Opinion: JNU फीस विवाद- सुशील मोदी ये क्यों नहीं सोचते कि बिहार का छात्र बाहर क्यों जाता है?

Opinion: JNU फीस विवाद- सुशील मोदी ये क्यों नहीं सोचते कि बिहार का छात्र बाहर क्यों जाता है?
सुशील मोदी के जेएनयू संबंधी ट्विट ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है

इस ट्विट के बहाने ये बात भी होनी चाहिए कि गरीब बच्चे आखिर ऊंची फीस वाले अच्छे शिक्षण संस्थानों में कैसे पढ़ें और किस तरह बिहार के प्रतिभाशाली छात्रों को वहीं अच्छे कॉलेज और यूनिवर्सिटी मिल सके.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 20, 2019, 5:28 PM IST
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बिहार के उप मुख्यमंत्री (Deputy Chief minister of Bihar)  और भाजपा नेता सुशील मोदी (Sushil Modi) के जेएनयू (JNU) संबंधी ट्वीट (Twit) पर पैनी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं. होनी भी चाहिए. इसी बहाने उच्च शिक्षा और उसकी महंगी फीस पर भी बात हो जाए. ये भी बात हो जाए कि बिहार में क्यों अब तक कोई आला यूनिवर्सिटी क्यों नहीं खड़ी हो पाई. क्यों बिहार के ज्यादातर बच्चे स्कूल खत्म होते ही बाहर के राज्य की यूनिवर्सिटियों की ओर रुख करने लगते हैं.

पहले ये जानते हैं कि सुशील मोदी ने ट्विट में क्या लिखा है. उन्होंने लिखा "जेएनयू में फीस वृद्धि कोई इतना बड़ा मुद्दा नहीं कि इसके लिए संसद मार्च निकाला जाए. हकीकत यह है कि जो शहरी नक्सली इस कैम्पस में बीफ पार्टी, पब्लिक किसिंग, महिषासुर महिमामंडन, स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का मानभंजन और देश के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे लगाने जैसी गतिविधियों में लगे हुए हैं वो अब गरीब छात्रों को गुमराह कर राजनीतिक रोटी सेंकना चाहते हैं."


बिहार के नेता अपने बच्चों को बाहर क्यों पढाते हैं 
तथ्य कहते हैं कि बिहार के 90 फीसदी बड़े नेता और अफसरान अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए बिहार से बाहर भेजना क्यों पसंद करते हैं. सुशील मोदी खुद इसके अपवाद नहीं हैं.



किसी भी सरकारी यूनिवर्सिटी, उच्च शिक्षण संस्थानों में गरीब बच्चों के पढने के लिए फीस का दर्द वही महसूस कर सकता है, जो खुद गरीब हो और उन हालात से गुजरा हो. देश में उच्च शिक्षा के बेहतर संस्थानों में फिलहाल जो फीस संरचना है, उसमें बच्चों को पढाना गरीब के लिए तो दूर की बात है, सामान्य मध्य वर्ग तक उसे बर्दाश्त नहीं कर पाता. फीस के लिए अगर बैंकों के लोन की ओर देखा जाए तो उनकी शर्तें पूरी कर पाना भी आसान नहीं.

ज्यादातर केंद्रीय विश्व विद्यालयों में फीस जेएनयू से कम 
जेएनयू में फीस वृद्धि का विरोध कर रहे आंदोलनकारी छात्रों की आलोचना बेशक करिए लेकिन ये सवाल खुद से भी करिए क्या वो वाकई गलत काम कर रहे हैं. खासकर तब जबकि देश की ज्यादातर केंद्रीय यूनिवर्सिटी का फीस स्ट्रक्चर और हास्टल फीस जेएनयू से कम है.

जेएनयू की दाखिला प्रक्रिया 
जेएनयू में दाखिले की एक पारदर्शी व्यवस्था है. जहां देश के दूसरे विश्व विद्यालयों की दाखिला प्रक्रिया और अनियमितताओं पर सवाल उठते रहे हैं, वैसे सवाल कभी जेएनयू के लिए नहीं उठे.अगर रैंकिंग की बात करें तो ये देश की नंबर एक यूनिवर्सिटी है. ये रैंकिंग किसी प्राइवेट संस्था ने नहीं बल्कि खुद मानव संसाधन मंत्रालय ने दी है.

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जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र देश का नाम रौशन करते रहे हैं


जेएनयू के पढ़े लोगों में कुछ बड़े नेता बने, कुछ बड़े अफसर तो कुछ समाजसेवा में गए. विचारधारा में मतांतर लोकतंत्र का स्वस्थ हिस्सा है लेकिन सुविधानुसार कोई लेबल चस्पां कर देना जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि तब सवालों की वैसी ही कई अंगुलियां आपकी ओर भी उठ जाती हैं. हालांकि ये बात सही है कि अगर विश्वविद्यालय के अपने मानक और नियम होते हैं, जिनका पालन होना चाहिए और कराना चाहिए.

बिहार की बेहाल यूनिवर्सिटीज पर क्या कहेंगे
सुशील मोदी बिहार की राजनीति में लंबे समय से हैं. कई बार वहां की सरकार का अंग भी रह चुके हैं. लेकिन वहां की बेहाल शिक्षा व्यवस्था पर क्या कहेंगे. वहां की 09-10 प्रमुख यूनिवर्सिटीज का सेशन पटरी से उतरा रहता है. 40 सालों से वहां प्रोफेसर्स की नियुक्तियां नहीं हुईं. कॉलेजों विश्वविद्यालयों में स्टाफ कम है.

बिहार की कोई यूनिवर्सिटी पिछले कई दशकों में टॉप रैंकिंग में जगह नहीं बना पाई. क्यों वहां कोई यूनिवर्सिटी खड़ी नहीं की जा सकी. क्यों ये बात बिहार के किसी आला नेता के लिए चिंता की वजह नहीं बन पाती, कभी उसके ट्विट का हिस्सा नहीं होती.

बिहार में कई यूनिवर्सिटी में आज भी तीन साल का डिग्री कोर्स पांच साल में हो रहा है. समय पर रिज़ल्ट नहीं आता.

वैसे तथ्य ये भी जेएनयू में सबसे ज्यादा छात्र मेघावी और प्रतिभाशाली छात्र बिहार से ही आकर दाखिला लेते हैं. आमतौर पर उनमें ज्यादातर गरीब बैकग्राउंड के ही होते हैं.

जेएनयू का फी स्ट्रक्चर देश के दूसरे प्रमुख विश्वविद्यालयों की तुलना में ज्यादा है.
जेएनयू का फी स्ट्रक्चर और हास्टल की फीस देश के दूसरे केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तुलना में ज्यादा है.


खुद बिहार में गरीब छात्रों को मुफ्त कोचिंग के जरिए आईआईटी में सेलेक्ट कराने वाले सुपर 30 के संचालक आंनद कुमार कहते हैं, गरीब मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति और अन्य तरीके से मदद मुहैया करानी चाहिए. अधिकारियों, छात्रों को एक साथ बैठ एक समाधान निकालना चाहिए. सरकार को फीस बढ़ाने के निर्णय पर एक बार फिर विचार करना चाहिए ताकि जरूरतमंद वंचित ना रह जाएं.''

जेएनयू में लेबल मत चपकाइए
जेएनयू आज की तारीख में कुछ लोगों के लिए ऐसी यूनिवर्सिटी बन गई है, जिसके बारे में वो मानते हैं वहां सबकुछ गलत हो रहा है. सोशल मीडिया पर तो इस बारे में पूरा अभियान ही चल रहा है. हालांकि रिपोर्ट्स पढाई, शोध के स्तर और मौलिक सोच के मामले में इसे देश की आला यूनिवर्सिटी आंकती हैं. खुद मानव संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट भी अलग नहीं है.

हम किधर जाना चाहते हैं
दुनियाभर में ऐसी यूनिवर्सिटी को संवारा जाता है. जहां से मौलिक सोच वाली प्रतिभाएं निकलती हैं, जहां बेहतर शोध होता है, मौलिक विचार-विमर्श, बहस, पढाई और बौद्धिकता का स्तर ऊंचा होता है. ऐसे में हमें सोचना होगा कि हम किधर जाना चाहते हैं.
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