे में बताया जा रहा है कि यह भविष्यमें अंतरिक्ष स्टेशनों के लिए नए आयाम खोल सकता है. प्रिचल स्पेस स्टेशन के रूसी हिस्से को पांच अतिरिक्त डॉकिंग पोर्ट प्रदान करेगा और अंतरिक्ष में स्थायी रूप से रहने वाली संरचना का परीक्षण करेगा.

    अब मिल सकेंगे विकल्प
    इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के अनुरूप बनाने के लिए उसेरूसी हिस्से को मूल रूप से यूनिवर्सल डॉकिंग मॉड्यूल के  हिसाब से डिजाइन करने की जरूरत थी. लेकिन यूडीएम से ही रूस ने एक नया नौका मॉड्यूल विकसित किया. जिससे रूस हिस्से को विस्तार के विकल्प मिल सकेगें. प्रिचल (जो रुसी भाषा में पियर यानी स्तंभ का शब्द है) पुरानी रूसी डिजाइन से अलग है, जिसमें खासतौर पर गोलाकार डॉकिंग हिस्सा है जिससे दूसरे अन्य मॉड्यूल भी जुड़े हुऐ हैं.

    एक अलग तरह की डिजाइन
    अभी तक होता यह था है कि सभी मॉड्यूल  एक मुख्य या कोर मॉड्यूल से जुड़े होते थे. जिससे कोर मॉड्यूल खराब होने पर सभी  दूसरे मॉड्यूल को हटाना जरूरी हो जाता था भले ही वे सुचारू रूप से काम ही क्यों ना कर रहे हों. लेकिन अब नोड मॉड्यूल के जुड़ने से अब किसी भी मॉड्यूल को बदला जा सकता है, लेकिन इसके लिए बाकी मॉड्यूल हटाना जरूरी नहीं होगा. प्रिचल रूस के लिए ऐसे ही नोड मॉड्यूल का काम करेगा.

    अलग है इसका महत्व
    रूस का पहले इरादा ऐसा मॉड्यूल बनाने का था जो बाद में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से स्वतंत्र हो जाएगा लेकिन इस साल रोसकोसमोस ने ऐलान किया कि अब उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है, बल्कि वह पूरा का पूरा नया ही रूसी स्पेस स्टेशन प्रक्षेपित करेगा. वहीं अब इस बात की संभावना कम ही है कि भविष्य में प्रिचल से कोई नया मॉड्यूल जुड़ सकेगा. फिर भी कई लिहाज से मॉड्यूल अनोखा है.

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    प्रिचल अब इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा. (तस्वीर: @Space_Station)

    डॉकिंग प्रक्रिया में मिश्रित तकनीक
    प्रिचल एक गोलाकार मॉड्यूल है जिसमें कुछ छह डॉकिंग पोर्ट हैं. इनमें दो अक्ष पर हैं और चार रेडियल दिशाओं में हो सकते हैं. इसमें एंड्रोफोगस पेरिफेसर अटैचमेंट सिस्टम और प्रोब एवं ड्रोग सिस्टम की मिश्रित डिजाइन है. इनमें शुरुआती जुड़ाव विस्तारित कैप्चर रिंग की जगह प्रोब एंड ड्रोग तकनीक से  होता है. इस हाइब्रिड सिसटम का उद्देश्य बड़े और स्थायी माड्यूल जोड़ने की संभावना बनाना है.

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    स्थायी रूप से होगा इसका उपयोग
    प्रिचल की एक खास बात यह भी है कि वह नौका में ईंधन पहुंचाने का काम भी  कर सकता है. . प्रिचल अब नौका से हमेशा के लिए जुड़ा रहेगा. इस मॉड्यूल से उम्मीद की जा रही है कि इससे रूस के वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही पृथ्वी की कक्षा से संबंधित शोध में बहुत ज्यादा इजाफा हो सकेगा. फिरभी इससे सुयोज और प्रोग्रेस जैसे यानों के लिए उपयोग में लाया जा सकेगा.

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    इससे पहले प्रिचल (Prichal) को रूस के स्पेस स्टेशन के साथ प्रक्षेपित करने की योजना बनाई गई थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: NASA/ Roscomos)

    और रोबोटिक भुजाओं के लिए खास सॉकेट भी
    प्रिचल में लायाप्पा भुजाओं के लिए सॉकेट्स हैं जो छोटी रोबोटिक भुजाएं हैं जिनसे मॉड्यूल को एक डॉकिंग पोर्ट से दूसरे पोर्ट पर पहुंचाया जा सकता है. जिससे भविष्य में आने वाले यानों को डॉकिंग में एक दूसरे पोर्ट से जुड़ने में असुविधा हो तो दूसरे किसी पोर्ट को खाली किया जा सके और वहां पहले से जुड़े यान को दूसरी पोर्ट पर जोड़ा जा सके.

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    प्रिचल इससे पहले के प्रस्तावित रूसी स्पेस स्टेशन ऑर्बिटल पायलटेड असेंबली एंड एक्सपेरिमेंट  कॉम्पलेक्स के साथ प्रक्षेपित किया जाना था.  इसका उद्देश्य चंद्रमा, मंगल और शनि ग्रह के लिए मानव अभियानों की मदद करने योग्य बनाए जाना था. लेकिन बाद में इस अभियान को रद्द कर दिया गया था.

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