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फेस स्कैन के जरिए अपराधियों पर नकेल, ऐसे काम करेगा सिस्टम

News18Hindi
Updated: November 8, 2019, 2:08 PM IST
फेस स्कैन के जरिए अपराधियों पर नकेल, ऐसे काम करेगा सिस्टम
चेहरे की पहचान सिस्टम से अपराधों को नियंत्रित किया जाएगा.

संयुक्त राष्ट्र (Unaited Nations) द्वारा जारी एक आंकड़े के अनुसार दुनिया में पुलिस की संख्या में सबसे कम अनुपात भारत का ही है. भारत में प्रत्येक 100000 नागरिकों पर 144 पुलिसकर्मी हैं.

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  • Last Updated: November 8, 2019, 2:08 PM IST
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भारत सरकार (Indian government) ने केंद्रीकृत चेहरे की पहचान निगरानी सिस्टम (facial recognition system) बनाने का फैसला किया है. इस सिस्टम के जरिए देश में अपराध और आपराधिक गतिविधियों पर लगाम लगाया जाएगा. हाल ही में गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाली एजेंसी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने केंद्रीकृत चेहरा पहचान निगरानी प्रणाली बनाने वाली निजी क्षेत्र की कंपनियों से बोलियां आयोजित की. बताया जा रहा है कि इस सिस्टम को बनाने वाली कंपनियों को 8 नवंबर तक कांटेक्ट दे दिया जाएगा.

वहीं इस संबंध में आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि देश में गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने वाली पुलिस की संख्या में भारी कमी है. इसलिए पुलिस को प्रौद्योगिकी से जोड़ने की बहुत आवश्यकता है. गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक आंकड़े के अनुसार दुनिया में पुलिस की संख्या में सबसे कम अनुपात भारत का ही है. भारत में प्रत्येक 100000 नागरिकों पर 144 पुलिसकर्मी हैं.

देश में गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए पुलिस को प्रौद्योगिकी से जोड़ना जरूरी है.


चेहरा पहचान निगरानी सिस्टम से पुलिस का आधुनिकीकरण

एनसीआरबी ने कहा है कि केंद्रीकृत चेहरा पहचान निगरानी प्रणाली पुलिस के आधुनिकीकरण का एक प्रयास है. यह सूचनाओं को इकट्ठा करने, अपराधियों की पहचान, सत्यापन और देश के सभी पुलिस संगठनों व यूनिट्स के बीच सूचनाओं का आदान प्रदान सुनिश्चित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल है.

भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियां सीमित संसाधनों और पर्याप्त धन की कमी को देखते हुए आपराधिक मामलों को हल करने के लिए तकनीक आधारित समाधान की लंबे समय से मांग कर रही हैं. एनसीआरबी के टेंडर में कहा गया है कि देश की 28 राज्यों और 9 केंद्र शासित राज्यों में केंद्रीकृत डेटाबेस के जरिए अपराधों की जांच, अपराधों पर नियंत्रण और इससे संबंधित चलाए जाने वाले ऑपरेशनों में बहुत बड़ा बदलाव आएगा.

तस्वीरों से डेटाबेस
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आपराधियों की तस्वीरों को सोशल मीडिया अकाउंट, समाचार पत्रों, सीसीटीवी कैमरों, पासपोर्ट फोटो, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध चित्रों और आपराधिक रिकॉर्ड से खींचा जाएगा. यहां तक कि कलाकारों की मदद से तैयार की गई संदिग्धों के स्केच भी डेटाबेस का हिस्सा होंगे.

अपराधियों का डेटाबेस आंकड़ा रखा जाएगा.


गौरतलब है कि जुलाई के महीने में कुछ भारतीय एयरपोर्ट पर चेहरा पहचान की तकनीक को शुरू किया गया था. दिल्ली पुलिस का कहना है कि इस तकनीक की मदद से कुछ ही दिनों में लगभग 3,000 लापता बच्चों की पहचान सुनिश्चित की गई थी. वहीं कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और तकनीकी विशेषज्ञों ने इस बात पर चिंता जाहिर की है कि इस तकनीक के चलते व्यक्तिगत गोपनीयता भंग होगी.

आम लोगों के व्यतिगत जीवन में हस्ताक्षेप
उनका कहना है कि पुलिस अधिकारियों का आम लोगों के व्यतिगत जीवन में हस्ताक्षेप काफी बढ़ जाएगा. साथ ही उनका यह भी मानना है कि चेहरे की पहचान से संबंधित जानकारी को कहां रखा जाएगा और उस डेटा का इस्तेमाल कैसे किया जाएगा, इसको लेकर सरकार ने कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी है.

ओपन-इंटरनेट वकालत समूह के निदेशक रमन जीत सिंह चीमा का आरोप है कि एनसीआरबी ने पास इस प्रणाली को लेकर कोई पोलिसी परामर्श और दस्तावेज नहीं है. साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं है कि वो इसके द्वारा किन समस्याओं को हल करने की कोशिश कर रहे हैं.

एनसीआरबी ने पास इस प्रणाली को लेकर कोई पोलिसी परामर्श और दस्तावेज नहीं है.


जवाबदेही स्पष्ट नहीं
उन्होंने आगे कहा कि इस सिस्टम को कौन संचालित करेगा और कुछ गलत होने पर जवाबदेही किसकी होगी यह स्पष्ट नहीं है. बता दें कि गोपनीयता के मद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा स्पष्ट निर्देश है. राष्ट्रीय बायोमेट्रिक पहचान पत्र को लेकर 2017 में दिए एक फैसले में कोर्ट ने कहा था कि व्यक्तिगत निजता एक मौलिक अधिकार है.

वहीं एनसीआरबी और गृह मंत्रालय की तरफ से इस मामले को लेकर कोई वक्तव्य नहीं आया है. गैर सरकारी संगठनों द्वारा दायर सूचना के अधिकार के अनुरोध पर भी संतोष जनक प्रतिक्रिया अभी तक नहीं मिल सकी है.

चेहरा पहचान प्रणाली पर सवाल पूरी तरह से सही नहीं
हालांकि चेहरा पहचान की केंद्रीकृत प्रणाली को लेकर उठाये जा रहे सवाल पूरी तरह से सही नहीं है. ऐसा नहीं की इस सिस्टम को लागू करन वाला भारत दुनिया का पहला देश है. दुनिया के कई देशों में ऐसी तकनीक का बहुत सफल इस्तेमाल किया जा रहा है. बीते कुछ दिनों में हमारे पड़ोसी देश चीन में भी इस प्रणाली को अपनाया गया है.

दुनिया के कई देशों में ऐसी तकनीक का सफल इस्तेमाल किया जा रहा है.


दुनिया में इस तकनीक पर कई दिग्गज कंपनियां काम कर रही हैं. जैसे- अमेजॉन रिकग्निशन, लैंबडा लैब्स फेस रिकग्निशन एंड फेस डिटेक्शन, माइक्रोसॉफ्ट फेस एपीआई, गूगल क्लाउड विजन और आईबीएम वाटसन विजुअल रिकॉग्निशन हैं.

चेहरे की पहचान तकनीक समाज में विभेद
उल्लेखनीय है कि चेहरे की पहचान तकनीक के जरिए गहरे रंग वाली महिलाओं, जातीय अल्पसंख्यकों और ट्रांसजेंडर लोगों की पहचान करने में गलत तरीके अपनाने की अकसर शिकायतें आती रहती हैं. इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक अपार गुप्ता का कहना है कि यह प्रणाली चाहे कितनी भी उच्च क्षमता वाली क्यों न हो, लेकिन भारत जैसे देशों में परेशानी और समस्याएं होंगी.

उनका मानना है कि इस प्रणाली का गलत इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, सरकार के आलोचकों और पत्रकारों पर निगरानी के लिए किया जा सकता है. गुप्ता का आरोप है कि इस सिस्टम का इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करने के लिए नहीं किया जाएगा, बल्कि चीन की तरह सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था को लागू करने के लिए किया जाएगा.

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First published: November 8, 2019, 1:53 PM IST
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