पूरी दुनिया के तेल पर ये तीन शख्स करते हैं कंट्रोल, जानें कैसे?

तेल उत्पादक देशों का पूरा संगठन भी कुल मिलाकर उतना तेल नहीं दे पाता, जितना अमेरिका, रूस और सऊदी अरब दे रहे हैं.

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Updated: November 19, 2018, 11:26 AM IST
पूरी दुनिया के तेल पर ये तीन शख्स करते हैं कंट्रोल, जानें कैसे?
फोटो- AP
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Updated: November 19, 2018, 11:26 AM IST
तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC की अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर बादशाहत पीछे छूट रही है. इसकी जगह तीन शख्स ने ले ली है, जो पूरी दुनिया के पेट्रोल बाजार पर नियंत्रण कर रहे हैं. इन तीन लोगों का छोटे से छोटा एक्शन या फिर महज एक ट्वीट भी तेल की कीमत में उछाल या गिरावट ला सकता है.

ये तीन चेहरे और कोई नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख चेहरे- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सऊदी अरब के नायब शहज़ादे मोहम्मद बिन सलमान हैं. माना जा रहा है कि साल 2019 में तेल बाजार पर पूरी तरह से इन्हीं तीन लोगों का नियंत्रण रहने वाला है. इनके आपसी समीकरण और आर्थिक नफा-नुकसान तेल बाजार में लगातार बदलाव की वजह बन रहे हैं.

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तेल बाजार में पिछले एक दशक के दौरान काफी बदलाव आए हैं. सऊदी अरब के लंबे वर्चस्व पर सेंध लगाते हुए अमेरिका में भी शेल इंडस्ट्री के जरिए कच्चे तेल के उत्पादन में भारी इजाफा हुआ. रूस इसमें पहले से ही आगे रहा है. यानी सऊदी, रूस और अमेरिका ये तीन देश दुनियाभर को सबसे ज्यादा तेल दे रहे हैं. यहां तक कि OPEC से जुड़े 15 सदस्य कुल मिलाकर भी उतना तेल उत्पादन नहीं कर पाते, जितना ये तीन देश कर रहे हैं.

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यही वजह है कि एक वक्त तेल के मामले में आखिरी फैसला देने वाला संगठन OPEC अब इन तीन देशों के फैसलों के खिलाफ कुछ खास कर नहीं पाता है. अमेरिका अगर सऊदी पर गुस्सा है, तो ये नाराजगी तेल बाजार में सऊदी से अलग फैसले के रूप में दिखेगी. रूस अगर अपने रिश्ते बनाना चाहता है, तो इसका असर भी तेल बाजार पर होगा. यही वजह है कि तेल उत्पादन और दामों में लगातार घट-बढ़ हो रही है.


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साल 2016 तक कच्चे तेल के अधिक उत्पादन के कारण बाजार में तेल की कीमत में नरमी आती गई. इसे देखते हुए OPEC और गैर OPEC देशों ने सऊदी और रूस की अगुआई में साल 2017 से तेल उत्पादन पर नकेल कसने का फैसला लिया. वे इस बात पर सहमत थे कि उत्पादन घटने पर घटे हुए दाम बढ़ने लगेंगे. हालांकि, इसी दौरान शेल इंडस्ट्री में बूम की वजह से अमेरिका में तेल उत्पादन तेजी से बढ़ा और बाजार में तेल की सप्लाई पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा. यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संगठन के अनुसार तेल बाजार में अमेरिका जल्द ही सबसे आगे हो सकता है और उसके फैसले काफी मायने रखेंगे.

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इधर, वैश्विक बाजार में अपने कब्जे को ढीला होता देख मोहम्मद बिन सलमान नई नीतियों पर विचार कर रहे हैं. सऊदी में अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को लागू करने के लिए उन्हें ज्यादा से ज्यादा राजस्व की जरूरत है. ऐसे में दो बड़े तेल उत्पादक देश रूस और अमेरिका की नीतियों की वजह से उन्हें बड़ी चुनौती मिल सकती है.



पिछले दिनों तेल बाजार में कई बड़े बदलाव आए. साल 2017 की शुरुआत में तेल उत्पादन में कटौती के बाद कच्चे तेल की नरम पड़ती कीमतों में दोबारा उछाल आया. डेढ़ सालों बाद भारत और चीन की तेल की जरूरतों के मद्देनजर सऊदी ने तेल उत्पादन दोबारा बढ़ाया, जिससे कच्चे तेल की कीमत एक बार फिर से कम होने लगी.

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अब दामों में स्थिरता लाने के लिए तेल उत्पादन करने वाले सभी देश उत्पादन में एक बार फिर से कटौती का फैसला कर चुके हैं. हालांकि, रूस इसमें देशों के साथ नहीं. वजह- मॉस्को की अर्थव्यवस्था केवल तेल की कीमत पर ही निर्भर नहीं. ऐसे में रूस तेल उत्पादन में कटौती करेगा या बढ़ोतरी की कोई गारंटी नहीं है. राजनीतिक समीकरण ये भी कहते हैं कि सऊदी से अपने रिश्ते बनाने के लिए पुतिन ये 'मामूली सा त्याग' भी कर सकते हैं कि उनके फैसले पर खुद भी हामी भर दें.



दूसरी ओर, अमेरिका कई मामलों में सऊदी पर भड़का हुआ है. पत्रकार जमाल खगोशी की कथित पर सऊदी नेताओं के फैसले पर हत्या भी इसकी कुछ हालिया वजहों में से है. साथ ही साथ अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि एशियाई देशों की तेल के लिए ईरान पर निर्भरता खत्म हो जाए. इसके लिए वो वक्त-वक्त पर कड़े लहजे का इस्तेमाल करता आ रहा है. चूंकि, भारत कच्चा तेल आयात करने के मामले में चुनिंदा शीर्ष देशों में से है, ऐसे में अमेरिकी जिद का उसपर भी असर हो सकता है.

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कुल मिलाकर अब वैश्विक तेल बाजार किसी संगठन की बजाए सिर्फ और सिर्फ तीन देशों और उसमें भी तीन व्यक्तियों द्वारा संचालित हो रहा है. तेल की कीमत बढ़ाने के लिए उत्पादन घटाना या फिर कीमत में स्थिरता लाने के लिए किसी भी तरह का फैसला फिलहाल यही तीन लोग कर रहे हैं. इसका सीधा असर तेल के लिए निर्भर भारत समेत अन्य देशों पर पड़ने लगा है.

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