नीति आयोग ने बजाई थी पानी को लेकर खतरे की घंटी, सिर्फ तीन राज्यों ने सुनी

देश में जलसंकट बेहद खतरनाक हो चुका है, इससे उबरने के लिए राज्य सरकारों ने मनरेगा जैसी योजनाओं के तहत पानी से जुड़े जो काम किए, न्यूज़18.कॉम ने उनकी पड़ताल की तो ये बातें सामने आईं.

News18Hindi
Updated: June 30, 2019, 1:55 PM IST
नीति आयोग ने बजाई थी पानी को लेकर खतरे की घंटी, सिर्फ तीन राज्यों ने सुनी
जलसंकट से त्रस्त लोग चेन्नई में राज्य सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए.
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Updated: June 30, 2019, 1:55 PM IST
देश में 60 करोड़ लोग पानी ​की किल्लत और जलसंकट के तनाव से बुरी तरह जूझ रहे हैं. यह बात पिछले साल जून में नीति आयोग की रिपोर्ट में कही गई थी और यह भी कहा गया था कि देश के तीन चौथाई घरों में पीने का पानी नहीं है. इस रिपोर्ट ने और भी बिंदु उठाए थे जैसे देश में करीब 70 फीसदी पानी दूषित है, इसलिए 122 देशों की पानी की क्वालिटि इंडेक्स में भारत का नाम 120वें नंबर पर रहा. जल प्रबंधन इंडेक्स रिपोर्ट में सरकार के थिंक टैंक ने सभी राज्यों को जल संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े प्रदर्शन के आधार पर तीन वर्गों में बांटा था - उच्च, मध्यम और निम्न.

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इस वर्गीकरण में जल प्रबंधन से जुड़े कई बिंदुओं का मद्देनज़र रखा गया था जैसे नदियों, तालाबों जैसी जल इकाइयों का पुनरुद्धार, भूमिगत जलस्तर जैसे जल स्रोतों का संवर्धन और सिंचाई की क्षमताओं का विकास. न्यूज़18.कॉम ने इस पूरे परिदृश्य की समीक्षा की कि जलसंकट से जूझ रहे राज्यों ने कैसे इस दिशा में काम किया और मनरेगा व आजीविका सुरक्षा कार्यक्रम जैसी योजनाओं को किस तरह क्रियान्वित किया. नतीजा ये निकला कि एक निराशाजनक तस्वीर सामने आई और जो राज्य अच्छा प्रदर्शन करते पाए गए, वो भी बेहतर नहीं कर सके.

कौन से राज्य रहे टॉप पर और कौन से राज्य पिछड़े

अच्छा प्रदर्शन करने वाले तीन राज्यों में गुजरात, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश का नाम रहा. बाकी तमाम राज्य मध्यम या निम्न दर्जे का प्रदर्शन कर सके. कुछेक राज्यों से डेटा नहीं मिलने के चलते इस समीक्षा में वो शामिल नहीं हो सके. चेन्नई गंभीर जलसंकट की चपेट में है और तमिलनाडु उन सात राज्यों की सूची में दिखा, जिन्होंने मध्यम दर्जे का प्रदर्शन किया. समीक्षा के दायरे में आए राज्यों में से 60 फीसदी ने निम्न दर्जे का प्रदर्शन किया और यहां जल संरक्षण को लेकर बेहद बुरी स्थिति पाई गई.

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'अलार्मिंग' यानी खराब दर्ज का प्रदर्शन करने वाले राज्यों में घटते क्रम में : छत्तीसगढ़, सिक्किम, राजस्थान, गोवा, केरल, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, असम, नागालैंड, उत्तराखंड और मेघालय का नाम शामिल रहा. रिपोर्ट के मुताबिक असम, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे हिमालयीन राज्यों सहित गोवा, उप्र, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और ओडिशा में 2015-16 के मुकाबले हालात और खराब दिखे. नीति आयोग की रिपोर्ट में इन राज्यों को 2016-17 में खराब प्रदर्शन के लिए पहले ही चेता दिया गया था.

पानी के लिए नहीं हुए काम
आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश हालांकि उच्च प्रदर्शन वाले दो राज्य रहे लेकिन इन दोनों राज्यों में मनरेगा योजना के अंतर्गत होने वाले पानी संबंधी कुल कामों में कमी देखी गई. इनके अलावा गोवा और फिर मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल जैसे राज्यों में 2017-18 के दौरान फैले हुए सिंचाई क्षेत्र में काम को लेकर भारी कमी देखी गई. तेलंगाना में भूमिगत जलस्तर के कामों को लेकर 11 गुना कमी आई तो वहीं, आंध्र प्रदेश, झारखंड और अरुणाचल में दोगुनी कमी देखी गई.

2016-17 के मुकाबले 2018-19 में देश भर में कुओं के निर्माण की मंज़ूरियों और काम पूरे होने के मामलों में तीन गुना कमी आई. इस मामले में केरल, गुजरात, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और झारखंड सबसे पीछे रहे.

14 राज्यों ने किया कम स्कोर
उस देश में जहां, जल संसाधनों की उपलब्धता सीमित है और पानी की मांग लगातार बढ़ रही है, भूमिगत जलस्तर का संरक्षण और संवर्धन सबसे बेहतर उपाय है. इसी बिंदु पर फोकस करते हुए भूमिगत जलस्तरों में सुधार और सिंचाई योजनाओं पर काम के लिहाज़ से, रिपोर्ट में 14 राज्यों ने 2016-17 के दौरान मानक स्कोर से कम स्कोर किया. इन राज्यों में बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, हरियाणा, झारखंड, मेघालय और ओडिशा शामिल रहे.

पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 2017-18 के दौरान दोनों पैमानों पर कम काम करने वाले राज्यों के तौर पर हरियाणा, मेघालय, ओडिशा और सिक्किम का उल्लेख नीति आयोग की रिपोर्ट में किया गया. उल्लेखनीय ये भी है कि गोवा ने भूमिगत जल संवर्धन या कृषि जलाशय पुनरुद्धार के लिए कोई काम नहीं किया.

50 फीसदी भी नहीं हुए पानी के लिए काम
रिपोर्ट की मानें तो जल संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों से लाखों रोज़गार पैदा होते हैं और मनरेगा के तहत होने वाले कुल कामों में तकरीबन 80 फीसदी योगदान इन्हीं कार्यक्रमों का होता है. यह देश में रोज़गार के संकट के चलते एक महत्वपूर्ण बात है. हालांकि मनरेगा के उपलब्ध डेटा के आधार पर इस बात में सच्चाई नज़र नहीं आती. 2014-15 से देश में पानी से जुड़े कामों का योगदान लगातार घट रहा है और साथ ही, इन कामों पर होने वाला खर्च भी.

गोवा को छोड़कर, निम्न दर्जे का प्रदर्शन करने वाले तमाम राज्यों में 2014-15 के बाद से पानी संबंधी काम कुल कामों के 50 फीसदी भी नहीं हुए. 2014-15 से ही, पानी से जुड़ी योजनाओं पर औसतन 50 फीसदी से ज़्यादा खर्च भी नहीं हुआ है, गोवा और तमिलनाडु को छोड़कर.



ये है डेटा मशीनरी की हकीकत
इस विश्लेषण में सरकारी डेटा संग्रह मशीनरी की एक धुंधली तस्वीर सामने आती है. सीडब्ल्यूआईएम की रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल, अरुणाचल, जम्मू कश्मीर, मणिपुर और मिज़ोरम से डेटा के अभाव में इनका उल्लेख नहीं है. मनेरगा डेटा पिछले साल से लगातार बदल रहा है. दावा किया जाता है कि मनेरगा संबंधी डेटा डेली बेसिस पर अपडेट होता है लेकिन हर राज्य में हुए पानी सबंधी कामों को लेकर पिछले साल का डेटा मौजूद ही नहीं है.

पर्यावरणविद और कार्यकर्ता राजन पंडा रिपोर्ट की आलोचना करते हुए कहते हैं कि सरकारी थिंक टैंक ने राज्यों का वर्गीकरण 'प्रयोजन' के आधार पर किया है. पंडा के मुताबिक रिपोर्ट क्लाइमेट चेंज, जल स्रोतों के प्रदूषण और प्रदूषण नियंत्रण के बारे में उपयोगी नहीं हो पाती. पंडा ने कहा कि 'यही कारण है कि क्यों गुजरात जैसे सबसे प्रदूषित राज्यों को असरदार जल प्रबंधन के लिए उच्च रैंक मिली'.

(रिपोर्ट : स्वाति डे)

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First published: June 30, 2019, 1:25 PM IST
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