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आंखें कमजोर होने पर चश्‍मा लगाने की जरूरत खत्‍म, ऐसे बदले जा सकते हैं प्राकृतिक लेंस

 शोध के नतीजे चिकित्सा, खेल, ड्राइविंग जैसे क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी है.  (प्रतीकात्मक तस्वीर)

शोध के नतीजे चिकित्सा, खेल, ड्राइविंग जैसे क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

बढ़ती उम्र में लोगों को प्रेसबायोपिया (Presbyopia) की समस्‍या होने लगती है. इसमें बारीक अक्षर देख पाने की क्षमता कम होने लगती है. प्रेसबायोपिया में आंखों के प्राकृतिक लेंस सख्त होने लगते हैं. इससे लेंस अपनी लचक और दूरी बरकरार रखने की पूरी क्षमता खो देते हैं. डॉक्‍टरों ने इसको दुरुस्‍त करने का तरीका खोज निकाला है.

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    आंखें शरीर का वो सबसे अहम अंग हैं, जिनके जरिये हम दुनिया और उसकी खूबसूरती को देख पाते हैं. इसलिए शरीर के इस नाजुक अंग को सहेजकर रखना बहुत जरूरी है. अव्‍यवस्थित जीवनशैली और खानपान के चलते लोगों की आंखों की रोशनी कम (Weak Eyesight) हो रही है. इस कमी को ज्‍यादातर लोग चश्मे (Eyeglasses) या कॉन्टैक्ट लेंस (Contact Lenses) के जरिये संतुलित कर लेते हैं. कुछ लोग चश्मे और लेंस के झंझट से बचने के लिए लेसिक सर्जरी (Laser surgery) भी करा लेते हैं. वहीं, जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, चश्‍मे के लेंस मोटे होते जाते हैं. बढ़ती उम्र में लोगों को प्रेसबायोपिया (Presbyopia) की समस्‍या होने लगती है. प्रेसबायोपिया में आंखों के प्राकृतिक लेंस सख्त होने लगते हैं. अभी तक यह पता नहीं चल सका है कि ऐसा क्यों होता है? हालांकि, ये पता चल चुका है कि लेंस अपनी लचक और दूरी बरकरार रखने की पूरी क्षमता खो देते हैं.

    प्रेसबायोपिया उम्र के साथ होने वाली फोकस करने की क्षमता का कम होना है. ज्यादातर लोग 40 साल की उम्र के बाद प्रेसबायोपिया के कारण लोगों को छोटे प्रिंट साफ-साफ देखने में परेशानी होने लगती है. दुनिया भर में 2011 तक करीब 1.3 अरब लोग प्रेसबायोपिया के मरीज पाए गए थे. यह संख्या 2020 के आखिर तक बढ़कर 2.1 अरब होने की उम्मीद है. जब किसी को प्रेसबायोपिया हो जाता है तो वह अपने स्मार्टफोन, किताबें, पत्रिकाओं को सही से पढने के लिए आंखों से दूर रखता है. यह अस्थायी और आंशिक समाधान है.

    अब वैज्ञानिक आंख के डिजिटल मॉडल से लचकदार इंप्लांट बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं.


    पास, दूर और मध्‍यम दूरी की नजर ठीक करता है कृत्रिम लेंस
    प्रेसबायोपिया का कोई भी मरीज सर्जरी के जरिये सख्त हो चुके प्राकृतिक लेंस को कृत्रिम लेंस से बदलवा सकता है. हालांकि, डॉक्‍टरों के मुताब‍िक कृत्रिम लेंस से भी बेहतर है कि इंसान के क्रिस्टलाइन लेंस (Crystalline lens) के व्यवहार की नकल तैयार की जाए. कृत्रिम लेंस पास, दूर और मध्यम दूरी की नजर को ठीक करता है, लेकिन खुद को माहौल के मुताबिक ढालने के लिहाज से बेहतर विकल्‍प नहीं है. वैज्ञानिक अब एक ऐसा उपकरण विकसित करना चाहते हैं, जो कृत्रिम लेंस के आकार को प्राकृतिक तरीके से बदले. विशेषज्ञों के मुताबिक, अकोमोडेटिव लेंस (Accomodative Lens) ही भविष्य हैं. ये इंसानी आंख के युवा क्रिस्टलाइन लेंस के फंक्शन दोहरा सकते हैं. लेजर तकनीक की मदद से सर्जन आंख की भीतरी बनावट को समझते हैं और सबसे सही बैठने वाले लेंस का चुनाव करते हैं.

    हर व्‍यक्ति के मुताबिक लेंस डिजाइन करने पर चल रहा है काम
    वैज्ञानिक पर्सनलाइज्ड इंट्राओकुलर लेंस (Personalized Intraocular Lens) बनाने की दिशा में भी काम कर रहेे हैं. इसके जरिये डाटा लिया जाएगा और हर मरीज के मुताबिक लेंस डिजाइन किया जा सकेगा. आंख के डिजिटल मॉडल से लचकदार इंप्लांट बनाए जा सकेंगे. इंप्लांट पुराने क्रिस्टलाइन लेंस को बदलेगा और उसी की तरह आंख की मांसपेशियों से जुड़ेगा. यह कनेक्शन मांसपेशियों की ताकत से लेंस में लचक पैदा करेगा. यह सतह को आकार देगा और फिर डॉक्टर आसानी से फोकल प्वाइंट बदल सकेंगे. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो ना तो चश्‍मा लगाने चाहते हैं और ना ही लेजर सर्जरी करना चाहते हैं. उनके लिए इंप्लांटेबल कॉन्टैक्ट लैंस (ICL) बेहतर विकल्प हो सकता है. आईसीएल बहुत पतला लेंस होता है, जिसे आंख की पुतली के पीछे प्राकृतिक लेंस के आगे लगाया जाता है.

    जो लोग ना तो चश्‍मा लगाने चाहते हैं और ना ही लेजर सर्जरी करना चाहते हैं. उनके लिए आईसीएल बेहतर विकल्प हो सकता है.


    आंखों के अंदरूनी भाग में बिना छेड़े लगाया जाता है आईसीएल
    इंप्लांटेबल कॉन्टैक्ट लैंस सामान्‍य कॉन्टैक्ट लैंस की तरह दिखाई नहीं देता है. हालांकि, ये कॉन्टैक्ट लेंस की तरह ही काम करता है. इसकी सबसे खास बात यह है कि इसमें आंखों के अंदरूनी भाग में कोई छेड़छाड़ नहीं की जाती. इसे 20 साल से ज्‍यादा उम्र का कोई भी व्‍यक्ति लगवा सकता है. यह बहुत ही सामान्य प्रक्रिया है, जिसमें महज 20 मिनट लगते हैं. हालांकि, इसमें एक बार में एक आंख में ही लेंस लगाया जाता है. दूसरी आंख में लेंस लगाने की प्रक्रिया के लिए कम से कम दो दिन का अंतराल जरूरी होता है. अगर व्‍यक्ति चाहे तो बाद में इसे हटवा भी जा सकता है. मोतियाबिंद के इलाज में आईसीएल को हटा ही दिया जाता है. आईसीएल को डॉक्‍टर्स काफी सुरक्षित मानते हैं. साथ ही इसके रखरखाव के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं होती है.

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