जेब थी खाली, पंडित ने डालमिया का हाथ देखकर कहा- एक हफ्ते में बदल जाएगी किस्मत

मामूली नौकरियों और छोटे कारोबार के बाद देश के तीन शीर्ष उद्योगपतियों की पायदान तक पहुंचे थे रामकृष्ण डालमिया.

मामूली नौकरियों और छोटे कारोबार के बाद देश के तीन शीर्ष उद्योगपतियों की पायदान तक पहुंचे थे रामकृष्ण डालमिया.

आजादी के पहले देश के शीर्ष उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया (Ramkrishna Dalmia ) की कहानी भी जबरदस्त है. वो युवा उम्र में छोटी-मोटी नौकरियां कर रहे थे. फिर सट्टा बाजार की लत लगी. लोगों का विश्वास गंवाया. फिर किस्मत ने ऐसा टर्न दिया कि देखते ही देखते देश के तीन बड़े उद्योगपतियों में शामिल हो गए. आज यानि 07 अप्रैल को उनका जन्मदिन भी है.

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आजादी से पहले देश के शीर्ष उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया वो शख्स थे, जिन्हें कोलकाता में अपनी उम्र में छोटी-मोटी नौकरियां और दलाली का काम करना पड़ा. एक समय ऐसा भी आया कि लोगों ने उन पर भरोसा करना छोड़ दिया. उनके पास पैसे खत्म हो गए. लेकिन हौसला, बुद्धि और साहस ने उन्हें इतने ऊंचे मुकाम तक पहुंचाया कि आज भी ये मुहावरा लोगों की जुबान पर आ जाता है कि क्या टाटा, बिड़ला और डालमिया बनोगे. यानि देश में धनाढ्यता के ऐसे प्रतीक बने, जिनके जैसा हर कोई बनना चाहने लगा.

आज रामकृष्ण डालमिया का जन्मदिन है. वो 07 अप्रैल 1893 में राजस्थान के चिड़ावा कस्बे में पैदा हुए. उनके पिता भाग्य की तलाश में परिवार को कोलकाता ले गए. पिता का जीवन सादा था और संघर्षभरा. वो ताउम्र वहां बड़े सेठों के यहां मुनीम या अकाउंटेंट की नौकरी करते रहे. उनके बड़े बेटे रामकृष्ण अलग थे. बहुत तेज दिमाग और याददाश्त वाले. गणितीय क्षमता तो जबरदस्त थी. बचपन से ही उन्होंने छोटा-मोटा काम शुरू कर दिया था.

रामकृष्ण डालमिया की बेटी नीलिमा डालमिया अधर की किताब "फादर डियरेस्ट-द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ आरके डालमिया" में काफीकुछ विस्तार से लिखा है.



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सट्टा बाजार की लत ने साख खत्म की
शुरुआती दौर में वो सट्टा बाजार में पैसा लगाते थे. इसमें उन्हें जहां बदनामी मिली. वहीं लोगों का भरोसा भी खोया. तब ये हालत हो गई कि कोई भी उनके साथ पैसों का लेन-देन पसंद नहीं करता था. लोगों ने उधार देना बंद कर दिया. एक बार उन्होंने पिता के वो 500 रुपए चुराए, जो उस फर्म के थे, जहां वो काम करते थे. हालांकि बाद में ये पैसा उन्होंने फर्म के मालिक को दोगुना लौटाया.

रामकृष्ण ने किशोरवय से जवानी तक खराब दिन. एक के बाद एक नाकामियों का मुंह देखा लेकिन जब सफल हुए तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.


पंडित ने हाथ देखकर कहा-किस्मत बदलने वाली है
ऐसे समय में जब किस्मत उन्हें हर ओर से दगा दे चुकी थी. वो ज्यादातर कामों में नाकामी देख चुके थे. तमाम लोगों का हजारों रुपया कर्ज के तौर पर चढ़ा था. तब एक पंडित जी उनका हाथ देखकर कहा, "तुम अगले एक हफ्ते में अमीर हो जाओगे, तुम्हारे हाथों में 1.5 लाख रुपए होंगे." ये हैरानी भरी बात थी. इस वो शख्स कैसे विश्वास कर सकता था, जिसकी जेब में तब 05 रुपए भी नहीं थे.

ऐसा हुआ. अचानक चांदी के दाम बढ़ने लगे. उन्होंने लंदन में चांदी की 04 फर्मों में जान-पहचान का फायदा उठाते हुए हजारों रुपए की चांदी बुक करानी शुरू की.हालांकि तब भी उनकी जेब में पैसे नहीं थे. लेकिन इसे ही किस्मत कहते हैं.

चांदी के बढ़े दामों ने वारा न्यारा कर दिया
तब चांदी के दाम चढ़े ही नहीं बल्कि बेतहाशा चढ़े. देखते ही देखते वाकई एक हफ्ते में उन्होंने डेढ़ लाख रुपए कमाया. इतना ज्यादा धन हाथ में आया तो सबका उधार खत्म किया. अब भी उनके पास काफी रुपए थे. जिस तरह उन्होंने सबसे पैसे वापस किए, उससे कोलकाता के व्यापार जगत में ऐसे शख्स बनकर उभरे, जो अब ना केवल विश्वसनीय बन चुका था बल्कि उसकी चतुराई और व्यापारिक बुद्धि की भी धाक जम चुकी थी.

इसी बीच चांदी को लेकर जब ब्रिटिश सरकार ने 20 के दशक में अपने नियम बदले, तब तो डालमिया की किस्मत ऐसी बदली कि वो जिस काम में हाथ डालते गए, उसमें सफलता मिलती गई. वो तरक्की की ऐसी सीढ़ियां चढ़ने लगे, जो सपने जैसी थी.

डालमिया इंडस्ट्री ने 20 से 40 के दशक के बीच देश में बहुत तेजी से विस्तार किया. देश के हर कोने में उनकी मौजूदगी थी. वो एविएशन से लेकर मीडिया तक तमाम बिजनेस सेक्टर्स में थे.


घर-घर में पहुंच गया डालमिया का नाम
स्थिति ये हो गई कि 20  लेकर 40 के दशक के बीच डालमिया इंडस्ट्री का देश में तेजी से विस्तार हुआ. देश के हर कोने में उनके कारखाने और आफिस खुलने लगे. डालमिया इंडस्ट्री बीमा, बैंकिंग, मीडिया, केमिकल, एविएशन, आयरन, सीमेंट, वस्त्र उद्योग और खाद्य पदार्थ समेत तमाम सेक्टर्स में पैर पसार चुकी थी.

जिन्ना से गहरी दोस्ती थी
कांग्रेस के बड़े नेता उनके दोस्त थे. उनकी बात सुनी जाती थी. गांधीजी से उनकी मुलाकातें होती थीं. लेकिन शायद उनके सबसे गहरे दोस्त अगर कोई थे तो वो पाकिस्तान के संस्थापक और मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना थे. जिन्ना और डालमिया में ढेर सारी विभिन्नताएं थीं लेकिन इसके बाद भी दोनों आपस में गहरे दोस्त थे.

पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना से डालमिया से गहरी दोस्ती थी. दोनों के बीच तमाम तरह की बातें होती थीं. जब जिन्ना पाकिस्तान गए तो दिल्ली का अपना बंगला डालमिया को बेचकर गए.


जिन्ना ने उन्हें दिल्ली का अपना बंगला बेचा
जब जिन्ना ने अगस्त 1947 के दूसरे हफ्ते में हमेशा हमेशा के लिए भारत छोड़ा तो नई दिल्ली का अपना लंबा चौड़ा 10, औरंगजेब रोड (अब कलाम रोड) स्थित बंगला डालमिया को बेचकर गए. जिन्ना अक्सर दिल्ली में डालमिया हाउस में आकर घंटों रामकृष्ण डालमिया के साथ बातें करते रहते थे. नीलिमा डालमिया की किताब के अनुसार, दोनों अपने सीक्रेट्स, डर और राजनीति समेत तमाम बातों पर डिस्कस करते थे. आपस में हंसते थे. शायद वो डालमिया ही थे जो जिन्ना को कुछ भी कहने की हिम्मत रखते थे. जिन्ना उसे मित्रवत ही लेते थे.

जीवन में 06 शादियां कीं
डालमिया ने अपने जीवन में एक-दो नहीं बल्कि छह शादियां की. जिस समय डालमिया ने एक के बाद एक छह शादियां रचाईं, उस समय भी ऐसा करने के बारे कोई सोच भी नहीं सकता था. हालांकि उन्होंने कभी इन सबकी परवाह भी नहीं की.

रामकृष्ण डालमिया की बेटी नीलिमा डालमिया अधर ने उन पर जो किताब लिखी है, उसमें उनकी 06 शादियों और कुछ अफसानों का बेबाकी से जिक्र किया गया है.


नीलिमा डालमिया अधर ने अपनी किताब "फादर डियरेस्टः द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ आर के डालमिया" में उनकी शादियों और कई रोमांस के बारे में लिखा है. वह बातचीत में कहती हैं," उनके पिता खुद को किसी राजा से कम नहीं समझते थे, लिहाजा उसी तरह की जिंदगी जीने में उनका यकीन भी था. चाहे वो ताकत के मामले में रहा हो या फिर महिलाओं के बारे में."

पहली शादी बहुत कम उम्र में
डालमिया की पहली शादी बहुत कम उम्र में हुई. पहली पत्नी नर्मदा की उम्र महज 12 साल थी. लेकिन महज दो तीन साल में ही उनकी मृत्यु हो गई. इसके बाद उनकी मां ने उनकी दूसरी शादी दुर्गा से की. लोगों को लगा अब रामकृष्ण दुर्गा के साथ जिंदगी भर खुश रहेंगे. लेकिन किसे मालूम था कि वह अपने जीवन में शादियों का रिकार्ड ही बना देंगे.

फिर पंजाबी युवती प्रीतम से शादी
दूसरी शादी के कुछ ही सालों बाद उनका दिल आधुनिक तौरतरीकों वाली सुंदर पंजाबी युवती प्रीतम पर आ गया. गुपचुप शादी भी कर डाली. जब उन्होंने इसके बारे में दूसरी पत्नी दुर्गा और परिवार को बताया तो खूब विरोध हुआ लेकिन डालमिया कहां टस से मस होने वाले थे. डालमिया ने उन्हें दिल्ली में रहने के लिए अलग बड़ा सा घर दिया. जल्दी ही ये प्यार खत्म हो गया.

फिर दो और गुप्त शादियां
डालमिया ने इसके बाद जल्दी जल्दी दो शादियां और कर डालीं. नई बीवियों के नाम थे सरस्वती और आशा. आशा बंगाली थीं. ये दोनों शादियां गुप्त तरीके से हुईं.

फिर युवा कवियित्री आ गईं पसंद
डालमिया यहीं नहीं रुके. उन्हें एक और युवती पसंद आ गईं. वह राजस्थान की उभरती हुई कवियित्री थीं. नाम था दिनेश नंदिनी. डालमिया संस्थान से ही मिलने वाले सक्सेरिया प्राइज से दिनेश नंदिनी की किताब को पुरस्कृत किया गया. डालमिया ने पुरस्कार समारोह में उन्हें पहली बार देखा और पसंद कर लिया.

दो साल तक शादी के लिए मनाते रहे
दो साल तक दोनों के बीच पत्रों का व्यवहार होता रहा. डालमिया उन्हें बार बार शादी के लिए मनाते रहे. आखिरकार वह मान तो गईं लेकिन एक शर्त पर कि इसके बाद वह शादी नहीं करेंगे. नीलिमा डालमिया कहती हैं, ये शादी भी गुप्त तरीके से ही बनारस में डालमिया के गंगा के किनारे स्थित घर पर हुई. लेकिन जब मेरी मां को पता लगा कि ये शादी गुप्त रूप से होगी तो उनका माथा ठनका. अब वो कुछ नहीं कर सकती थीं. शादी के तुरंत बाद डालमिया ने उन्हें लंदन में जाकर रहने को कहा लेकिन मेरी मां ने साफतौर पर मना कर दिया, तब उन्हें दिल्ली में एक बड़ा घर दिया गया.

छठी शादी का विरोध
जब ये छठी शादी हुई तो इसका खासा विरोध हुआ. डालमिया के बच्चे काफी बड़े हो रहे थे. उनके भाई और मां ने भी इस पर काफी इतराज किया. लेकिन शादी तो हो चुकी थी.

अंग्रेज युवती पर दिल आया
डालमिया जी ने छठी शादी के बाद वन वर्ल्ड मूवमेंट शुरू किया. जिसके लिए वह अपने प्राइवेट विमान से कई देशों में गए. उन्हें अच्छा रिस्पांस भी मिला. वह छठी पत्नी दिनेश नंदिनी के साथ इसी सिलसिले में अमेरिका गए. वहां उनका दिल एक अंग्रेज युवती पर आ गया. अपनी किताब में नीलिमा लिखती हैं कि अमेरिका में उनके पिता का दिल एक अंग्रेज युवती पर आ गया. हालांकि फिर ये प्रकरण खत्म भी हो गया.

क्या फातिमा जिन्ना से भी थीं नजदीकियां
चर्चाएं तो ये भी थीं कि उनके रिश्ते मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना से भी थे. नीलिमा याद करती हैं कि उनकी मां दिनेश नंदिनी अक्सर कहा करती थीं, तुम्हारे पिता की नजदीकियां फातिमा के साथ भी थीं, क्योंकि वह अक्सर उनके साथ रहते थे. फातिमा जिन्ना अकेले ही रहती थीं. हालांकि नीलिमा को संदेह है कि उनके पिता के रिश्ते जिन्ना की बहन से रहे होंगे. इसमें कोई शक नहीं कि जिन्ना और उनकी बहन के साथ जितने अच्छे रिश्ते डालमिया से थे, उतने शायद ही किसी से रहे हों.

बंटवारे के बाद नेहरू से विवाद और खराब दिन
हालांकि 1947 में आजादी के बाद उनके दिन बदलने लगे. परिवार में बंटवारा हो गए. प्रधानमंत्री नेहरू से खराब रिश्तों का नतीजा भी उन्हें भुगतना पड़ा. वो तीन साल के जेल भी गए. जब वह लौटे तो उनके लिए स्थितियां बदल चुकी थीं. वह दोबारा फिर अपना वो रूतबा और आर्थिक मजूबती हासिल नहीं कर पाए. 1978 में 85 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया.
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