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आज पहली उड़ान भरने वाला स्वदेशी फाइटर जेट मारूत क्यों हो गया फ्लॉप

नेहरू चाहते थे कि भारत खुद अपना फाइटर जेट बनाए. ये बना भी. इसका नाम था मारूत. लेकिन आखिर क्यों ये प्रोजेक्ट बहुत आगे तक नहीं जा पाया

नेहरू चाहते थे कि भारत खुद अपना फाइटर जेट बनाए. ये बना भी. इसका नाम था मारूत. लेकिन आखिर क्यों ये प्रोजेक्ट बहुत आगे तक नहीं जा पाया

1961 में आज ही के दिन देश के पहले स्वदेशी फाइटर जेट ने जब उड़ान भरी तो पूरे देश का सीना चौड़ा हो गया. फिर 1971 के युद्ध मारूत नाम के इस फाइटर ने पांकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए. फिर आखिर क्यों गायब हो गया ये विमान, क्यों इसके निर्माण के महत्वाकांक्षी मिशन को आगे नहीं बढ़ाया गया

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    वर्ष 1961 में आज ही के दिन देश के पहले स्वदेशी फाइटर जेट मारूत (HF-24 Marut) ने उडान भरी थी. ये एक सफल उड़ान थी. पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में भी इस फाइटर विमान ने जांबाजी दिखाई थी, फिर ये क्यों गायब हो गया. आखिर क्यों फेल हो गया भारत की स्वदेशी लड़ाकू की महत्वाकांक्षी मिशन (Ambitious Mission).

    1956 में इस लड़ाकू विमान के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) ने कहा था कि ये 'माक 2' (Mach 2) जैसी स्पीड हासिल करेगा, उसका बुरा हश्र क्यों हुआ? ये 'माक 2' की आधी स्पीड भी क्यों नहीं जुटा पाया. ये आखिर क्यों विफल हो गया. पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में मारूत की क्या भूमिका थी? इन सब सवालों के साथ ही जानें कि कैसे हारकर भी जीत जाने की कहावत मारूत के साथ सही साबित हुई.

    अनदेखी का शिकार हुआ अहम प्रोजेक्ट
    जर्मनी के प्रसिद्ध एयरोनॉटिकल इंजीनियर कुर्ट टैंक के निर्देशन में एचएफ-24 मारूत का डिज़ाइन और निर्माण तैयार किया गया था. बेहतरीन तैयारियों के साथ जब 1959 में इस लड़ाकू विमान की गुणवत्ता मज़बूत करने की बात आई तब 1 करोड़ 30 लाख पाउंड के निवेश की ज़रूरत थी, लेकिन तब भारत ने इस इन्वेस्टमेंट को लेकर हिचक दिखाई. हिंदोस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड बरसों तक फंडिंग का इंतज़ार करते हुए इस विमान के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करती रही.

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    1971 के भारत पाक युद्ध के दौरान लौंगेवाला लड़ाई में भारतीय वायुसेना ने मारूत के दम पर कारनामे किए थे.


    आधी रह गई मारूत की किस्मत
    जिस लड़ाकू विमान का नाम 'आंधी जैसी रफ्तार' की कल्पना के साथ रखा गया था, वह 'माक 1' की बराबरी तक भी मुश्किल से पहुंच पाया. एक टेस्ट उड़ान में विमान ​क्रैश का शिकार भी हुआ. जब मारूत के सुधार और उसे परफेक्ट बनाए जाने की दिशा में भारत जूझ ही रहा था, तभी बांग्लादेश की स्थापना को लेकर पाकिस्तान के साथ भारत 1971 के युद्ध के मुहाने पर आ चुका था.

    फिर भी युद्ध में मारूत ने ढाया गज़ब
    1971 के भारत पाक युद्ध के दौरान जब लौंगेवाला पोस्ट पर पाकिस्तानी सेना आगे बढ़ रही थी, तब मारूत के इस्तेमाल के साथ भारतीय वायुसेना के जवानों ने कारनामे दिखाए. पा​क फौज के कई टैंक ध्वस्त किए गए और कुछ और शस्त्र भी. 220 स्क्वाड्रन के मेजर बख्शी इकलौते रहे, जिन्होंने मारूत के ज़रिए हवा से हवा में एक घातक हमले को अंजाम देकर कोरियन लड़ाका विमान तकनीक से बने पाकिस्तानी विमान एफ-86 सैबर को मार गिराया था.

    युद्ध के बाद फिर हुआ विचार?
    इसके बावजूद कई मारूत विमान अपने इंजन को लेकर युद्ध के दौरान संघर्ष करते रहे. कुछ एयरबेस तक लौटने में नाकाम रहे तो कुछ लैंडिंग की समस्याओं में घिरे. इन विपरीत स्थितियों के बावजूद युद्ध में बेहतरीन प्रदर्शन करने के बाद प्रस्ताव थे कि मारूत की गुणवत्ता और ताकत को और सुधारा जाए लेकिन मिग और एसयू-7 जैसे उन्नत विमानों की तरफ भारत का रुझान ज़्यादा हो चला था इसलिए मारूत पर और समय व रकम खर्च करने का इरादा किया ही नहीं जा सका.

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    म्यूनिख के एक म्यूज़ियम में रखा हुआ मारूत का संरक्षित वर्जन. इस कहानी की तस्वीरें विकिपीडिया से साभार.


    मारूत की नाकामी ने क्या सिखाया?
    मारूत की पूरी कहानी से कम से कम दो कड़वे सबक ज़रूर लिये जाने चाहिए. "वॉर इज़ बोरिंग" जैसी किताब लिखने वाले रक्षा और सेना के इतिहासकार सेबेस्टियन रॉबलिन ने एक लेख के मुताबिक, "पहला सबक ये रहा कि एक विश्वसनीय और बेहतरीन प्रोजेक्ट कैसे खराब योजनाओं और नज़रिए के अभाव में बेकार हो गया. नौकरशाही, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही ने उस संभावना की बलि चढ़ाई, जो देश के इतिहास का सुनहरा अध्याय हो सकती थी."

    रॉबलिन के मुताबिक," दूसरी बात यह समझने की है कि तकनीकी महारत को ज़्यादा से ज़्यादा हासिल करने के बजाय उसके सही और सटीक इस्तेमाल का लाभ हमेशा मिलता है. मारूत को इतिहास के हवाले से हमेशा एक नाकाम डिज़ाइन के तौर पर याद किया जाएगा लेकिन वास्तविक युद्ध के समय उसे जिस तरह से इस्तेमाल किया गया, उसने उम्मीद से बढ़कर कारनामा दिखाया."

    मारूत के बारे में भूले-बिसरे फैक्ट्स
    - 1980 के दशक में मारूत भारतीय वायुसेना से खारिज होता चला गया और मारूत ने आखिरी सेवा 1990 में दी थी.
    - हालांकि मारूत हमेशा एक उन्नत इंजन की बाट जोहता रहा, फिर भी मिस्र ने अपने लड़ाकू इंजन प्रोग्राम के टेस्ट के लिए मारूत का इस्तेमाल किया था.
    - 1971 के युद्ध के बाद मारूत के पायलटों को वीर चक्र से नवाज़ा गया था.
    - कुल 147 मारूत विमानों का निर्माण किया गया था लेकिन एक उपयुक्त इंजन का अभाव मारूत को उन्नत नहीं बना सका.
    - इस लड़ाकू विमान के नाम में एचएफ का मतलब हिंदोस्तान फाइटर था, जिसने 17 जून 1961 को पहली उड़ान भरी थी.

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