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झारखंड: पहली बार 5 साल राज करने वाले रघुवर दास के सिर पर क्या दोबारा सजेगा ताज?

News18Hindi
Updated: December 23, 2019, 7:10 AM IST
झारखंड: पहली बार 5 साल राज करने वाले रघुवर दास के सिर पर क्या दोबारा सजेगा ताज?
28 दिसंबर 2014 को रघुवर दास ने राज्य के पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. इसके साथ ही राज्य की राजनीति एक नई दिशा की तरफ मुड़ गई.

झारखंड (Jharkhand) में शुरू से ही राजनीतिक अस्थिरता (Political Instability) रही. झारखंड की राजनीतिक अस्थिरता को कुछ इस तरह समझिए कि राज्य में 19 साल में 13 सरकारें बदलीं.

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  • Last Updated: December 23, 2019, 7:10 AM IST
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बिहार (Bihar) से अलग होकर झारखंड (Jharkhand) को अलग राज्य बने 19 साल बीत चुके हैं. साल 2000 में एक लंबी लड़ाई के बाद झारखंड एक अलग राज्य तो बना लेकिन राजनीतिक अस्थिरता का दौर बना रहा. राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने बाबू लाल मरांडी. उनके बाद कई सरकारें बनीं लेकिन पूर्ण बहुमत की सरकार आने में 14 साल लग गए. 2014 में राज्य में पहली बार किसी पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई. बीजेपी ने सभी विरोधी दलों को पछाड़ते हुए विधानसभा की 81 सीटों में 37 पर कब्जा किया. 28 दिसंबर 2014 को रघुवर दास ने राज्य के पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. इसके साथ ही राज्य की राजनीति एक नई दिशा की तरफ मुड़ गई.

13 साल 13 सरकारें
झारखंड में शुरू से ही राजनीतिक अस्थिरता रही. झारखंड की राजनीतिक अस्थिरता को कुछ इस तरह समझिए कि राज्य में 19 साल में 13 सरकारें बदलीं. इस दौरान यहां राज्य में 3 साल राष्ट्रपति शासन भी रहा. इस वजह से भी वहां लोग रघुवर दास की सरकार को एक नए बदलाव की रूप में देखते हैं.

सीएम रघुवर दास ने जमशेदपुर के भालूवासा में परिवार के साथ मतदान किया

गोविंदाचार्य ने दिया था पहली बार टिकट
रघुवर दास ने भी बीजेपी के भरोसे को टूटने नहीं दिया और पहले चुनाव में ही भारी मतों से जीत हासिल की. रघुवर दास पहली बार 1995 में जमशेदपुर (पूर्वी) सीट से चुनाव जीतकर विधायक बने थे. इस चुनाव में बीजेपी के विचारक रहे गोविंदाचार्य ने उन्हें टिकट दिया था और रघुवर दास की इस जीत को उस वक्त की बहुत बड़ी जीत माना जाता है. गौरतलब है कि उस वक्त बिहार से झारखंड अलग नहीं हुआ था. इसके बाद उन्होंने इस सीट पर लगातार 5 बार चुनाव जीता.

इस चुनाव में क्या हो सकता है नतीजाबीते एक-दो सालों के दौरान रघुवर सरकार को आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है. पार्टी के भीतर भी उनके खिलाफ आवाज उठी है. पार्टी के दिग्गज नेता सरयू राय उनके हराने के लिए चुनाव मैदान में हैं.

इस चुनाव में बीजेपी ने 65 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है. हालांकि टिकट बंटवारे को लेकर गुटबाजी और अन्य मुद्दों के देखते हुए राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ये लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा. राज्य का सबसे दिलचस्प मुकाबला भी सीएम रघुवर दास की सीट पर ही है. इस सीट पर उनके सामने सरयू राय खड़े हैं, जिनसे पार पाना आसान नहीं होगा. इसी सीट से कांग्रेस के गौरव वल्लभ भी उम्मीदवार हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके अलावा अर्जुन मुंडा की बढ़ती लोकप्रियता भी रघुवर दास के लिए चिंता वाली बात है. माना जा रहा है कि अगर पार्टी फिर बहुमत हासिल करने में नाकामयाब रहती है तो अर्जुन मुंडा का चेहरा आगे किया जा सकता है. अर्जुन मुंडा वर्तमान में केंद्रीय मंत्री हैं और राज्य के प्रमुख आदिवासी चेहरे के तौर पहचान रखते हैं. वो राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. साथ ही आजसू के साथ अलगाव भी बीजेपी के लिए समस्या वाली बात है.

झारखंड के सीएम के बारे में दिलचस्प बातें
राजनीति में आने से पहले रघुवर दास टाटा स्टील रोलिंग मिल में बतौर कर्मचारी काम करते थे. एक मामूली कर्मचारी से सीएम बनने तक का उनका सफर काफी दिलचस्प रहा है. टाटा स्टील में काम करने के दौरान ही रघुवर ने लोगों के हक में लड़ना शुरू कर दिया था.

सीएम रघुवर दास ने जमशेदपुर के भालूवासा में परिवार के साथ मतदान किया

86 बस्तियों को दिलाया था मालिकाना हक
दरअसल, जब रघुवर दास टाटा स्टील में काम कर रहे थें तब उन्होेंने अपनी सूझबूझ और कठिन प्रयास से टाटा स्टील के कब्जे में 86 बस्तियों को मालिकाना हक दिलाया था. जिन बस्तियों पर टाटा स्टील का कब्जा था वो सरकार के अधीन चली गई. उनके इस कदम ने जनता के दिल में उनके लिए एक खास जगह बना दी और वे जनता के सियासी हीरो बन गए.
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First published: December 22, 2019, 11:06 PM IST
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