Corona: रिकवरी के बाद भी एक तिहाई लोग नहीं दे सकते प्लाज्मा, बड़ा है खतरा

Corona: रिकवरी के बाद भी एक तिहाई लोग नहीं दे सकते प्लाज्मा, बड़ा है खतरा
रिकवर हो चुके लगभग एक तिहाई लोग चाहें तो भी अपना ब्लड प्लाज्मा डोनेट नहीं कर सकते (Photo-pixabay)

कोरोना में प्लाज्मा थैरेपी (plasma therapy for coronavirus patients) से फायदों के बीच एक परेशान करने वाली खबर आई है. ठीक होने के बाद भी लगभग एक तिहाई कोरोना मरीज चाहकर भी प्लाज्मा डोनेट नहीं कर सकते.

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दुनियाभर में कोरोना का आंकड़ा 1 करोड़ 30 लाख पार कर चुका है. वैक्सीन के लिए ट्रायल हो रहे हैं. साथ ही मौजूदा दवाओं से मरीजों के इलाज की कोशिश चल रही है. दवाओं पर कोई मरीज प्रतिक्रिया करता है तो कोई नहीं भी करता. रिकवर हो चुके लोगों के शरीर का ब्लड प्लाज्मा काफी असरदार माना जा रहा था. लेकिन इसी बीच एक्सपर्ट्स को पता चला है कि रिकवर हो चुके लगभग एक तिहाई लोग चाहें तो भी अपना ब्लड प्लाज्मा डोनेट नहीं कर सकते हैं. इससे गंभीर स्थिति में पहुंचे कोरोना मरीजों के इलाज पर असर हो सकता है.

क्यों नहीं दे सकते प्लाज्मा
ब्लड प्लाज्मा को कोरोना के इलाज में एक बड़ी संभावना की तरह देखा जा रहा है. इसपर कई रिसर्च हो रहे हैं. इसी बीच दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बाइलरी साइंसेज (ILBS) के प्लाज्मा बैंक में एक अलग ही बात निकलकर आई. टाइम्स ऑफ इंडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक यही के प्लाज्मा बैंक के लिए काम कर रहे एक्टपर्ट्स ने ये जांच की. उन्होंने देखा कि 10 में से 3 मरीजों के खून में उतनी मात्रा में एंटीबॉडीज ही नहीं होती हैं, जो किसी दूसरे को ठीक कर सकें.

फिलहाल प्लाज्मा लेते हुए सारे देश अमेरिका के Food and Drug Administration (FDA) के मानकों पर चल रहे हैं (Photo-pixabay)

क्या हैं खतरे


रिकवरी के बाद ऐसे लोगों से एंटीबॉडी लेना और भी खतरनाक हो सकता है क्योंकि इससे जिस मरीज को प्लाज्मा दिया जा रहा हो, उसके ठीक होने की संभावना भी कम रहती है. साथ ही हो सकता है कि कम एंटीबॉडी के कारण रिकवरी के बाद भी किसी को दोबारा कोरोना का खतरा हो. हालांकि अभी ये साफ नहीं है कि शरीर में एंटीबॉडी की कम मात्रा के होने का दोबारा कोरोना होने से कितना संबंध है. और क्या वक्त के साथ उसमें एंटीबॉडी की मात्रा बढ़ सकती है? ILBS अस्पताल के डायरेक्टर डॉ एसके सरीन ने बताया कि फिलहाल कम एंटीबॉडी वाले लोग अगर प्लाज्मा डोनेशन के लिए आएं तो उनसे प्लाज्मा नहीं लिया जा रहा, बल्कि दो हफ्ते बाद दोबारा आने को कहा जा रहा है.

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इस तरह से लिया जा रहा प्लाज्मा
फिलहाल प्लाज्मा लेते हुए सारे देश अमेरिका के Food and Drug Administration (FDA) के मानकों पर चल रहे हैं. इसके तहत antibody titre तैयार किया जाता है. यानी रिकवर हो चुके व्यक्ति के सैंपल को लेकर उसे डायल्यूट किया जाता है कि ताकि ये देखा जा सके कि उसमें कितनी एंटीबॉडी है. फिलहाल प्लाज्मा डोनेशन के लिए neutralizing antibody titer का रेश्यो 1:160 है. ये एक तरह का मानक है, जिसके होने पर ही किसी से प्लाज्मा ले सकते हैं. अगर ये रेश्यो न मिल सके तो 1:80 से भी काम चल सकता है.

कम निकल रही एंटीबॉडी
इधर रिकवर हो चुके बहुत लोगों के शरीर में एंटीबॉडी इतनी कम होती है कि वे इस मानक पर पूरे नहीं उतर पाते. टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर में मैक्स हेल्थकेयर के मेडिकल डायरेक्टर डॉ संदीप बुधीराजा ने बताया कि उनके यहां प्लाज्मा डोनेट करने के इच्छुक 25% लोगों में antibody titer 1:40 से भी कम आ रहा है. यानी ये लोग चाहकर भी प्लाज्मा नहीं दे सकते और न इनसे लिया जा सकता है.

वैसे कोरोना से रिकवर हो चुके एक व्यक्ति के ब्लड प्लाज्मा से चार मरीजों की मदद हो सकती है (Photo-pixabay)


वैसे अभी ये पता नहीं चल सका है कि लो-एंटीबॉडी के कारण ये लोग क्या फिर से कोरोना संक्रमित हो सकते हैं. ये भी नहीं पता है कि एंटीबॉडी की कितनी मात्रा कोरोना को रोक सकने के लिए पर्याप्त होगी या फिर कितने वक्त तक एंटीबॉडी असरदार रहेगी. कई-कई मामलों के कोरोना संक्रमित कुछ ही महीने के भीतर दोबारा संक्रमित हुए, ऐसे भी मामले आए हैं.

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क्या है प्लाज्मा थैरेपी और कैसे करती है काम
माना जा रहा है कि कोरोना से रिकवर हो चुके एक व्यक्ति के ब्लड प्लाज्मा से चार मरीजों की मदद हो सकती है. ये थैरेपी इस धारणा पर काम करती है कि रिकवर्ड लोगों के शरीर की न्यूट्रलाइज एंटीबॉडी मरीज के शरीर में डालें तो उसे वायरस से लड़ने में मदद होती है. हालांकि साथ में बाकी उपचार भी चलते रहते हैं. प्‍लाज्‍मा थेरेपी या पैसिव एंटीबॉडी थेरेपी के लिए उस व्‍यक्ति के खून से प्‍लाज्‍मा लिया जाता है, जिसे कोरोना वायरस से उबरे हुए 14 दिन से ज्‍यादा हो चुके हों. संक्रमण से उबर चुके अलग-अलग लोगों के शरीर में अलग-अलग समय तक एंटीबॉडीज बनती रहती हैं. ये उसको हुए संक्रमण की गंभीरता और रोग प्रतिरोधी क्षमता पर निर्भर करता है. इसके अलावा प्लाज्मा देने वाले व्यक्ति की पूरी जांच की जाती है कि कहीं उसे कोई और बीमारी तो नहीं है.
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