पराली और पटाखे ही नहीं, इन कारणों से भी जहरीली हुई दिल्ली की हवा

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Updated: November 9, 2018, 11:06 AM IST
पराली और पटाखे ही नहीं, इन कारणों से भी जहरीली हुई दिल्ली की हवा
दिल्ली और एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण के लिए केवल एक दो नहीं बल्कि कई कारण जिम्मेवार हैं

दिल्ली और एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण के लिए केवल एक दो नहीं बल्कि कई कारण जिम्मेवार हैं

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  • Last Updated: November 9, 2018, 11:06 AM IST
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दिल्ली और एनसीआर में केवल पराली जलाने या फिर आतिशबाजी से ही वायु प्रदूषण ही नहीं बढ़ता बल्कि इसके पीछे और भी कई कारण हैं. एक वजह दिल्ली और आसपास के इलाकों की भौगोलिक स्थिति भी है.

पिछले दिनों एक वैज्ञानिक शोध के जरिए दिल्ली और एनसीआर में वायु प्रदूषण की तमाम वजहें जानने की कोशिश की गई. ये बात सही है कि दिल्ली में जाड़ों के साथ ही पराली जलाए जाने और दीवाली पर पटाखों से वायु प्रदूषण की स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है. आइए जानते हैं कि और किन-किन कारणों से दिल्ली में प्रदूषण बढ़ जाता है.

भौगोलिक स्थिति
उत्तर भारत के मैदानी इलाके एक तरफ से हिमालय से घिरे हुए हैं. ये लैंड लॉक्ड हिस्सा है. यहां हवा की गति कम हो जाती है. इससे जहरीली हवा बाहर नहीं निकलती. दक्षिण भारत में हवा का प्रवाह तेज रहता है. दोनों तरफ समुद्र होने के कारण हवा में गति रहती है और प्रदूषण का उतना असर देखने को नहीं मिलता.

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लकड़ी और गोबर के उपलों से खाना बनाना
उत्तर भारत के गंगा बेसिन में देश की करीब 40 प्रतिशत आबादी रहती है. यहां ज्यादातर लोग आज भी लकड़ी और गोबर से बने उपलों से चूल्हा जलाकर खाना बनाते हैं. इससे काफी प्रदूषण फैलता है.
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दिल्ली में वायु प्रदूषण के चलते फैला स्मॉग


वाहनों और बिजली संयंत्रों में इजाफा
नासा के आंकड़ों के मुताबिक, 2005 से 2014 के बीच दक्षिण एशिया में वाहनों, बिजली संयंत्रों और अन्य उद्योगों से नाइट्रोजन डाइऑक्साइड भारी मात्रा में निकली. इसमें सबसे अधिक बढ़ोत्तरी गंगा के मैदानी इलाकों में दर्ज की गई. उसी अंतराल में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों में काफी इजाफा हुआ. इससे हवा में सल्फर डाइऑक्साइड की मात्रा दोगुनी हो गई.

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वाहन और बढ़ते बिजली संयंत्र भी वायु प्रदूषण में इजाफा कर रहे हैं


हवाओं में घुलने वाली धूल
प्रदूषण पर मौसम का असर भी प्रत्यक्ष तौर पर देखा जा सकता है. मार्च से जून के बीच थार रेगिस्तान की धूल तेज हवाओं में घुल जाती है. सर्दियों में धूल, धुआं, नमी सबकुछ घुल-मिल कर प्रदूषण को चरम पर पहुंचा देते हैं.

कितनी पराली जलती है 
सर्दियों से ठीक पहले धान की फसल कटती है. खेतों को साफ करने के लिए किसान पराली (धान कटने के बाद बचा हुआ हिस्सा) जला देते हैं. आंकड़ों के मुताबिक देशभर में करीब 50 करोड़ टन पराली निकलती है. इसमें से करीब 9 टन पराली खेतों में जला दी जाती है. यह चलन पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक देखने को मिलता है.

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रिसर्च के मुताबिक पराली जलाने से सतह पर ओजोन का स्तर बढ़ जाता है. ये हमारी सेहत के साथ-साथ खेती के लिए भी खतरनाक है.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी (आईआईटी), कानपुर की एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदूषण सड़कों पर उड़ने वाली धूल से हो रहा है. वाहनों से निकलने वाले धुएं का नंबर तो उसके बाद आता है. पीएम10 (पीएम यानि पर्टिक्युलेट मैटर, ये हवा में वो पार्टिकल होते हैं जिस वजह से प्रदूषण फैलता है) में सबसे ज्यादा 56 फीसदी योगदान सड़क की धूल का है. जबकि पीएम 2.5 में इसका हिस्सा 38 फीसदी है. नगर निगमों और डेवलपमेंट प्राधिकरणों की कामचोरी से सड़कों पर धूल जमा है.


एयरोसोल की मौजूदगी
- उत्तरी भारत में फैलने वाले हेज (धुएं और धुंध का मिश्रण) से मानसून पर भी असर पड़ रहा है. हेज में दो तरह के एयरोसोल पाए जाते हैं. पहली किस्म सल्फेट और नाइट्रेट की है. ये सूरज की किरणों को पूरी तरह लौटा देते हैं. इसकी वजह से वातावरण का तापमान कम होता है. जबकि ब्लैक कार्बन सूरज की सारी किरणों को सोख लेता है. इससे तापमान बढ़ता है. पराली जलाने से हेज में ब्लैक कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है.

- इससे तापमान बढ़ जाता है. तापमान बढ़ने का एक असर यह है कि उत्तर भारत में मानसून से पहले की बारिश ज्यादा होती है और मध्य भारत में सूखा देखने को मिलता है. भारत में किसान खेती के लिए बरसात पर निर्भर रहते हैं. ऐसे में यह भारत के लिए खतरनाक है. नासा ने भी हाल ही में भारत और चीन में एयरोसोल की एक परत की मौजूदगी की पुष्टि की है.

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First published: November 9, 2018, 10:44 AM IST
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