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तब डीए को डियर फूड अलाउंस क्यों कहा जाता था

News18Hindi
Updated: October 9, 2019, 4:42 PM IST
तब डीए को डियर फूड अलाउंस क्यों कहा जाता था
1944 में अंग्रेज सरकार ने मुख्य तौर पर सैनिकों के लिए डियर फूड अलाउंस शुरू किया था.

महंगाई भत्ता पूरी दुनिया में केवल तीन देशों में ही दिया जाता है. ये तीन देश हैं भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश. समय के साथ इनका स्वरूप भी बदला है

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  • Last Updated: October 9, 2019, 4:42 PM IST
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केद्र सरकार (Central government) ने केंद्रीय कर्मचारियों (Central employees) के लिए महंगाई भत्ता (dearness allowance)यानि डियरनेस अलाउंस को 12 से बढ़ाकर 17 फीसदी कर दिया है. वर्ष 2016 के बाद ये डीए (DA) में हुई सबसे बड़ी बढोतरी है. एक जमाना था जब इस अलाउंस को डियर फूड अलाउंस (Dear food allowance) भी कहा जाता था.

इसकी भी रोचक कहानी है. ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद की बात है. तब फौज के लोगों को खाने की चीजों में महंगाई से दिक्कत होने लगी थी. बाजार में खाने की वस्तुओं के दाम बढ़ने लगे थे. 1944 के आसपास सरकार से मांग की गई कि वो लोगों का वेतन बढाए, क्योंकि इस वेतन में महंगी खाद्य वस्तुओं के साथ जीवनयापन करना मुश्किल हो रहा है.

सरकार ने इसके लिए एक अलग रास्ता निकाला. उसने सेना और सरकारी कर्मचारियों के लिए एक नया भत्ता शुरू किया. सरकार का मानना था कि जब खाद्य वस्तुओं के रेट कम हो जाएंगे तो इसे खत्म कर दिया जाएगा. लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं.

1947 में जब भारत आजाद हुआ तो भी कर्मचारियों और सैनिकों को डियर फूड अलाउंस जारी रखा गया बल्कि उस समय सरकार ने ओल्ड टैक्सटाइल अलाउंस भी देना शुरू किया.

फिर रिवाइज टैक्सटाइल अलाउंस भी शुरू हुआ
हालांकि 1953 में इसे रिवाइज किया गया तब इसका नाम रिवाइज्ड टैक्सटाइल अलाउंस कर दिया गया. तब तक डीए का स्वरूप बदल चुका था और इसे वेज रिविजन के तौर पर दिया जाने लगा था लेकिन फिर इसे कंज्युमर प्राइज इंडैक्स से जोड़ा गया, जो आलू, नमक, खाद्यान्न, दलहन के दामों पर आधारित था. 1972 में ही कानून बनाया गया, जिससे कि ऑल इंडिया सर्विस एक्ट 1951 के तहत आने वाले सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ता दिया जाने लगे.

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ये किन लोगों को दिया जाता है
बाद में केंद्रीय सरकार ने जो वेतन आयोग बनाए. उन्होंने इसका फार्मूला तय किया. पूरी दुनिया में सिर्फ भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश ही ऐसे देश हैं,जिनके सरकारी कर्मचारियों को ये भत्ता दिया जाता है. ये पैसा इसलिए दिया जाता है, ताकि महंगाई बढ़ने के बाद भी कर्मचारी के रहन-सहन के स्तर में पैसे की वजह से दिक्कत न हो. ये पैसा सरकारी कर्मचारियों, पब्लिक सेक्टर के कर्मचारियों और पेंशनधारकों को दिया जाता है.

1947 में जब भारत आजाद हुआ तो भी कर्मचारियों और सैनिकों को डियर फूड अलाउंस जारी रखा गया लेकिन बाद में इसे रिवाइज किया गया.


किस आधार पर दिया जाता है महंगाई भत्ता
महंगाई भत्ते की गणना मूल सैलरी पर होती है. इसकी शुरुआत 1 जनवरी 1996 से हुई थी. आम तौर पर हर छह महीने में महंगाई भत्ते में बदलाव किया जाता है. हर साल जनवरी और जुलाई से नया भत्ता लागू होता है. उदाहरण के लिए इस साल सरकार ने 29 अगस्त 2018 को महंगाई भत्ते में दो फीसदी की बढ़ोतरी का ऐलान किया था. लेकिन ये ऐलान काफी बढ़ाकर दिया गया है.
ये महंगाई भत्ता अलग-अलग कर्मचारियों के लिए अलग-अलग होता है. शहरी क्षेत्र, अर्ध शहरी क्षेत्र और ग्रामीण इलाकों में नौकरी करने वालों के लिए ये महंगाई भत्ता अलग-अलग होता है. और मिलने वाले इस पैसे पर टैक्स की छूट नहीं होती है.

अब वेतन आयोग के फॉर्मूले के आधार पर डीए तय किया जाता है


क्या है इसका फार्मूला
2006 तक केंद्र सरकार महंगाई भत्ता तय करती थी. इसके तहत बेसिक सैलरी और ग्रेड पे को जोड़कर जो पैसा बनता था, उसका एक निश्चित हिस्सा महंगाई भत्ते के तौर पर दिया जाता था. लेकिन 2006 के बाद महंगाई भत्ता तय करने का प्रावधान बदल गया. इसके लिए एक फॉर्मूला निकाला गया. ये इस तरह है-

महंगाई भत्ते का प्रतिशत = पिछले 12 महीने का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का औसत-115.76. अब जितना आएगा उसे 115.76 से भाग दिया जाएगा. जो अंक आएगा, उसे 100 से गुणा कर दिया जाएगा.

क्या है उपभोक्ता मूल्य सूचकांक?
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को एक साल में लोगों की ओर से इस्तेमाल किए गए सामान और सेवाओं पर हुए खर्च का औसत होता है.

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First published: October 9, 2019, 4:42 PM IST
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