आज ही के दिन भारत आईं थीं मदर टेरेसा, जीवनभर की गरीबों-बीमारों की सेवा

आज ही के दिन भारत आईं थीं मदर टेरेसा, जीवनभर की गरीबों-बीमारों की सेवा
मदर टेरेसा का असली नाम एग्नेंस गोंझा बोयाजिजू था. उनका जन्म 26 अगस्त 1910 को यूगोस्लाविया में हुआ था.

ग्रैजुएशन के बाद उन्होंने ईसाई मिशनरीज (Christian Missionaries) के लिए काम करने का फैसला कर लिया. वो नन बन गईं. नन की कड़ी ट्रेनिंग लेकर उन्होंने बंगाल के कोलकाता में स्कूलों में काम करना शुरू किया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 6, 2020, 9:45 AM IST
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1979 में शांति का नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) जीतने वाली मदर टेरेसा आज ही के दिन 1929 में भारत आई थीं. भारत के गरीबों के लिए मदर टेरेसा ने जो काम किए उसकी भरपाई किसी अवॉर्ड से नहीं की जा सकती. लेकिन फिर भी दुनिया ने उन्हें वो सम्मान देने की कोशिश की, जिसकी वो हकदार थीं. दुनिया का शायद ही ऐसा कोई प्रतिष्ठित अवॉर्ड होगा, जो मदर टेरेसा को न मिला हो. भारत सरकार उन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित कर चुकी हैं. अमेरिका और रूस ने भी अपने देश के सर्वोच्च सम्मान से उन्हें नवाजा है.

मदर टेरेसा का असली नाम एग्नेंस गोंझा बोयाजिजू था. उनका जन्म 26 अगस्त 1910 को यूगोस्लाविया में हुआ था. जब वो सिर्फ 9 साल की थीं, उनके सिर से पिता का साया उठ गया. मां पर घर की जिम्मेदारी आ गई. मदर टेरेसा ने सिलाई कढ़ाई करके अपनी मां का हाथ बंटाया. शायद बचपन के अभावों की वजह से ही उनके दिल में अभावग्रस्त लोगों की मदद करने की भावना जगी. और ये भावना ऐसी प्रबल हुई कि उन्होंने पूरी जिंदगी बेसहारों की कल्याण में लगा दी.

ग्रैजुएशन के बाद ली नन की ट्रेनिंग
ग्रैजुएशन के बाद उन्होंने ईसाई मिशनरीज के लिए काम करने का फैसला कर लिया. वो नन बन गईं. नन की कड़ी ट्रेनिंग लेकर उन्होंने बंगाल के कोलकाता में स्कूलों में काम करना शुरू किया. यहां से शुरू हुआ उनका सफर कई पड़ावों को पार करता हुआ ऐसे मुकाम पर पहुंचा कि वो मानवता की सबसे सच्ची मिसाल बन गईं. लेकिन एक सवाल ये उठता है कि उन्होंने भारत को ही अपनी कर्मभूमि क्यों चुना?
मदर टेरेसा 1920 में पहली बार बंगाल के शहर कोलकाता आई थीं. यहां उन्होंने सेंट टेरेसा स्कूल में पढ़ाना शुरू किया. यहीं पर उन्होंने सबसे पहली बार भारत की भयावह गरीबी, भुखमरी, लाचारी और बेबसों की मजबूरी देखी. शायद यहीं पर उनकी अंतरात्मा जागी और उन्होंने यहां के गरीबों के लिए कुछ करने की सोची. इसके बाद वो कुछ साल लिए यहां से चली गईं. वापस लौटीं तो सबसे पहले यहां के गरीबों के लिए स्लम स्कूल खोला. यहीं पर उन्होंने स्कूल की सीढ़ियों के पास अपनी पहली डिस्पेंसरी खोली.



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मदर टेरेसा


भारत की भयावह गरीबी देखकर दुखी थीं मदर टेरेसा
मदर टेरेसा 1931 में भारत लौटीं. उस वक्त द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था. युद्ध की वजह से भारत के गरीबों को भूखे मरने की नौबत आ पड़ी थी. बच्चों और महिलाओं की स्थिति सबसे दयनीय थी. मदर टेरेसा ने गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. गरीबों के सम्मान के साथ जीने की शिक्षा दी. बीमारों की मदद के लिए उनका इलाज करना शुरू किया. मदर टेरेसा ने सभी को बताना शुरू किया कि ईश्वर की सभी संतान एक हैं. सभी को सम्मान के साथ जीने का हक है.

1947 में जब देश आजाद हुआ उस वक्त भयानक दंगे हुए. मदर टेरेसा उस वक्त भी दंगा पीड़ितों की सेवा में जुटी रहीं. उस वक्त मदर टेरेसा ने निर्मल ह्रिदय नाम की एक चैरिटी संस्था खोली और दिनरात गरीबों की सेवा में जुट गईं. उनकी संस्था ने धर्म और जाति से उठकर लोगों की सेवा करनी शुरू की. उनका संस्थान गरीबों की लावारिस हालत में मौत होने पर उनके धर्म के हिसाब से अंतिम संस्कार करता. गरीबों का सम्मान मदर टेरेसा के लिए सबसे बड़ी बात थी.

क्या मदर टेरेसा चमत्कार कर सकती थीं?
मदर टेरेसा ने 1947 में ही भारत की नागरिकता ले ली. वो फर्राटे से बंगाली बोलती थीं. मदर टेरेसा के बारे में अक्सर कहा जाता रहा है कि उन्होंने कई बार चमत्कार किए हैं. भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने उनपर एक किताब लिखी है. 1992 में लिखी उस किताब पर फिल्में और डाक्यूमेंट्री भी बन चुकी है. नवीन चावला ने बीबीसी से बात करते हुए मदर टेरेसा के एक चमत्कार का जिक्र किया था.

बीबीसी को उन्होंने बताया था कि एक बार वो रोम से फ्लाइट से आ रही थीं. उनकी फ्लाइट बीस से पच्चीस मिनट लेट थी. दिल्ली एयरपोर्ट पर वो जैसे ही उतरीं उन्होंने बोला कि उन्हें कोलकाता की कनेक्टिंग फ्लाइट लेनी है. उस वक्त शाम में कोलकाता की एक ही फ्लाइट हुआ करती थी.



मदर टेरेसा लेट हो चुकी थीं. कोलकाता का प्लेन बोर्ड हो रहा था. नवीन चावला ने उन्हें बोला कि आज रुक जाइए कल सुबह कोलकाता चली जाइएगा. मदर टेरेसा का कहना था कि वो कल तक का इंतजार नहीं कर सकतीं. क्योंकि वो अपने साथ एक बच्चे के लिए दवाई लेकर आई हैं. वो दवाई उस बच्चे को देना बहुत जरूरी है. दिल्ली एयरपोर्ट पर बहुत सारे लोग उनका ऑटोग्राफ लेने आ रहे थे. वो सभी से कह रही थीं कि उन्हें किसी तरह से कोलकाता पहुंचवा दें.

चावला ने बताया कि ये बात किसी तरह से कंट्रोल टावर तक पहुंच गई. पायलट को इस बारे में पता चला तो उसने नियमों की अनदेखी करके जहाज को लेट कर दिया. किसी तरह से तुरत फुरत मदर टेरेसा को फ्लाइट में चढ़ाया गया. ये आश्चर्यजनक था. एक गरीब बच्चे की बीमारी ठीक करने की प्रबल भावना ने शायद ये चमत्कार किया.
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