Explained: न्यूजीलैंड ने कैसे खुद को भूकंपरोधी बनाया हुआ है?

न्यूजीलैंड का क्राइस्टचर्च शहर सैलानियों को लगातार आकर्षित करता रहा है

न्यूजीलैंड का क्राइस्टचर्च शहर सैलानियों को लगातार आकर्षित करता रहा है

भूकंप के झटके झेलते देश न्यूजीलैंड ने साल 2011 में क्राइस्टचर्च में आए भूकंप (New Zealand Christchurch earthquake 2011) से बड़ा सबक लिया. अब वहां कड़े सुरक्षा मानकों पर इमारतें तैयार हो रही हैं.

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साल की शुरुआत में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल हाउसिंग टेक्नोलॉजी चैलेंज इंडिया (GHTC-India) के तहत देश के छह राज्यों में लाइट हाउस प्रोजेक्ट की बात की. इसके तहत राज्यों के चुनिंदा शहरों में भूकंपरोधी हल्के मकान बनाए जाएंगे. इसके लिए न्यूजीलैंड से प्रेरित होने की भी बात हुई कि उस देश ने अपने यहां भूकंपरोधी संसद से लेकर आम इमारतें बना रखी हैं. इसकी वजह ये है कि न्यूजीलैंड भी अपनी भौगोलिक संरचना के कारण आएदिन भूकंप के झटके झेलता रहा है.

मलबा बन गया एक पूरा शहर
इस देश में हालिया सबसे बड़ा भूकंप साल 2011 की फरवरी में आया था. क्राइस्टचर्च नामक शहर में आए इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6.3 थी और इसकी गहराई जमीन से महज 5 किलोमीटर रही होगी. झटका इतना शक्तिशाली था कि खूबसूरत शहर की लगभग सारी इमारतें टूटफूट गईं और लगभग 1,240 घरों की नींव इतनी कमजोर हो गईं कि उन्हें गिराना पड़ा. हादसे में 185 लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें काफी सारे लोग क्राइस्टचर्च घूमने आए सैलानी भी थे.

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न्यूजीलैंड अपनी भौगोलिक संरचना के कारण आएदिन भूकंप के झटके झेलता रहा है (Photo- news18 English via Reuters representative image)

पुर्ननिर्माण किया गया 


इस घटना के बाद से ही न्यूजीलैंड ने भूकंप को लेकर काफी गंभीरता से सोचना शुरू किया. सबसे पहले तो मलबे में बदल चुके शहर क्राइस्टचर्च के दोबारा निर्माण के लिए भारी-भरकम राशि लगाई गई. ऑकलैंड.एसी.एनजेड के मुताबिक इस दौरान लगभग 40 मिलियन डॉलर की राशि इमारतों के दोबारा निर्माण पर लगी. साथ ही ये अनुमान लगाया गया कि भूकंप के कारण अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हुआ है, उसे भरने में 50 से 100 साल भी लग सकते हैं.

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इसके बाद शुरू हुआ शोध का सिलसिला
मेलबर्न यूनिवर्सिटी के मुताबिक पैसिफिक प्लेट और ऑस्ट्रेलिया-इंडिया प्लेट की टेक्टोनिक प्लेट के मिलन पर न्यूजीलैंड बसा हुआ है. ऐसे में पुराने तरीके से बनी इमारतें मामूली झटके से भी धराशायी हो सकती हैं. ये खतरा केवल क्राइस्टचर्च नहीं, बल्कि पूरे देश पर था. यही देखते हुए नए सिरे से भूकंपरोधी मकानों का निर्माण शुरू हुआ.

चर्च सबसे कमजोर इमारतों में शामिल 
इस दौरान चर्चों के निर्माण को भी नजरअंदाज नहीं किया गया और उन्हें भी तोड़कर नए सिरे से बनाया गया. इसकी वजह ये है कि इस देश में अधिकतर चर्च पुराने और काफी विशाल थे, जिनमें भीतर की ओर सपोर्ट के लिए कोई दीवार नहीं थी.

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क्राइस्टचर्च की लगभग 1,240 घरों की नींव इतनी कमजोर हो गईं कि उन्हें गिराना पड़ा


इन यूनिवर्सिटीज ने मिलकर किया शोध
यूनिवर्सिटी ऑफ ऑकलैंड, यूनिवर्सिटी ऑप कैंटबरी और न्यूजीलैंड के भूकंप रिसर्च सेंटर QuakeCoRE ने मिलकर लैब में किया किया. इस दौरान नई तकनीक के साथ दोमंजिला ऐसे घर बनाने में सफलता मिली जो भूकंप के हल्के से लेकर रिक्टर स्केल पर 7 तीव्रता भी झेल सकें.

प्रोजेक्ट को रॉकिंग वॉल्स नाम दिया गया
प्रोजेक्ट की सफलता को जांचने के लिए इमारतों को कंपन से गुजारा गया. इस दौरान देखा गया कि इमारतों को कोई नुकसान नहीं हुआ है. इसके बाद प्रयोग के दूसरे चरण के दौरान इमारतों को और झटके दिए गए जो क्राइस्टचर्च में आए भूकंप से भी कई गुना ज्यादा था. इस दौरान भी इमारतों में हल्की दरारें ही दिखीं.

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इसके बाद से न्यूजीलैंड में पुरानी इमारतों की जगह ये भूकंपरोधी इमारतें ले रही हैं. यहां की संसद भी इसी फॉर्मूला पर रिस्ट्रक्चर की गई. अब यहां जो भी इमारतें बन रही हैं, वो कड़े सुरक्षा मानकों के आधार पर तैयार हो रही हैं ताकि आने वाले समय में कभी क्राइस्टचर्च हादसा न दोहराया जाए.

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भूकंपरोधी बनाने के लिए कई देश डोम-शेप मकान बनाने पर भी जोर दे रहे हैं (Photo- cal earth)


मेहराब की तरह घर भी बन रहे 
वैसे भूकंपरोधी बनाने के लिए कई देश डोम-शेप मकान बनाने पर भी जोर दे रहे हैं. कैलीफोर्निया के आर्किटेक्ट नादर खलीलीने इस खास घर का प्रस्ताव दिया था. साल 1984 में नादर खलीली ने सबसे पहले नासा (NASA) से अपनी बातचीत में एक ऐसा घर सुझाया जो मंगल ग्रह की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मजबूती से खड़ा रह सकता है और इसके भीतर रहने वाले सुरक्षित रहेंगे. कैलअर्थसंस्था की मदद से बनाए जा रहे इन घरों के बारे में कहा जा रहा है कि प्रकृति से तालमेल बनाकर तैयार होने की वजह से ये घर बेहद मजबूत होते हैं.

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लगभग 500 सालों तक टिके रहेंगे इस फॉर्मूला पर बने घर
इसके निर्माण में रेत के बोरों का इस्तेमाल होता है, जिसके साथ मिट्टी और चूना जैसी बेसिक चीजें लगती हैं. ग्रेविटी के सिद्धांत के साथ अपने मेहराब के आकार और रेत के बोरों को खास तरीके से रखे जाने की वजह से तूफान या भूकंप में भी इस घर के टूटने-फूटने का न्यूनतम डर रहता है. यही वजह है मकान के बारे में दावा है कि इनपर भूकंप, आग और तूफान का कोई असर नहीं होता और ये लगभग 500 सालों तक बिना किसी मरम्मत के रहेंगे.
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