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आजादी के दिन सरदार पटेल को लेकर फैली थीं अफवाहें-नहीं बनाए जाएंगे मंत्री

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: February 17, 2020, 3:56 PM IST
आजादी के दिन सरदार पटेल को लेकर फैली थीं अफवाहें-नहीं बनाए जाएंगे मंत्री
आजाद भारत में जब पहला मंत्रिमंडल शपथ लेने वाला था, तब ये अफवाहें जोरों पर थीं कि पटेल इसमें शामिल नहीं होंगे

15 अगस्त 1947 के दिन दिल्ली के सियासी गलियारों में चर्चा फैली हुई थी कि सरदार पटेल को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया जाएगा, क्योंकि नेहरू उनसे नाखुश हैं. हालांकि ना केवल वो मंत्रिमंडल में शामिल किये गए बल्कि उप प्रधानमंत्री भी बने

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  • Last Updated: February 17, 2020, 3:56 PM IST
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जिस दिन देश आजाद हुआ और आजाद भारत का पहला मंत्रिमंडल आकार लेने वाला था, तब दिल्ली के सियासी गलियारों में ये चर्चा फैली हुई थी कि सरदार वल्लभ भाई पटेल को नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया जाएगा.

ये बात नेहरू के निजी सचिव एम ओ मथाई ने अपनी किताब "रिमिनिसेंसेज ऑफ द नेहरू एज" में लिखी है. किताब में वल्लभभाई पटेल के नाम से लिखे अध्याय में मथाई ने पटेल और नेहरू के संबंधों की विस्तार से चर्चा की है.

मथाई ने लिखा, " पटेल, नेहरू से 13 साल बड़े थे. उनके अंदर गजब की संगठनात्मक क्षमता थी और फैसलों में वो बहुत दृढ़ रहते थे. 02 सितंबर 1946 को जब अंतरिम सरकार गठित हुई तब सरदार पटेल के पास गृह मंत्रालय और सूचना व प्रसारण मंत्री का जिम्मा था. लेकिन वो जिस तरह से काम करते थे, उससे सीनियर सिविल सर्वेंट्स दो खेमों में बंटे होते थे मानो सरकार अनुचित तौर पर दो लोगों में बंटी हो."



नेहरू के निजी सचिव के अनुसार, "मोरारजी देसाई उन दिनों वल्लभभाई पटेल के बहुत बड़े प्रशंसक थे. उन्होंने एक बार मुझसे कहा, सरदार में उस व्यक्तिगत अनुशासन की कमी है, जिसकी जरूरत नंबर दो में होती है."



"पॉवर नेहरू के पास थी. वो नहीं चाहते थे कि इस पॉवर के साथ पटेल भी फ्लर्ट करें,  लेकिन एकता और सदभाव के चलते उन्होंने तब भी पटेल को साथ रखा गया. वो दिन नॉर्मल दिन नहीं थे."

पटेल उप प्रधानमंत्री बने लेकिन बगैर जिम्मेदारी के
किताब में लिखा है, "15 अगस्त 1947 के दिन डोमिनियन सरकार के गठन से पहले, कुछ लोगों ने ये अफवाहें फैला दी थीं कि पटेल कैबिनेट में शामिल नहीं किये जाएंगे. क्योंकि नेहरू उनसे नाराज हैं.  ये अफवाहें जानबूझकर कुछ लोगों ने अपना हित साधने के लिए फैलाई थी. लेकिन ना केवल पटेल कैबिनेट में लिये गए बल्कि उन्हें उप प्रधानमंत्री का पद भी दिया गया. उन्हें ये पद केवल सम्मान के नाते दिया गया जबकि इसके साथ कोई जिम्मेदारियां नहीं दी गईं."

सरदार पटेल को उप प्रधानमंत्री तो बनाया गया लेकिन कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई लेकिन बाद में उन्हें लार्ड माउंटबेटन की एक पहल के चलते देश का सबसे महत्वपूर्ण महकमा मिल गया


कैसे मिला पटेल को स्टेट मिनिस्ट्री का प्रभार
"डोमिनियन सरकार के गठन के साथ राज्यों का एक मंत्रालय भी अपेक्षित था. नेहरू इसका चार्ज लेना चाहते थे. उन्होंने इस स्टेट मिनिस्ट्री के लिए एचवीआर आयंगर को सेक्रेट्री के रूप सेलेक्ट भी कर लिया था. लार्ड माउंटबेटन को लगता था कि नेहरू अपने मित्र महाराजाओं से सख्ती नहीं कर पाएंगे. उनका मानना था कि नेहरू कई बार यथार्थ से परे रहते हैं जबकि पटेल जमीनी हकीकत से ज्यादा बेहतर तरीके से निपट सकते हैं."

माउंटबेटन का दखल काम आया
किताब के अनुसार, "माउंटबेटन चाहते थे कि पटेल इस स्टेट मिनिस्ट्री के प्रभारी बनें बल्कि उनके साथ काम कर रहे वीपी मेनन इस मिनिस्ट्री के सेक्रेट्री बनाए जाएं. ताकि इस मंत्रालय की बातों में उनका भी दखल बना रहे. इस बारे में माउंटबेटन ने पटेल से इस बारे कुछ बात भी की ताकि वो इसके लिए तैयार हो सकें. माउंटबेटन ये भी चाहते थे कि वो नेहरू से बात करके उनसे इस मंत्रालय से अलग होने के लिए कहेंगे. नेहरू ने खुद को इस मंत्रालय से अलग कर लिया."

कांग्रेस की पार्लियामेंट्री कमेटी में राज्यों के प्रतिनिधि पटेल को कांग्रेस अध्यक्ष बनाना चाहते थे लेकिन गांधीजी ने नेहरू के नाम पर मुहर लगाई. इसका कारण भी बाद में गांधीजी ने जाहिर किया


क्यों गांधीजी ने नेहरू को ऊपर रखा
पत्रकार और बाद हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक रहे दुर्गादास ने अपनी किताब "इंडिया-फ्राम कर्जन टू नेहरू एंड ऑफ्टर" में लिखा कि किस तरह गांधीजी ने पटेल के स्थान पर नेहरू को ऊपर रखा. आजादी से एक साल पहले जो भी कांग्रेस का अध्यक्ष बनता, उसका प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो जाता.

"पटेल तब कांग्रेस पार्लियामेंट्री बोर्ड के अध्यक्ष थे और प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने पटेल को अध्यक्ष बनाए जाने का मत जाहिर किया. लेकिन गांधीजी का कहना था कि नेहरू अंग्रेजों से निपटने के लिए ज्यादा उपयुक्त थे, क्योंकि वो उन्हीं की भाषा बोलते थे. बाद में लार्ड माउंटबेटन ने 1968 में कैंब्रिज में अपने एक भाषण में कहा भी कि उनके लिए नेहरू के साथ विचार-विमर्श करना ज्यादा आसान और बेहतर था."

गांधीजी ने बाद में जब अंतरिम सरकार का गठन हो रहा था तब दुर्गादास से बातचीत में कहा, "विदेश में लोग सरदार की बजाए नेहरू को अधिक जानते हैं इसलिए वो भारत को अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी भूमिका अदा करने में सहायक साबित होंगे और दोनों साथ मिलकर गाड़ी खीचेंगे."

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First published: February 17, 2020, 2:50 PM IST
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