क्रांतिकारी साबित हो सकता है बाह्यग्रहों के अध्ययन का नया तरीका

अब नई पद्धति से पृथ्वी (Earth) के आकार के बाह्यग्रहों (Exoplanet) की खोज हो सकेगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

अब नई पद्धति से पृथ्वी (Earth) के आकार के बाह्यग्रहों (Exoplanet) की खोज हो सकेगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

वैज्ञानिकों ने ऐसा तरीका विकसित किया है जिससे वे सीधे बाह्यग्रहों (Exoplanets) की तस्वीरों को लेकर जीवन के अनुकूलता वाले ग्रहों (Habitable Planets) का गहराई से अध्ययन कर सकते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 11, 2021, 3:30 PM IST
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बाह्यग्रहों (Exoplanet) से हमारे शोधकर्ताओं को पृथ्वी (Earth) से  बाहर जीवन के संकेत (Signs of life) मिलने की बहुत उम्मीद रहती है, लेकिन इन बाह्यग्रहों का अध्ययन बहुत ही मुश्किल होता है. अब खगोलविदों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने ऐसे क्षमताएं विकसित कर ली हैं कि जीवन की संभावना (Possibility of life) वाले इन ग्रहों की पृथ्वी के टेलीस्कोप (Telescope) के जरिए ही तस्वीर ली जा सकेगी जिनकी खोज करना ही अब तक बहुत ही मुश्किल काम माना जाता है.

क्या होते हैं बाह्यग्रह

हमारे सौरमंडल के बाहर के किसी तारे काचक्कर लगाने वाले ग्रह जो अपने तारे से इतनी दूरी पर हैं जिससे वहां जीवन के होने या पनपने की संभावना प्रबल रहती हो, वह ग्रह बाह्यग्रह की श्रेणी में रखे जाते हैं. इन ग्रहों पर जीवन के लिए आवश्यक जरूरी स्थितियां होने की अनुकूलता होती है जैसे कि ये पथरीले ग्रह होते हैं. इनमें पानी तरल अवस्था में हो सकता है और यहां तक कि वायुमंडल की मौजूदगी भी संभव होती है.

ऐसे अवलोकित किया जा सकता था अब तक
अब तक इन ग्रहों को पृथ्वी से आपने तारे के सामने आने पर एक धब्बे के तौर पर देखा जा सकता था और इनकी खोज की अब तक यही प्रक्रिया रही है. लेकिन नेचर कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित अध्ययन बताता है कि अब इन ग्रहों की तस्वीरों को खींचा जा सकता है. शोधकर्ताओं ने मिड इनफ्रारेड एक्सोप्लैनेट इमेजिंग के लिए एक नया सिस्टम बनाया है जिसमें लंबे समय तक के अवलोकन का उपोयग भी किया जाएगा.

हैबिटेबल ग्रहों की खोज हो सकेगी संभव

शोधकर्ताओं का कहना है कि अब जमीन पर ही लगे टेलीस्कोपों के जरिए जरिए अब तारों के पास के हैबिटेबल जोन में पाए जाने पृथ्वी से तीन गुना बड़े ग्रहों की सीधी तस्वीरों को हासिल किया जा सकता है. अभी तक खगोलविद केवल गुरू ग्रह या उससे बड़े आकार के बाह्यग्रहों की ही खोज हो सकती थी. ऐसे ग्रह या तो अपने तारे के पास होते हैं या फिर बहुत दूर, लेकिन बीच की जगह जो हैबिटेबल जोन कही जाती है, वहां के ग्रह नहीं देखे जा सकते थे.



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बाह्यग्रहों (Exoplanet) का अब तक अप्रत्यक्ष तरीके से ही अध्ययन हो सकता था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay) (तस्वीर: @NASAExoplanets)


इन ग्रहों का अध्ययन जरूरी

ऐरीजोना यूनिवर्सिटी के स्टीवर्ड वेधशाल में नासा के हबल फैलोशिप कार्यक्रम के सीगन फैलो और इस अध्ययन के प्रथम लेखक केविन वैग्नर का कहना है कि यदि हम जीवन के अनुकूल स्थितियों वाले ग्रहों को खोजना चाहते हैं तो हमें पृथ्वी के आकार के पथरीले ग्रहों को उनके तारों की हैबिटेल जोन में खोजना होगा.

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इन तरंगों का अध्ययन

इस अध्ययन में बताई गई पद्धति बाह्यग्रहों की सीधे अवलोकन करने वाली अब तक कि पिछली पद्धतियों से दस गुना ज्यादा बेहतर हैं. बहुत सारे अध्ययन दस माइक्रोन से कम की इनफ्रारेड तरंगदैर्ध्य का अध्ययन करते हैं. इससे वे तरंगे अवलोकित नहीं होती जहां ये ग्रह सबसे ज्यादा चमकते हैं.

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बाह्यग्रह (Exoplanet) का अध्ययन बहुत ही मुश्किल काम होता है क्यों कि उनकी खुद की कोई चमक नहीं होती.  (प्रतीकात्मक तस्वीर: @ESO)


यह बाधा भी

इसकी वजह यह है कि पृथ्वी भी इस तरह की तरंगों को उत्सर्जित करती है, वहीं दूसरे इंफ्रारेड उत्सर्जन भी इसमें बाधा डालते हैं. लेकिन इसी तरंगदैर्ध्य वाली तरंगों से पृथ्वी जैसे ग्रह मिल सकते हैं. टीम ने चिली स्थित यूरोपीय साउदर्न वेधशाला के वेरी लार्ज टेलीस्कोप (VLT) का उपोयग कर हमारे सूर्य के सबसे पास के तारे एल्फासेंचुरी के तीन तारों के सिस्टम का अध्ययन किया जिसमें तीन तारे  हैं.

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इस सिस्टम के तीसरे तारे एल्फा सेंचुरी सी का एक पृथ्वी से लगभग दो गुना आकार का ग्रह चक्कर लगाता है. इसके बारे अप्रत्यक्ष तौर पर ही जानकारी मिली है. लेकिन इन पद्धतियों से इस तारे और सिस्टम के दो अन्य तारों की हैबिटेबल जोन के ग्रह नहीं पता लग सके हैं. शोधकर्ताओं काकहना है कि उनकी नई पद्धतियों से अब वे इन सीमाओं को तोड़ सकेंगे. उन्होंने इसका उपयोग कर अल्फासेंचुरी का अवलोकन शुरू भी कर दिया है.
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