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सुधा मूर्ति, जिनके इंजीनियरिंग कॉलेज जाने पर प्रिंसिपल ने रखी 4 साल तक साड़ी पहनने की शर्त

News18Hindi
Updated: November 28, 2019, 3:45 PM IST
सुधा मूर्ति, जिनके इंजीनियरिंग कॉलेज जाने पर प्रिंसिपल ने रखी 4 साल तक साड़ी पहनने की शर्त
उस दौर में सुधा के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई आसान नहीं थी

कॉलेज में 599 लड़कों के बीच सुधा मूर्ति (sudha murthy) अकेली लड़की थीं. तब माना जाता था कि गणित (mathematics) लड़कों का विषय (subject) है और इंजीनियरिंग (engineering ) में लड़के ही आएंगे. ऐसे में कॉलेज में टॉयलेट (toilet) भी सिर्फ लड़कों के लिए ही था.

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  • Last Updated: November 28, 2019, 3:45 PM IST
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रियलिटी क्विज शो 'कौन बनेगा करोड़पति' (kaun banega crorepati) अब अपने आखिरी चरण में है. 2 एपिसोड के साथ ही इस शो का ये सीजन पूरा हो जाएगा. इस शुक्रवार के कर्मवीर एपिसोड में सुधा मूर्ति (sudha murthy) आ रही हैं. इन्फोसिस फाउंडेशन (infosys foundation) की अध्यक्ष और पद्मश्री सुधा मूर्ति महानायक अमिताभ बच्चन के साथ हॉटसीट पर होंगी. जानिए, कौन हैं सुधा मूर्ति और किसलिए उनकी कामयाबी अलग मायने रखती है.

सोनी टीवी पर कौन बनेगा करोड़पति के कर्मवीर एपिसोड का टीजर लगातार चल रहा है. इसमें सुधा अपनी जिंदगी से जुड़ी कई अहम बातें बताती हैं. इसमें इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले के लिए संघर्ष से लेकर महज 10000 रुपयों से एक कारोबार शुरू करने की जिद भी शामिल है. सुधा मूर्ति टीजर में कहती हैं कि कैसे हुबली के इंजीनियर कॉलेज में जाने देने के लिए उनके ही घरवाले राजी नहीं थे. तब लड़कियों का इंजीनियरिंग करना अनोखी बात थी.

दाखिले के लिए सुधा बी.वी.बी.कालेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी पहुंची तो प्रिंसिपल ने 3 शर्तें रखीं. इनमें पहली थी कि सुधा को ग्रेजुएशन खत्म होने तक साड़ी में ही आना होगा, दूसरी शर्त के तहत सुधा का कैंटीन जाना मना था और तीसरी शर्त थी कि सुधा कॉलेज के लड़कों से बात नहीं करेंगी. सुधा अक्सर इस वाकये का जिक्र करते हुए बताती हैं कि पहली दो शर्तें तो पूरी हो गईं लेकिन तीसरी शर्त खुद उनके कॉलेज के लड़कों ने पूरी नहीं होने दी. जैसे ही सुधा ने फर्स्ट ईयर में टॉप किया, सारे लड़के खुद उनसे बात करने आने लगे. इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की स्नातक में सुधा पूरे कर्नाटक में प्रथम रहीं.




 



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She fought against all social stereotypes. Meet our #KBCKaramveer #SudhaMurthy this Friday at 9 PM and know how she reformed thousands of underprivileged lives. @amitabhbachchan


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वैसे उस दौर में सुधा के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई आसान नहीं थी. 600 की स्ट्रेंग्थ वाले कॉलेज में 599 लड़कों के बीच सुधा अकेली लड़की थीं. तब माना जाता था कि गणित लड़कों का विषय है और इंजीनियरिंग में लड़के ही आएंगे. ऐसे में कॉलेज में टॉयलेट भी लड़कों के लिए ही था. तब पूरी पढ़ाई के दौरान सुधा परेशान होती रहीं. ये उन्हीं 4 सालों की परेशानी का नतीजा रहा कि इंफोसिस शुरू करने के बाद सुधा ने 16 हजार से भी ज्यादा टॉयलेट पूरे देश में बनवाए.

उत्तरी कर्नाटक में शिगांव में अगस्त 1950 में जन्मी सुधा का संघर्ष खुद को पढ़ाई में साबित करने पर ही नहीं रुका. पढ़ाई के बाद नौकरी खोजने निकलीं तो पता चला कि कई कंपनियों में बतौर इंजीनियर सिर्फ पुरुष ही लिए जाते थे. टाटा मोटर्स (तत्कालीन टेल्को) भी इसी में एक था. सुधा ने तब जेआरडी टाटा को एक पोस्टकार्ड भेजा. इसके बाद उन्हें विशेष साक्षात्कार के लिए बुलाया गया और सारे पैमानों पर खरी उतरने पर उन्हें नियुक्ति मिली. सुधा टाटा में काम करने वाली पहली महिला इंजीनियर बनीं.

काम के दौरान ही सुधा की मुलाकात नारायण मूर्ति से हुई, जो बाद में उनके जीनवसाथी बने. सुधा की तरह ही बेहद प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी नारायण अपना कारोबार शुरू करना चाहते थे लेकिन पूंजी की कमी के कारण नहीं कर पा रहे थे. तब सुधा ने अपनी सारी बचत नारायण मूर्ति का सपना पूरा करने में लगा दी. वो रकम थी 10000 रुपए, जिनसे इंफोसिस का विशाल एंपायर खड़ा हो गया.

साल 2006 में अपनी समाजसेवा के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित सुधा एक अच्छी लेखिका भी हैं. उन्होंने महिला किरदारों पर केंद्रित उपन्यास भी लिखे हैं, जिनमें से कई काफी लोकप्रिय हुए. The Serpent’s Revenge, The Bird with the Golden Wings, The Day I Stopped Drinking Milk: Life Lessons from Here and There, House of Cards और How I Taught My Grandmother to Read कुछ मुख्य किताबें हैं. इन किताबों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ये 15 भाषाओं में अनुवादित हुईं.

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First published: November 28, 2019, 3:45 PM IST
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