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कौन होते हैं वो 5 लोग जो फांसी देते वक्त रहते हैं मौजूद

जेल मैन्युअल के मुताबिक फांसी होते केवल 5 लोग ही फांसी देख सकते हैं
जिनमें जेल सुपरिटेंडेंट, डिप्टी सुपरिटेंडेंट, RMO, मेडिकल अफसर और  मजिस्ट्रेट या उनके नुमाइंदे ADM शामिल हैं.

जेल मैन्युअल के मुताबिक फांसी होते केवल 5 लोग ही फांसी देख सकते हैं जिनमें जेल सुपरिटेंडेंट, डिप्टी सुपरिटेंडेंट, RMO, मेडिकल अफसर और मजिस्ट्रेट या उनके नुमाइंदे ADM शामिल हैं.

तिहाड़ जेल के पूर्व डीजी (Ex DG of Tihar Jail) ने बताया कि फांसी की सजा देते वक्त सिर्फ पांच लोग ही मौजूद रह सकते हैं. इसके लिए बाकायदा प्रावधान है.

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निर्भया केस के दोषियों को फांसी देने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है. दोषियों को 16 तारीख तक फांसी दी जा सकती है. इस बीच न्यूज़18  के आनंद तिवारी ने तिहाड़ जेल के पूर्व DG अजय कश्यप के साथ विस्तार से बातचीत की है. उन्होंने फांसी देने की प्रक्रिया के दौरान कुछ अहम पहलुओं के बारे में बताया है.

तिहाड़ के पूर्व डीजी ने बताया कि फांसी की सजा देते वक्त सिर्फ पांच लोग ही मौजूद रह सकते हैं. इसके लिए बाकायदा प्रावधान है. जेल मैन्युअल के मुताबिक फांसी होते हुए केवल 5 लोग ही देख सकते हैं
जिनमें जेल सुपरिटेंडेंट, डिप्टी सुपरिटेंडेंट, RMO, मेडिकल अफसर और  मजिस्ट्रेट या उनके नुमाइंदे ADM शामिल हैं. इसके अलावा फांसी की सजा पाने वाला दोषी चाहे तो वह उसके धर्म का कोई भी नुमाइंदा जैसे पंडित, मौलवी भी मौजूद रह सकता है.

क्या होता है ब्लैक वारंट
तिहाड़ जेल के पूर्व डीजी बताते हैं कि रूल्स बुक के मुताबिक लोअर कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वो ब्लैक वांरट जारी करे. ब्लैक वांरट जारी कोर्ट करता है लेकिन फांसी का वक्त जेल सुपरिंटेंडेंट तय करता है. सुपरिंटेंडेंट इसके बारे में कोर्ट को बताता भी है कि इतने बजे फांसी दी जाएगी. सामान्य तौर पर फांसी का वक्त सुबह के समय ही तय किया जाता है. वारंट जारी होने के बाद बहुत तेजी से फांसी से जुड़ी सभी तैयारी शुरू हो जाती हैं. जेल मैन्युअल में ब्लैक वारंट जारी होने के 15 दिन बाद फांसी दी जाएगी ये नियम है पर सरकार इसे बदल भी सकती है. ट्रायल कोर्ट जब ब्लैक वारंट जारी कर देता है तो जेल सुपरिटेंडेंट फांसी का समय सेशन जज और DG तिहाड़ को देता है. फांसी के वक्त जेल में बहुत गमगीन माहौल होता है इसलिए सभी कैदी अपनी बैरक में बन्द होते हैं.



क्या होती है फांसी कोठी
जिस दोषी को फांसी होने वाली है उसे फांसी कोठी या सिंगल सेल में शिफ्ट कर दिया जाता है. उस पर 24 घंटे निगरानी के अलावा मेडिकल और मानसिक चेकअप किया जाता है. जिससे जाना जा सके कि वो ठीक है या नहीं. वो मेंटली और फिजिकली फिट है या नहीं. ताकि ऐसा कुछ है तो उसका इलाज किया जाए. उसकी रिपोर्ट तैयार होती है.

दी जाती है डमी फांसी
फांसी होने से एक दिन पहले फांसी रस्सी को फिर से चेक किया जाता है. फिर उस रस्सी के साथ एक डमी फांसी दी जाती है, जिसमे फांसी के दोषी के शरीर के वजन से डेढ़ गुना ज्यादा वजन का डमी पुतला तैयार किया जाता है. फिर उसे फांसी के फंदे पर लटकाया जाता है. डमी सफल होने के बाद उस रस्सी और उस ड्रिल के हिसाब से असल फांसी दी जाती है.

फांसी वाले दिन जेल सुपरिंटेंडेंट अपने दफ्तर में चेक करता है कि आखिरी वक्त में कोई मैसेज या कोई कानूनी जानकारी तो नहीं आई है. फांसी रोकने से संबंधित अगर ऐसा कोई ऑर्डर नहीं आता है फिर जेल सुपरिटेंडेंट फांसी कोठी यानी कंडम सेल में जाता है.

उसके साथ RMO मजिस्ट्रेट या उनके नुमाइंदे ADM होते हैं और जेल सुरक्षा स्टाफ के लोग भी. उसके बाद आखिरी वक्त में अगर दोषी को कुछ साइन करना है या कोई दूसरी कागजी कार्रवाई बाकी है तो वो सभी की मौजूदगी में कराई जाती है. फिर सुपरिटेंडेंट मजिस्ट्रेट और RMO उस कंडम सेल से बाहर चले जाते हैं.

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निर्भया केस के दोषियों को फांसी देने की तैयारी में जुटा तिहाड़ जेल प्रशासन


पूर्व डीजी अजय कश्यप बताते हैं कि इसके बाद डिप्टी सुपरिटेंडेंट दोषियों के हाथ पीछे बांध देते हैं. फिर  तिहाड़ जेल के सुरक्षा स्टाफ के साथ उस दोषी को कंडम सेल से बाहर लेकर आया जाता है. डिप्टी सुपरिंटेंडेंट दोषी के चेहरे पर काला कपड़ा भी डाल देता है ताकि फांसी का दोषी किसी भी जेल स्टाफ की शक्ल न देख पाए.

उसके बाद फांसी के तख्ते पर ले जाने से पहले जेल सुपरिटेंडेंट काले कपड़े को हटाकर शिनाख्त करते हैं कि फांसी पर चढ़ने वाला शख्स वही है, जिसके नाम का ब्लैक वारंट पढ़ा गया है. इसके बाद अन्य प्रक्रिया फॉलो करते हुए दोषी को फांसी दे दी जाती है.
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