कैसे सिर्फ 7 घंटे में रेगिस्तान को बदला जा सकता है खेती के मैदान में?

अब दुबई के रेगिस्तान हरे-भरे खेतों से लहलहाने जा रहे हैं- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)
अब दुबई के रेगिस्तान हरे-भरे खेतों से लहलहाने जा रहे हैं- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

आसान-सी तकनीक के जरिए दुबई की रेतीली जमीन में खेती (farming in desert of Dubai) की शुरुआत हो चुकी है. लिक्विड नैनोक्ले (Liquid Nanoclay) तकनीक काफी किफायती भी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 22, 2020, 3:40 PM IST
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तकनीक की मदद से अब दुबई के रेगिस्तान हरे-भरे खेतों से लहलहाने जा रहे हैं. जी हां, नॉर्वे की एक कंपनी ने दुबई के बंजर इलाकों में ये प्रयोग शुरू भी कर दिया है. मार्च में रेतीली जगहों पर शुरू हुई इस खेती के नतीजे किसी को भी हैरान कर सकते हैं. वहां अनाज में बाजरा से लेकर फूल-सब्जियां जैसे तरबूज और तोरई के खेत तैयार हो गई. यानी इसमें केवल 5 महीने लगे. कंपनी का दावा है कि वे महज 7 घंटों में रेगिस्तानी जमीन को खेती-लायक बना सकते हैं. जानिए, क्या है वो तकनीक, जो रेगिस्तान को बना सकती है हराभरा.

किसने की शुरुआत
स्कैंडिनेवियाई देश नॉर्वे के एक स्टार्टअप ने ये अहम खोज की. डेजर्ट कंट्रोल (Desert Control) नाम से इस स्टार्टअप का मकसद दुनिया को हरा-भरा बनाना है. कपंनी ने सबसे पहले रेगिस्तान पर फोकस किया. वो ये समझने की कोशिश करने लगी कि कैसे रेतीली जगह पर पेड़-पौधे लगाएं जाएं. इसमें नॉर्वे के ही वैज्ञानिक क्रिश्चियन ओलिसन की खोज में काफी मदद की. साल 2000 में वैज्ञानिक ओलिसन ने एक खास तकनीक तैयार की थी. ये बंजर इलाकों में भी फसल उगा सकती है.

desert into farmland
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में रेतीली जमीन होने के कारण फसलें नहीं के बराबर होती हैं- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

तकनीक का नाम है- लिक्विड नैनोक्ले


इसके तहत क्ले यानी चिकनी मिट्टी को तरल बनाया जाता है. मिट्टी इतनी तरल हो जाती है, जैसे पानी हो. इसे रेत या फिर रेतीली जमीन पर छिड़का जाता है. जमीन के भीतर पहुंचने के बाद ये अपना काम शुरू कर देता है. नैनोक्ले रेत से चिपक जाता है. इससे पानी और पेड़-पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्व ऊपर की ओर इकट्ठा हो जाते हैं. अब ये जमीन फसल उगाए जाने के लिए तैयार है. इस पूरी प्रक्रिया में केवल 7 घंटे लगते हैं.

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आधी हो जाती है पानी की जरूरत
सीएनएन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक डेजर्ट कंट्रोल कंपनी का ये भी दावा है कि इस तकनीक से न सिर्फ रेतीली जगहों पर फसल उगा सकते हैं, बल्कि पेड़-पौधों को आधे पानी में ही पूरा पोषण मिल जाता है. जमीन को खेती-लायक बनाने के लिए नैनोक्ले का जो छिड़काव होता है, वो सिंचाई की किसी भी प्रचलित तकनीक से हो सकता है.

प्रयोग की शुरुआत दुबई से
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में रेतीली जमीन होने के कारण फसलें नहीं के बराबर होती हैं. यहां तक कि वो 90% से ज्यादा अनाज और सब्जियां दूसरे देशों से मंगाता है. यही देखते हुए नॉर्वे की कंपनी ने साल 2108 में वहां काम की शुरुआत की. इसके लिए दुबई इंटरनेशनल सेंटर फॉर बायोसलाइन एग्रीकल्चर (ICBA) से कंपनी ने साझेदारी की ताकि दुबई में लैब तैयार हो सकें.

नॉर्वे और दुबई की इस कोशिश को दूसरे देशों के वैज्ञानिक भी सराह रहे हैं- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


चल रहे हैं फील्ड टेस्ट
इसके बाद फील्ड टेस्ट की शुरुआत हुई. हालांकि कोरोना संक्रमण के कारण लैब अस्थायी तौर पर बंद हो चुके हैं लेकिन फील्ड टेस्ट अब भी जारी है. ICBA के डायरेक्टर जनरल Ismahane Elouafi के मुताबिक पूरी तरह से बंजर जगहों पर बाजरा और सब्जियों की खेती हो रही है. और अगर रिजल्ट इसी तरह से रहा तो नैनोलिक्विड तकनीक यूएई जैसे रेगिस्तानी देशों के लिए काफी काम की साबित होगी.

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नॉर्वे और दुबई की इस कोशिश को दूसरे देशों के वैज्ञानिक भी सराह रहे हैं. ब्रिटेन के कृषि वैज्ञानिक और क्रेनफील्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जैकलिन हन्नाम के मुताबिक ये तकनीक बहुत क्रांतिकारी साबित हो सकती है. वे कहती हैं कि ये सही है कि चिकनी मिट्टी वाली जमीन में पानी और पोषक तत्व ज्यादा समय और ज्यादा मात्रा में रहते हैं. ये खेती के लिए कारगर हो सकता है. दूसरी ओर वे डर जताती हैं कि रेगिस्तान की जमीन में क्ले मिलाने की कोशिश इकोसिस्टम पर खराब असर भी डाल सकती है.

बंजर जगहों पर बाजरा और सब्जियों की खेती हो रही है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


पर्यावरण की सुरक्षा सबसे ऊपर
इकोसिस्टम को कोई नुकसान न हो, ये पक्का करने को कोशिश के तहत नॉर्वे की कंपनी ने दुबई की कंपनी ICBA से करार किया, जो अपने देश के लिए संवेदनशील है और ये पक्का कर रही है कि खेती करने की कोशिश में रेतीली जमीन को कोई नुकसान न हो. महज 7 घंटों में रेतीली जमीन को खेती योग्य बनाने वाली ये तकनीक किफायती भी है. इसके लिए हर 11 स्क्वायर फीट पर 150 से 400 रुपए तक खर्च करने पड़ सकते हैं. ये इस बात पर निर्भर है कि जमीन कितनी रेतीली है.

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बिना मिट्टी के भी खेती
एक तरफ रेत में खेती हो रही है तो दूसरी ओर बिना मिट्टी के भी खेती की जा रही है. इसे हाइड्रोपोनिक फार्मिंग कहते हैं. भारत में भी शहरी इलाकों में ये तरीका काफी चल निकला है. इसके तहत फल-सब्जियां उगाई जा रही हैं. यदि हम बिना मिट्टी के ही पेड़-पौधों को किसी और तरीके से पोषक तत्व उपलब्ध करा दें तो वे फल-फूल सकते हैं.

हाइड्रोपोनिक फार्मिंग इनडोर तकनीक है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


इसके तहत पौधों और चारे वाली फसलों को नियंत्रित परिस्थितियों में 15 से 30 डिग्री सेल्सियस ताप पर लगभग 80 से 85 प्रतिशत आर्द्रता में उगाया जाता है. इससे फ्लैट में या घर में भी बिना मिट्टी के पौधे और सब्जियां आदि उगाई जा सकती हैं. पानी में लकड़ी का बुरादा, बालू या कंकड़ों को डाल दिया जाता है और पौधों के लिये आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने के लिये एक खास तरीके का घोल डाला जाता है. ये घोल कुछ बूंदों के तौर पर महीने में एक या दो बार ही डाला जाता है. देखा गया है कि इस तकनीक से पौधे मिट्टी में लगे पौधों की अपेक्षा 20-30% बेहतर तरीके से बढ़ते हैं. इसकी वजह ये है कि पानी से पौधों को सीधे-सीधे पोषण मिट्टी जाता है और उसे मिट्टी में इसके लिए संघर्ष नहीं करना होता.
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