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दुनिया में पहली बार स्‍टेम सेल के जरिये नवजात शिशु के लिवर ट्रीटमेंट में मिली सफलता

News18Hindi
Updated: May 23, 2020, 9:22 AM IST
दुनिया में पहली बार स्‍टेम सेल के जरिये नवजात शिशु के लिवर ट्रीटमेंट में मिली सफलता
जापान के डॉक्‍टर्स ने कृत्रिम भ्रूण के स्‍टेम सेल्‍स की मदद से नवजात शिशु के लिवर सेल्‍स ट्रीटमेंट में सफलता हासिल कर ली है.

जापान के डॉक्टरों को लिवर की बीमारी से पीड़ित एक नवजात शिशु में स्‍टेम सेल (Stem Cells) प्रतिरोपण करने में सफलता मिली है. इसके बाद जब शिशु 6 महीने का हो गया तो उसे उसके पिता से मिला लिवर प्रत्‍यारोपण (Liver Transplant) कर अस्‍पताल से छुट्टी दे दी गई.

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जापान के डॉक्टरों को एक नवजात शिशु में एम्ब्रियोनिक स्टेम सेल (Embryonic Stem Cells) से निकाली गईं लिवर की कोशिकाओं के प्रतिरोपण में सफलता मिल गई है. दुनिया में पहली बार हुए इस तरह के लिवर सेल ट्रांसप्‍लांट (Liver Cell Transplant) ने जानलेवा बीमारियों में नवजात बच्चों (Infants) के इलाज के नए विकल्‍पों को लेकर उम्‍मीद जगा दी है. दरअसल, इस बच्चे को यूरिया साइकिल डिसऑर्डर था. इसमें लिवर जहरीली अमोनिया को तोड़कर शरीर से बाहर नहीं निकाल पाता है.

डॉक्‍टर्स इस बात को लेकर चिंतित थे कि 6 दिन के बच्चे का लिवर ट्रांसप्‍लांट करना जोखिम भरा रहता है. डॉक्‍टर्स के मुताबिक, शिशुओं के पांच महीने की उम्र में 6 किलो वजन होने पर ही लिवर ट्रांसप्‍लांट किया जा सकता है. ऐसे में जापान (Japan) के नेशनल सेंटर फॉर चाइल्ड हेल्थ एंड डेवलपमेंट के डॉक्टर्स ने 6 दिन के बच्चे के बड़े होने तक एक ब्रिज ट्रीटमेंट (Bridge Treatment) की कोशिश की. उन्होंने एम्ब्रियोनिक स्टेम सेल से लिए गए 19 करोड़ लिवर सेल बच्चे के लिवर के ब्लड वेसल्‍स में इंजेक्‍ट कर दिए.

शिशु का इलाज के बाद ब्‍लड अमोनिया कंसंट्रेशन में नहीं हुई वृद्धि
स्‍टेम सेल के जरिये किए गए इलाज के बाद शिशु में ब्लड अमोनिया कंसंट्रेशन में वृद्धि नहीं हुई. इसके बाद लिवर ट्रांसप्‍लांट के लिए बच्‍चे की सही उम्र होने का इंतजार किया गया. बाद में पिता से लिवर लेकर बच्‍चे में प्रतिरोपण किया गया. फिर जन्म के छह महीने बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. नेशनल सेंटर के मुताबिक, इस ट्रायल की सफलता ने दिखा दिया कि लिवर की बीमारी के मरीजों के लिए मानव एम्ब्रियोनिक स्टेम सेल्‍स का इस्तेमाल सुरक्षित है.



स्‍टेम सेल ट्रीटमेंट की वजह से छोटे बच्चों को लिवर ट्रांसप्‍लांट के लिए बड़े होने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा.




बच्‍चों को लिवर ट्रांसप्‍लांट के लिए नहीं करना होगा ज्‍यादा इंतजार
सेंटर ने बताया कि यूरोप और अमेरिका में लिवर सेल ब्रेन डेड डोनर्स से निकालने के बाद उपलब्ध हो जाते हैं, लेकिन जापान में इनकी आपूर्ति सीमित है. न्‍यू एटलस की रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी वजह से छोटे बच्चों के इलाज में मुश्किलें रहती हैं. उन्हें लिवर ट्रांसप्‍लांट के लिए बड़े होने का इंतजार करना पड़ता है. एम्ब्रियोनिक सेल्‍स को फर्टिलाइज्ड अंडों से निकाला जाता है. हालांकि, भ्रूण (Embryo) के शोध के लिए इस्तेमाल करने पर सवाल खड़े हो गए हैं. दरअसल, शोध के बाद भ्रूण नष्‍ट हो जाते हैं. जापान का नेशनल इंस्टीट्यूट को नए इलाज ढूंढने के लिए एम्ब्रियोनिक सेल्‍स को बनाने की अनुमति दी गई है.

7 साल पहले मानव स्‍टेम सेल अलग करने में मिली थी सफलता
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 16 मई 2013 को पहली बार मानव स्‍टेम सेल (Human Stem Cell) का क्‍लोन बनाने में सफलता हासिल की थी. इसे मेडिकल क्षेत्र में बड़ी कामयाबी माना गया था. तब वैज्ञानिकों ने पहली बार क्लोन किए गए इंसानी भ्रूण (Cloned Embryo) से स्टेम सेल यानि मूल कोशिका निकालने में सफलता हासिल की थी. काफी समय से वैज्ञानिक मानव के क्लोन किए गए भ्रूण से स्टेम सेल निकालने की कोशिश कर रहे थे. पहले ये माना जा रहा था कि कोशिकाएं (Cells) बनने की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही इलाज के लिए बनाए जाने वाले कृत्रिम भ्रूण का विकास रुक जाता है. बता दें कि स्टेम सेल खुद को शरीर की किसी भी कोशिका में ढाल सकते हैं. इसलिए वैज्ञानिक इसे निकालने की कोशिशों में लगातार जुटे थे.

वैज्ञानिक काफी समय से कोशिश कर रहे हैं कि पार्किंसन, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, रीढ़ में चोट और आंखों की रोशनी के इलाज में स्‍टेम सेल का इस्तेमाल किया जा सके.


कई तरह की गंभीर बीमारियों में इस तकनीक का होगा इस्‍तेमाल
वैज्ञानिक काफी समय से कोशिश कर रहे हैं कि पार्किंसन, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, रीढ़ में चोट और आंखों की रोशनी के इलाज में स्‍टेम सेल का इस्तेमाल किया जा सके. प्रत्यारोपण में ये आशंका बनी रहती है कि शरीर बाहरी अंग को स्वीकार नहीं करे. इसलिए वैज्ञानिकों ने मरीज के खुद के डीएनए की क्लोनिंग करके स्टेम सेल बनाने का फैसला किया. इस प्रक्रिया के तहत सोमेटिक सेल न्यूक्लियर ट्रांसफर तकनीक के जरिये मरीज का डीएनए खाली अंडाणु में डाला जाता है.

स्‍टेम सेल से बनाई जा सकती हैं हृदय की मांसपेशियां और हड्डी भी
वैज्ञानिकों ने साल 1996 में इसी तकनीक का इस्‍तेमाल कर पहली बार डॉली भेड़ का क्लोन बनाया था. डॉली पहली स्तनपायी प्राणी थी, जिसे क्लोन करके बनाया गया था. वैज्ञानिकों ने क्लोन किए गए भ्रूण को स्टेम सेल के स्रोत के तौर पर इस्तेमाल किया, जिससे हृदय की नई मांसपेशी, हड्डी, मस्तिष्क के ऊतक और शरीर की अन्य कोशिकाएं तैयार की जा सकती हैं.

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First published: May 23, 2020, 9:22 AM IST
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