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क्या गंगा डॉल्फिन यानी सूंस के सपने सच होंगे?


Updated: December 24, 2019, 12:29 PM IST
क्या गंगा डॉल्फिन यानी सूंस के सपने सच होंगे?
कभी जो सूंस, गंगा की शान हुआ करती थी उस सूंस यानी डॉल्फिन का गंगा में सांस लेना भी मुश्किल हो गया है.

डॉल्फिन का गंगा में वही पद होता है जो जंगल में शेर का होता है और उसके खात्मे से पूरा ईको-सिस्टम गड़बड़ा जाता है. आगे बढ़ने से पहले डॉल्फिन के बारे में जान लेते हैं

  • Last Updated: December 24, 2019, 12:29 PM IST
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अचानक छोटे ने बोलना शुरू कर दिया. वो बोलता जा रहा था औऱ सुबकता जा रहा था. ‘एक तो जलीय जीव बिकते नहीं बाबूजी और मरी हुई डॉल्फिन का दाम भी 40 रूपए किलो है, वो भी अब सरकार ने खाने और बेचने से मना कर दिया है (डॉल्फिन का वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत किसी भी तरह से व्यापार नहीं किया जा सकता है, न ही उसका कोई अंग रखा जा सकता है) जो बड़ी मछली मिलती है, वो भी आधा जादव जी (यादव) ले लेते हैं. अब बताओ सरकार मछलियां मारने का पुश्तैनी धंधा हमारा औऱ मछली पकड़ने का लाइसेंस जादव जी के पासे काहे’ पटना से हाल ही में ट्रांसफर होकर भागलपुर आए थाना इंचार्ज दीनानाथ तिवारी जी ने वहां मौजूद सिपाही लक्ष्मण महतो को देखा. सिपाही समझ गया, ‘हेड साहब होता ये है कि ये यादव ने मछली मारने का लाइसेंस ले रखा है और उसी एक लाइसेंस पर 100 से ज्यादा मछुआरे मछली पकड़ते हैं, कोई रोकता है तो बता देते हैं कि यादव जी का जाल है. बस इसके बदले में उन्हें आधी आमदनी यादव को देनी होती है. अब इन ग़रीबों के पास इतना पैसा तो है नहीं कि सरकार से लाइसेंस ले लें’.

ये हिस्सा गंगा की स्थितियों को कहानियों के ज़रिए बयान करने वाली किताब दर दर गंगे का है. इसी किताब में आगे का एक और हिस्सा पढ़ते हैं फिर आगे की बात करेंगे.

‘वहीं बड़े नाले के पास, थाने से महज़ कुछ कदमों की दूरी पर कनछेदी ज़मीन पर कई सारी छोटी-बड़ी शीशियां रखकर आवाज़ लगा रहा है: “शरीर में कहीं भी दर्द हो शर्तियां इलाज, जोड़ों का दर्द हो या फिर सिर दर्द, कमर दर्द हो या पुराना कोई भी दर्द इस तेल की मालिश करिए, गठिए के दर्द का रामबाण इलाज, आइए, आइए आइए”. आवाज़ लगाते हुए वो बार-बार थाने की तरफ भी देख लेता है. कुछ ही देर में उसे छोटे आता हुआ दिखाई देता है, वो उसी की तरफ आ रहा है. कनछेदी अपने सामने खड़े ग्राहक को समझा रहा है, “वो सब छोड़ो साब ये देखो सूंस का असली तेल है. आपकी माताजी का गठिया का दर्द एक बार गया तो पलट के नहीं आएगा”.



जिस नाले के पास कनछेदी बैठा है वो नाला भी छोटे और कनछेदी के समान ही पारिस्थितिकीय तंत्र से अंजान है. थाने के अंदर झूठ बोल कर छूटने वाले छोटे और नाले के मुहाने पर बैठ कर तेल बेचने वाले कनछेदी के साथ ही ये नाला भी गंगा को मिटाने में अहम भागीदारी निभा रहा है. फर्क इतना है कि इंसान जानता है औऱ नाला अंजान है.



इंसान वाकई जानता है कि वो कितनी तबाही कर सकता है और कितनी तबाही का इल्जाम प्रकृति पर डाल सकता है. ऊपर बताए गए दो उद्धृरण इसलिए भी हैं क्योंकि कभी जो सूंस, गंगा की शान हुआ करती थी उस सूंस यानी डॉल्फिन का गंगा में सांस लेना भी मुश्किल हो गया है. राष्ट्रीय गंगा परिषद (एनजीसी) की हाल की बैठक में गंगा डॉल्फिन को बचाने और उनकी आबादी बढ़ाने के लिए एक प्रस्ताव पर गंभीरता से चर्चा की गई. कानपुर में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में नदियों से जुड़े शहर, घरों में जल निकासी समेत विभिन्न ऐसे मुद्दों पर चर्चा हुई, जिससे गंगा के जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है. गंगा और सहायक नदियों में डॉल्फिन की तेजी से कम हो रही संख्या को पर्यावरण से जुड़ा एक बड़ा खतरा माना गया है.

डॉल्फिन का गंगा में वही पद होता है जो जंगल में शेर का होता है और उसके खात्मे से पूरा ईको-सिस्टम गड़बड़ा जाता है. आगे बढ़ने से पहले डॉल्फिन के बारे में जान लेते हैं डॉल्फिन के बारे में-

माना जाता है कि डॉल्फिन का जन्म दो करोड़ साल पहले हुआ और डॉल्फिन ने लाखों साल पहले जल से जमीन पर बसने की कोशिश की लेकिन धरती का वातावरण डॉल्फिन को रास नहीं आया और फिर उसने वापस पानी में ही बसने का मन बना लिया. डॉल्फिन का गला अनोखा होता है जिससे ये करीब 600 तरह की आवाज़ निकाल लेती हैं. ये सीटी बजाने वाली एकमात्र जलीय जीव है. यही नहीं ये म्याउं-म्याउं भी कर सकती है और मुर्गे की तरह बांग भी दे सकती है. डॉल्फिन का शरीर टॉक्सिक और हेवी मेटल से भरा हुआ होता है. उसके मांस में तेज दुर्गंध होती है, उसे खाने से लोग बीमार पड़ सकते हैं. डॉल्फिन के तेल को लेकर जो भ्रांतिया फैली हुई है उसकी वजह से इसकी तस्करी भी बहुत होती है, खासकर बांग्लादेश की सीमा से लगे पाकुड़ क्षेत्र जो भागलपुर से 150 किमी दूर है में वहां इसकी काफी सप्लाई होती है. गंगा की डॉल्फिन की आंख तो होती है लेकिन वो लगभग अंधी होती है, आंख पर मौजूद मोटी झिल्ली की वजह से वो कोई भी इमेज बनाने में सक्षम नहीं होती है. इसलिए वो अल्ट्रासोनिक वेव से किसी की मौजूदगी का पता लगाती है.

क्या हैं चिताएं...

दरअसल गंगा डॉल्फिन के अस्तित्व को इस महान नदी के स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता है. डॉल्फिन स्वच्छ और ताजे पानी में ही जीवित रह सकती हैं. यहीं से वो सवाल खड़ा होता है जो गंगा परिषद, सरकार की नीतियों और पूरी प्रक्रिया को लेकर खड़े होते हैं. एक तरफ गंगा डॉल्फिन यानी सूंस को बचाने की बात की जा रही है, दूसरी तरफ सरकार खुद ऐसे कदम उठा रही है या उठा चुकी है जिससे सूंस के अस्तित्व पर खतरा और गहराता जा रहा है. मसलन दो अहम बातें - स्वच्छ और ताजा पानी, बारी बारी से इनके बारे में बात की जाती है. स्वच्छ पानी के लिए काफी कदम उठाये गए हैं जैसे लोगों में जागरुकता फैलाई गई है, लोग जागरुक भी हुए हैं. अरविंद मिश्रा मंदार नेचर क्लब के संस्थापक - जिनकी गंगा डॉल्फिन पर विशेषज्ञता है खासकर भागलपुर के करीब विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन पर - उनका कहना है कि जागरुकता तो बहुत बढ़ी है लेकिन धरातल पर कोई काम साफ नज़र नही आता है, धरातल पर गंगा वैसी ही मैली दिख रही है औऱ उस पर कोई विशेष काम नहीं दिख रहा है. हालांकि वे कहते हैं कि गंगा डॉल्फिन को लेकर विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन सेंचुरी की बात की जाए तो यहां गंगा की स्थिति स्थिर नज़र आती है लेकिन साथ ही वो बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के लग जाने से होने वाले दुष्परिणामों को लेकर भी चिंता जाहिर करते हैं जिनका सीधा असर गंगा डॉल्फिन पर ही पड़ेगा. लेकिन यहां ये समझने की ज़रूरत है की स्वच्छता को लेकर भले ही लोगों में जागरुकता आ गई हो, लोगों में सोशल मीडिया को लेकर एक डर बैठ गया हो और वो शिकायत के डर से सूंस के तेल और उनके अंगों को बेचने जैसे कामों को करने से डरने लग गए हों लेकिन गंगा को स्वच्छ रखने के लिए ज़रूरी चीज़ है उसमें ताजे पानी का बहाव जो होना संभव नज़र नहीं आता है क्योंकि गंगा के मुहाने पर सरकार की पन-बिजली परियोजनाओं ने गंगा के पानी को ताजा रहने ही नहीं दिया है.

एक बात और जो गंगा डॉल्फिन को लेकर सरकार की जताई चिंता पर सवाल खड़ा करती है वो ये है कि एक तरफ सरकार भारत के राष्ट्रीय जलीय जीव सूंस को बचाने की बात कर रही है, दूसरी तरफ वो बनारस से हल्दिया तक सस्ते जलमार्ग ट्रांसपोर्ट का तेजी से विस्तार कर रही है.

सरकार ने 2016 में राष्ट्रीय जलमार्ग कानून के तहत 111 अंतर्देशीय जलमार्ग चिन्हित किये हैं इनमें से 38 जलमार्ग डॉल्फिन के घर से गुज़रता है. इसका साफ मतलब है कि अगर हम विकास के मार्ग पर चलते हैं तो हम सीधे तौर पर गंगा के पारिस्थितिकीय तंत्र के साथ समझौता कर रहे हैं. जलमार्ग विकास परियोजना का लक्ष्य गंगा के वाराणसी और हल्दिया के बीच ऐसे जहाज चलाना है जो 1500 से 2000 टन माल ढो सके. इसका मतलब है इन मालवाहक जहाजों से निकलने वाला तेल, धुआं गंगा को प्रदूषित करेगा, ड्रेजिंग की समस्या और बढ जाएगी और साफ है कि इसका असर गंगा में रहने वाले जीवों पर पड़ेगा.

सरकार जलमार्ग पर जहाज चलाने के लिए गंगा में 45-60 मीटर चौड़ी और 2-3 मीटर गहरी एक नहर बना रही है जिससे किनारों पर होना वाला भूमिकटाव दिखने लगा है. हाल ही में भागलपुर में गंगा को बचाने में जुटे अयाज ने एक वीडियो साझा किया था जिसमें पीरपैंती में हो रहे भूमि कटाव की भयावहता साफ देखी जा सकती है. यही नहीं ड्रेजिंग की वजह से नदी की जलीय जीवन पर घातक असर पड़ेगा और तल में रहने वाले सूक्ष्मजीव जैसे केकड़े, स्पांज, क्लैम, वॉर्म्स जैसे असंख्य जीवों पर असर पड़ेगा.
अरविंद मिश्रा कहते हैं कि ये समझने की भी ज़रूरत हैं कि गंगा नदी पर चलने वाले जहाज ज्यादातर कोयला और क्रूड ऑइल लेकर जाएंगे और ये छलक कर गंगा में गिरेंगे और गंगा के पारीस्थितिकीय तंत्र को बरबाद करके रख देंगे.

कितनी हैं डॉल्फिन...
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक, असम और उत्तरप्रदेश की नदियों में 962 औऱ 1275 डॉल्फिन पाई गई हैं. लोगों की जागरुकता बढ़ने से डॉल्फिन कुछ हद तक संरक्षित हो रही है. आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पूरे भारत में डॉल्फिन की संख्या 3500 से ज्यादा हो जाएगी. अब तक देश में 2000 से भी कम डॉल्फिन बची होने का अनुमान था. लेकिन यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि गंगा में डॉल्फिन की संख्या में कोई खास इजाफा नजर नहीं आता है.

ऐसा माना जाता है कि भागलपुर के आसपास का विशाल क्षेत्र कभी हिमालय का ही हिस्सा था और लंबी भौगोलिक प्रक्रिया से होकर ये क्षेत्र खादरलैंड और भागरलैंड के बीच बंट गया. यही नहीं ये समुद्र का हिस्सा भी रहा है, जिसका साक्ष्य भागलपुर से 50 किलोमीटर दर मंदार पर्वत को देखकर लगता है जो पौराणिक समुद्र मंथन का आधार था. भले ही हम समुद्र मंथन जैसी कहानियों पर भरोसा ना करें लेकिन अमृत की तलाश सभी को है. अब पर्वत तो रहे नहीं तो जहाज चला कर गंगा को मथा जा रहा है और उससे सरकार पैसों का अमृत बनाने की कवायद में जुटी हुई है. इससे किसको क्या फर्क पड़ता है कि गंगा का सीना चीरकर आगे बढ़ते इन जहाजों से छलका तेल उस गरल के समान है जो पानी से हल्का होता है और ऊपर सतह पर फैल कर अंदर मौजूद प्रकृति को सांस नहीं लेने दे रहा है.

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First published: December 24, 2019, 11:00 AM IST
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