वैक्यूम क्लीनर की तरह चीजें नहीं खीचता है ब्लैक होल, विशेषज्ञ ने तोड़े मिथक

एक विशेषज्ञ ने ब्लैकहोल (Black Hole) के बारे में कई मिथकों को तोड़ने वाली जानकारी लोगों को दी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: ESO)
एक विशेषज्ञ ने ब्लैकहोल (Black Hole) के बारे में कई मिथकों को तोड़ने वाली जानकारी लोगों को दी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: ESO)

ब्लैकहोल (Black Hole) के बारे में फिल्मी फंतासी फिल्मों में सही तस्वीर पेश नहीं की है. इस तरह के कई मिथक को एक भारतीय विशेषज्ञ ने तोड़ा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 29, 2020, 1:58 PM IST
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इस साल विज्ञान जगत में ब्लैक होल (Black Hole) खूब चर्चा में रहा है. इसकी वजह भौतिकी (Physics) में नोबेल पुरस्कार (Nobel Przie) ब्लैक होल के काम पर दिया जाना भी रहा. इस साल भौतिकी में तीन वैज्ञानिकों को भौतिकी में नोबोल पुरस्कार दिए गए. इस साल ब्लैकहोल संबंधी कई अहम खोज भी हुईं. इस साल के भौतिकी में दिए गए नोबेल पुरस्कार और ब्लैकहोल पर हुए व्याख्यान में इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स के निदेशक सोमक रायचौधरी (Somak Raychaudhury) ने बताया कि ब्लैक होल की विज्ञानी फंतासी फिल्मों सही तस्वीर पेश नहीं की गई है.

वैक्यूम क्लीनर की तरह नहीं होता है ब्लैक होल
मुंबई के नेहरू साइंस सेंटर में संस्कृति मंत्रालय के ‘द नोबेल प्राइस 2020: फिजिक्स अनरिवीलिंग द मिथिकल ब्लैकहोल’ पर अपने व्याख्यान की शुरुआत ब्लैकहोल के बारे में मिथकों को तोड़ने के लिए रायचौधरी का कहना है कि बहुत सी विज्ञान फंतासी फिल्मों में ब्लैक होल को वैक्यूम क्लीनर की तरह पदार्थ को खींच लेने वाला बताया है जो कि सच नहीं है.

ब्लैकहोल बनने पर पृथ्वी को निगल लेगा सूर्य
रायचौधरी ने अपने व्याख्यान में बताया कि कैसे न्यूटन से लेकर अब तक विभिन्न समय के वैज्ञानिकों ने ब्लैकहोल की बेहतर समझ विकसित करने में मदद की. उन्होंने ब्लैक होल के बारे में एकमिथक की  मिसाल देते हुए बताया कि अगर हमारा सूर्य ब्लैकहोल में बदल जाता है तब भी पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती रहेगी और सूर्य दूसरे ग्रहों की नहीं निगलेगा. बस केवल इतना ही होगा कि सूर्य से कोई प्रकाश नहीं आएगा और पृथ्वी बहुत ही ठंडी हो जाएगी. लेकिन तब भी वह सूर्य का चक्कर लगाती रहेगी.



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इस बार तीन लोगों को भैतिकी (Physics) में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) ब्लैक होल से संबंधित शोध के लिए दिया गया. . (तस्वीर: NASA_JPL-Caltec)


तीन वैज्ञानिकों को मिला नोबोल पुरस्कार
इस साल तीन वैज्ञानिकों में से रोजर पेनरोज को उनके ब्लैकहोल के निर्माण और सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत के बीच संबंध की खोज के लिए चुना गया, वहीं एंड्रिया गेज और रेनहार्ड गेंजेल को हमारे गैलेक्सी के केंद्र में सुपरमासिव ब्लैक के केंद्र में की खोज के लिए चुना गया था.

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नोबेल पुरस्कार का कोलकाता संबंध
राय चौधरी ने अपने व्याख्यान के दौरान ब्लैक होल के लिये दिए गए नोबेल पुरस्कार का कोलकाता से संबंध के बारे में भी बताया. उन्होंने बताया कि अपने ब्लैक होल के अध्ययन के दौरान स्टीफन हॉकिन्स और रोजर पेनरोज दोनों ने उस फ़ॉर्मिलज्म का उपयोग किया था जो 1955 में अमलकुमार रायचौधरी ने स्थापित किया था. अमलकुमार कलकत्ता यूनिवर्सीटी के आशुतोष कॉलेज में फिजिक्स के प्रोफेसर थे.

क्या है वह संबंध
अमलकुमार के उस समय के आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांतपर रिलेटिविस्टिक कॉस्मोलॉजी पेपर 1 में वैसे तो ब्लैकहोल का जिक्र नहीं था, लेकिन हॉकिंन्स और पेनरोज ने उस शोधपत्र में जिक्र डिफ्रेंशियल ज्यामिति का उपयोग कर यह व्याखाया की थी कि कैसे एक घूमते तारे का स्पेस टाइम में विकृत होकर विध्वंस होता है और अंततः वह सिंग्युलरिटी की अवस्था को प्राप्त होता है.इसी के जरिए हॉकिंस ने सिंग्युलरिटी को स्वाभाविक बताया था. इसी का उल्लेख नोबेल प्राइज कमेटी ने इस साल किया था.

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ब्लैक होल (Black Hole) के बारे में कोई भी जानकारी हासिल करना बहुत ही मुश्किल काम होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


ब्लेैकहोल के दो प्रमुख भाग
रायचौधरी ने बताया कि सिंग्युलरीटी और इवेंट होरइजन ब्लैक हो के दो मूल भाग हैं. सिंग्युलरिटी केंद्र में होती है जहां भार केंद्रित होता है. हॉकिंस और पेनरोज ने सिंग्युलरिटी पर पहला शोधपत्र लिखा था. सिंग्युलरिटी वह स्थान होता है जहां किसी खगोलीय पिंड का भार और ग्रैविटेशनल फील्ड सामान्य सापेक्षता के अनुसार अनंत यानि इंफिनिटी हो जाती है. यहां पर स्पेस टाइम के सामान्य सिद्धांत नाकाम हो जाते हैं.

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रायचौधरी ने यह भी बताया कि कैसे किसी ब्लैक होल के बारे में जानकारी हासिल की जाती है जबकि उसससे किसी तरह कोई प्रकाश तक नहीं आता है साथ ही उन्होंने यह भी जानकारी दी कि ऑप्टिक्स की नई तकनीकों ने कैसे ब्लैक होल की तस्वीरें लेना तब संभव बनाया जब अंतरिक्ष की धूल के कारण उसके आसपास की चीजें देखना भी कितना मुश्किल होता है.
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