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मिशन गगनयान पर जा रहे हमारे अंतरिक्ष यात्री पहनेंगे केसरिया कपड़ा

News18Hindi
Updated: January 8, 2020, 2:49 PM IST
मिशन गगनयान पर जा रहे हमारे अंतरिक्ष यात्री पहनेंगे केसरिया कपड़ा
अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा के अनुभवों से भी मदद ली जाएगी

मिशन गगनयान (mission Gaganyaan) के लिए खास केसरिया रंग का स्पेस सूट (space suit) तैयार किया जा रहा है

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  • Last Updated: January 8, 2020, 2:49 PM IST
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प्रदीप

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख के. सिवन ने नए साल के पहले दिन ही इस बात की पुष्टि की है कि भारत के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन के लिए चार अंतरिक्ष यात्रियों का चयन किया गया है. सिवन ने कहा इसरो इस पर अच्छी प्रगति कर रहा है. इस महीने के आख़िर में चारों अंतरिक्ष यात्री रूस में प्रशिक्षण के लिए जाएंगे. गौरतलब है कि इनमें से आखिरकार तीन अंतरिक्ष यात्रियों को साल 2022 के लिए प्रस्तावित ‘मिशन गगनयान’ के अंतर्गत अंतरिक्ष में जाने का अवसर मिलेगा.

भारत जैसा विकासशील देश जिसकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थितियाँ बहुत विकट हैं. मगर इन सबके बावजूद भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सत्तर के दशक में जिस अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना की थी वह आज अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, जापान जैसे देशों को कड़ी टक्कर दे रहा है. कम संसाधनों में भी उसने चंद्रयान-1 को चांद पर भेजकर इतिहास रच दिया. बेहद कम लागत में तथा पहली ही कोशिश में मंगल ग्रह तक पहुंचने में कामयाब होने वाला भारत पहला देश बना. एक साथ रिकॉर्ड 104 सैटेलाइट का प्रक्षेपण कर भारत ने दुनिया के अंतरिक्ष बाजार में लंबी छलांग लगाई.

यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजना और उन्हें सकुशल धरती पर वापस लाना बेहद चुनौतीपूर्ण है (प्रतीकात्मक फोटो)


चंद्रयान-2 की आंशिक असफलता से रोवर प्रज्ञान के जरिए चांद की सतह की जानकारी इकट्ठा करने में बेशक बाधा आई, मगर ऑर्बिटर लगातार चंद्रमा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ पृथ्वी पर भेज रहा है. इसरो ने साल-दर-साल नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं. लेकिन स्वयं के अंतरिक्षयान से किसी भारतीय को अंतरिक्ष में भेजने का सपना अभी तक पूरा नहीं हुआ है.

अभी तक रूस, अमेरिका और चीन ने ही मनुष्य को अंतरिक्ष में भेजने में सफलता पाई है. हालांकि अगर सबकुछ योजना के मुताबिक हुआ तो भारत भी 2022 तक मानव को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता रखने वाले देशों की बिरादरी में शामिल हो जाएगा. विश्व की पहली मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान की उपलब्धि रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) को हासिल है. उसने 12 अप्रैल 1961 को ‘वस्तोक-1’ नामक अंतरिक्ष यान से यूरी गागरिन को अंतरिक्ष में भेजकर पूरी दुनिया को चकित कर दिया था.

इसके बाद मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ानों का सिलसिला बढ़ा और बाद में अमेरिका और चीन ने भी इस करिश्मे को अंजाम दिया. अंतरिक्ष में मनुष्य को भेजना कितना कठिन उद्यम है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आखिरी बार चीन ने 2003 में मानवयुक्त अंतरिक्ष यान भेजा था. तब से लेकर अब तक अन्य कोई भी देश मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान नहीं भर सका है. अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजना और उन्हें सकुशल धरती पर वापस लाना बेहद चुनौतीपूर्ण और दुरूह कार्य है. स्पष्ट है, यदि इस अभियान में इसरो सफल हो जाता है, तो वह अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्वदेशी तकनीकी शक्ति का लोहा पूरी दुनिया को मनवा सकता है.
3 अंतरिक्षयात्रियों को पृथ्वी की कक्षा में 7 दिनों के लिए भेजने की योजना है


मिशन गगनयान
15 अगस्त 2018 को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘गगनयान मिशन’ के माध्यम से 2022 में या उससे पहले अंतरिक्ष में भारतीय अंतरिक्ष यात्री भेज देने की घोषणा की थी. लाल किले की प्राचीर से उन्होंने कहा था, “जब भारत 2022 में आज़ादी की 75वीं सालगिरह मना रहा होगा, भारत मां का कोई लाल, चाहे बेटा हो या बेटी तिरंगा लेकर अंतरिक्ष में प्रस्थान करेगा.” हालांकि इसरो काफी लंबे समय से इस काम के लिए अपनी तरफ से लगा हुआ है, मगर प्रधानमंत्री की उक्त घोषणा ने समानवीय अंतरिक्ष उड़ान की एक निश्चित समय सीमा तय कर दी है. वर्ष 2004 में इसरो के ‘ह्यूमन स्पेस फ्लाइट प्रोग्राम’ के अंतर्गत ही समानवीय अंतरिक्ष मिशन की शुरुवात हो गई थी, लेकिन फंडिग की कमी के कारण इस काम में तेजी नहीं आ पा रही थी. और इस दौरान इसरो की चंद्रयान, मंगलयान, चंद्रयान-2 वगैरह को लेकर काफी व्यस्तताएं थीं. इस लिहाज से यह सही समय है कि अब इसरो मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन की ओर गंभीरतापूर्वक काम करे. इसके तहत 3 अंतरिक्षयात्रियों को पृथ्वी की कक्षा में 7 दिनों के लिए भेजने की योजना है.

इसरो का बाहुबली रॉकेट
गगनयान को अंतरिक्ष में लांच करने के लिए भारी-भरकम सैटेलाइटों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने में सक्षम ‘जीएसएलवी मार्क-3’ रॉकेट का उपयोग किया जाएगा. इसका पूरा नाम जिओसिंक्रोनस लांच व्हीकल मार्क-3 है. यह कक्षीय व्हीकल पूरी तरह से स्वदेशी तकनीकी पर आधारित है. जीएसएलवी रॉकेट के तीन मॉडल हैं. इसके मार्क-1 की भार वहन क्षमता (पेलोड का भार) 1.8 टन है, मार्क-2 अपने साथ 2.5 टन भारी सैटेलाइट ले जा सकता है, वहीं मार्क-3 अपने साथ 4 टन वजन के कम्यूनिकेशन सेटेलाइट को ले जाने में सक्षम है. अपने आकार और वजन के कारण इसे इसरो का बाहुबली भी कहा जाता है.

रूस, अमेरिका और चीन ने ही मनुष्य को अंतरिक्ष में भेजने में सफलता पाई है (प्रतीकात्मक फोटो)


14 नवंबर, 2018 को जीएसएलवी मार्क-3 डी2 रॉकेट के जरिये नवीनतम संचार उपग्रह जीसैट- 29 को पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया था. यह दूसरी बार था, जब इसरो ने जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट का सफल प्रक्षेपण किया. इस तरह यह विकास के चरण से निकलकर ऑपरेशनल चरण में पहुँच गया है. चूंकि इंसान को अंतरिक्ष में भेजने में कोई भी जोखिम नहीं लिया जा सकता इसलिए आने वाले दिनों में अगर जीएसएलवी मार्क-3 का एक भी प्रक्षेपण असफल हुआ, तो अंतरिक्ष में मनुष्य को भेजने की हमारी इस योजना पर ग्रहण लग सकता है. हालांकि इस दिशा में इसरो के गंभीर प्रयासों पर कोई भी संदेह नहीं किया जा सकता क्योंकि इसरो अब हर तरह की चुनौती को स्वीकारने में सक्षम है.

मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम
ह्यूमन स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम इसरो का स्वदेशी तकनीकी के माध्यम से भारतीय अंतरिक्ष यात्री को स्पेस में भेजने की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है. इस परियोजना पर इसरो वर्ष 2004 से काम कर रहा है, लेकिन फंडिंग के अभाव में काम ज्यादा प्रगति पर नहीं था. हालांकि इस दौरान इसरो ने मानव मिशन के लिए अधिकांश जरूरी आधारभूत तकनीकों का विकास और सफलतापूर्वक परीक्षण किया. केंद्रीय कैबिनेट द्वारा 28 दिसंबर, 2018 को मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान परियोजना को मंजूरी दे देने से इसरो की तैयारियों में तेजी आएगी. वर्तमान में डॉ. ललिताम्बिका वी.आर. ह्यूमन स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम का नेतृत्व कर रहीं हैं. इससे पहले डॉ. ललिताम्बिका ने विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के उप-निदेशक के पद रहते हुए 104 सैटेलाइट लॉन्च करने वाली टीम का नेतृत्व किया था और इसरो को इस उपलब्धि पर देश-विदेश में काफी सराहना मिली थी.

ह्यूमन स्पेस फ्लाइट प्रोग्राम के अंतर्गत ही समानवीय अंतरिक्ष मिशन की शुरुवात हो गई (प्रतीकात्मक फोटो)


गगनयान मिशन के तहत इसरो अंतरिक्ष में अपने अंतरिक्षयात्री भेजेगा, जो कम से कम 7 दिन अंतरिक्ष में बिताएंगे. भारत के इस मानव मिशन में तीन क्रू सदस्य होंगे जिन्हें जीएसएलवी-मार्क3 रॉकेट के जरिये पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजा जाएगा. इसरो का यह मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन गूढ़ता और जटिलता की दृष्टि से, अन्य सभी मिशन जो अब तक संचालित किए गए हैं, से अद्वितीय है. इस काम को अब तक केवल तीन ही देश अंजाम दे सके हैं.

जिस प्रकार अमेरिका के अंतरिक्ष यात्री को एस्ट्रोनॉट तथा रूस के अंतरिक्ष यात्री को कॉस्मोनॉट और चीन के अंतरिक्ष यात्री को टैक्नॉट कहा जाता है. उसी तर्ज पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को व्योमनॉट नाम दिया गया है. संस्कृत शब्द ‘व्योम’ का हिंदी अर्थ अंतरिक्ष होता है. गगनयान नामक भारतीय अंतरिक्ष यान का भार 7 टन, ऊंचाई 7 मीटर और करीब 4 मीटर व्यास की गोलाई होगी. गगनयान उन्नत संस्करण डॉकिंग क्षमता से लैस होगा. इसमें एक क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल होगा. क्रू मॉड्यूल में तीनों व्योमनाट्स रहेंगे. जबकि सर्विस मॉड्यूल में तापमान और वायुदाब को नियंत्रित करने वाले उपकरण, लाइफ सपोर्ट सिस्टम, ऑक्सीज़न और भोजन सामाग्री होगी. गगनयान मिशन के लिए खास केसरिया रंग का स्पेस सूट तैयार किया जा रहा है. फिलहाल दो सूट तैयार कर लिए गए हैं, तथा एक पर काम जारी है.

अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजना और उन्हें सुरक्षित रूप से धरती पर वापस लाना एक दुरूह और चुनौतीपूर्ण कार्य है. भेजने और वापस लाने की प्रक्रिया में कई चरण महत्वपूर्ण होते हैं, जैसे क्रू मॉड्यूल का प्रक्षेपण, अंतरिक्ष में निर्धारित काम को करना, वापसी में क्रू मॉड्यूल का स्पलैश डाउन या पैराशूट से पृथ्वी पर उतारना और आखिर में क्रू मॉड्यूल की रिकवरी. स्पेस शटल से अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजना तथा उन्हें वापस लाने की प्रक्रिया बेहद खर्चीली होती है, इसलिए हर देश स्पेस शटल की लागत का वहन करने में सक्षम नहीं होता. ऐसे देश अंतरिक्ष यात्रियों को कैप्सूल के द्वारा प्रक्षेपण रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजते हैं तथा वापसी में समुद्र में स्पलैश डाउन करवाकर क्रू मॉड्यूल की रिकवरी करते हैं.

इसरो अब हर तरह की चुनौती को स्वीकारने में सक्षम है (प्रतीकात्मक फोटो)


गगनयान मिशन के तहत 3.7 टन के अंतरिक्ष कैप्सूल के भीतर तीनों व्योमनाट्स को रखा जाएगा तथा जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट से उसे अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जाएगा और तकरीबन 16 मिनट में अंतरिक्ष की कक्षा में पहुंच जाएगा. इसे धरती की सतह से 300-400 किलोमीटर की दूरी वाली कक्षा में स्थापित किया जाएगा. सात दिन तक कक्षा में रहने के बाद गगनयान धरती की ओर लौटेगा. पृथ्वी की 120 किलोमीटर की ऊंचाई पर क्रू मॉड्यूल सर्विस मॉड्यूल से अलग हो जाएगा. क्रू मॉड्यूल से व्योमनाट्स अरब सागर या बंगाल की खाड़ी में उतरेंगे. इस संदर्भ में सोवियत संघ के ‘सोयुज टी-11’ यान से अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा के अनुभवों से भी मदद ली जाएगी. मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान से पहले इसरो दो मानव रहित उड़ान भेजेगा, जिससे तकनीकी तथा प्रोग्राम मैनेजमेंट जैसे पहलुओं पर विश्वास बढ़ाया जा सके.

कम नहीं हैं चुनौतियां
जटिलता और महत्वाकांक्षा की दृष्टि से गगनयान मिशन चंद्रयान और मंगलयान से अद्वितीय है. सबसे बड़ी चुनौती व्योमनाट्स को अंतरिक्ष भेजने और उन्हें कुछ समय बाद समुद्र में सुरक्षित ढंग से उतारने की है. और अंतरिक्ष यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को भारहीनता, गुरुत्वाकर्षण में कमी और कृत्रिम श्वास आदि समस्याओं से दो चार होना पड़ता है. इन समस्याओं के मद्देनजर अंतरिक्ष यात्रियों कुछ विशेष प्राथमिक सुविधाओं की आवश्यकता होती है. इस तरह की सुविधाओं से लैस अंतरिक्ष यान में यात्रियों को अंतरिक्ष में धरती जैसा माहौल मिलता है. बीते कुछ वर्षों में इसरो इन प्रौद्योगिकियों में से कुछ को विकसित करने में सफल रहा है, लेकिन कई अन्य को अभी भी विकसित और परीक्षण किया जाना बाकी है. प्रौद्योगिकियों में शामिल क्रू एस्केप सिस्टम नामक तकनीक आपातकालीन परिस्थितियों में क्रू मॉड्यूल में सवार अंतरिक्ष यात्रियों को बचाव सुविधा उपलब्ध कराता है.

मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान से पहले इसरो दो मानव रहित उड़ान भेजेगा (प्रतीकात्मक फोटो)


लाइफ सपोर्ट सिस्टम क्रू मॉड्यूल के अंदर बैठे हुए अंतरिक्ष यात्रियों के लिए पृथ्वी जैसा सुविधाजनक माहौल उपलब्ध कराता है. और रीएंट्री एंड रिकवरी तकनीक धरती पर वापसी के दौरान अंतरिक्ष यान को वायुमंडल में प्रवेश कराने के लिए सटीक गति और कोण मुहैया कराती है और अंतरिक्ष यात्रियों को सकुशल और सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर लाने में मदद करती है.

मिशन से जुड़े विशेषज्ञों मानना है कि मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन की राह में अब हमें ज्यादा मुश्किलों का शायद ही सामना करना पड़े. क्योंकि अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र भारत काफी बेहतर स्थिति में है और इसरो ने अब तक जो भी वादे किए हैं, उन्हें निश्चित समय-अवधि में सफलतापूर्वक पूरे भी किए हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसरो हर चुनौती को स्वीकारता है और उसमें अक्सर वह सफल होता है. अब हमें उस दिन का इंतजार है, जब गगनयान से भारतीय अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष की अनंत संभावनाओं को टटोलने के लिए उड़ान भरेंगे!
(लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं)

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First published: January 8, 2020, 2:39 PM IST
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