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लोकसभा में विपक्ष ने लगाए 'जय इंदिरा गांधी' के नारे, अटल ने कहा, पीएम को और पावर मिले

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: December 16, 2019, 2:26 PM IST
लोकसभा में विपक्ष ने लगाए 'जय इंदिरा गांधी' के नारे, अटल ने कहा, पीएम को और पावर मिले
पूरे संसद में विपक्ष ने इंदिरा की नारे लगाए और स्टैंडिंग ओवेशन दिया

16 दिसंबर 1971 के दिन जब भारतीय फौजों के आगे पाकिस्तानी सेना ने बगैर शर्त समर्पण कर दिया और एक नए देश का जन्म हुआ तो पूरे देश में खुशी की लहर थी. संसद के दोनों सदनों में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का अभूतपूर्व स्वागत किया गया

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  • Last Updated: December 16, 2019, 2:26 PM IST
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नई दिल्ली। 16 दिसंबर 1971 वो दिन था, जब सारे देश के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Former Prime minister of India Indira Gandhi) दुर्गा बन गईं थीं. लोकसभा में सभी पार्टियों ने खड़े होकर ना केवल उनका अभूतपूर्व अभिवादन किया था बल्कि "जय बांग्ला, जय इंदिरा गांधी." के जोरदार नारे लगाए थे. ऐसी एकजुटता के साथ सदन में किसी प्रधानमंत्री को ऐसा सम्मान मिलना अभूतपूर्व ही था.

इस बात को अब 48 साल बीत चुके हैं. तब भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अमेरिका (America)की चेतावनी की परवाह किये बगैर पूर्वी पाकिस्तान में ना केवल भारतीय फौजों को भेजा बल्कि जीत भी हासिल की. उन्होंने तभी ये लड़ाई रोकी जब पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए और बांग्लादेश का जन्म हुआ.

पूरा देश इंदिरा गांधी की इस बहादुरी पर भावविह्वल था. हर कोई उनके साहस और निडरता की तारीफ कर रहा था. दुनिया इसलिए चकित थी कि उन्होंने अमेरिका की चेतावनी के बाद भी भारत की ताकत दिखा दी थी. इससे दुनियाभर में भारत का मान बहुत बढ़ा था.

"जय बांग्ला, जय इंदिरा गांधी."

इसके बाद लोकसभा में जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई तो अभूतपूर्व दृश्य दिखा. सभी पार्टी के सांसदों ने टेबल बजाते हुए हवा में कागज उछाल दिए और जोर से नारा लगाया "जय बांग्ला, जय इंदिरा गांधी." राज्यसभा ने प्रधानमंत्री को एक साथ खड़े होकर अभिवादन दिया.

आठ महीने पहले ही इंदिरा गांधी इसी विपक्षी को हराकर प्रधानमंत्री बनीं थीं. वो समय उनके लिए बहुत मुश्किल समय था. ना केवल कांग्रेस के दो टुकड़े हो गए थे बल्कि उन्हें कुछ समय पहले तक कमजोर प्रधानमंत्री माना जाता था.

तब देशभर में इंदिरा गांधी की जबरदस्त तारीफ हुई थी. लोग उन्हें दुर्गा की तरह साहसी कहने लगे थे
हर दल ने की इंदिरा की तारीफ 
हिंदुस्तान टाइम्स ने 18 दिसंबर 1971 को खबर छापी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, डीएमके, जनसंघ के पितांबर दास और कांग्रेस (ओ) के मोरारजी देसाई हर किसी ने प्रधानमंत्री की तारीफ की है. जिस पार्टी ने इस सामूहिक तारीफ से खुद को अलग रखा, वो सीपीएम यानि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी थी.

जिस समय दिसंबर 1971 में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की, तब सारा विपक्ष सरकार के साथ एकजुट था.

1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान विपक्ष के नेता जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि जरूरत हो तो प्रधानमंत्री को और अधिकार दे दिए जाएं


अटल ने कहा-इंदिरा को और पावर दिए जाएं 
अंग्रेजी बिजनेस न्यूजपेपर "मिंट" में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार,  तब जनसंघ के अध्यक्ष अटल  बिहारी वाजपेयी ने कहा था, अब प्रधानमंत्री को दुश्मन के खिलाफ संपूर्ण जीत हासिल करनी चाहिए. अगर सरकार को इस हालात से निपटने के लिए और पावर्स चाहिए तो हम उन्हें किसी भी तरह का पूरा सहयोग करने से नहीं हिचकिचाएंगे. बाद 1982 में इसी जनसंघ ने सियासी तौर पर भारतीय जनता पार्टी का रूप लिया.

युद्ध के दौरान सीपीआई तो कांग्रेस की सहयोगी थी लेकिन उससे टूटकर बनी सीपीएम, स्वराज पार्टी के साथ क्षेत्रीय पार्टियों ने भी इंदिरा को अपना समर्थन दिया था.

युद्भ शुरू होते ही तीन दिसंबर 1971 आपात स्थिति घोषित कर दी गई थी. फिर भारत और पाकिस्तान के बीच 13 दिन लड़ाई चलती रही. उस समय समूचा विपक्ष भी अमेरिका और पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने की बात कर रहा था.

तब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के रुख पर लालकृष्ण आडवाणी समेत जनसंघ ने अमेरिकी दूतावास के सामने प्रदर्शन किया था


आडवाणी और मधोक ने अमेरिकी दूतावास पर किया प्रदर्शन
तब लोकसभा में विपक्ष के नेता अटल और राज्यसभा में एसएन मिश्रा ने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के भारत विरोधी बयान की संसद में निंदा की थी. केवल यही नहीं बल्कि जनसंघ के अन्य नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, बलराज मधोक और केदार नाथ साहनी ने नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के सामने प्रदर्शन किया था.  सीपीआई और डीएमके समेत अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी अमेरिका के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शिरकत की थी.

जब इसी समय ये बात उठी कि 1971 में होने वाले विधानसभाओं के चुनाव टाल दिये जाएं तो जनसंघ के नेता वाजपेयी और स्वतंत्र पार्टी के नेता पीके देव ने कहा कि वो इस मामले में प्रधानमंत्री के साथ हैं, वो चाहें तो इन चुनावों को अगले एक साल तक के लिए टाल दें. हालांकि सीपीएम चाहती थी कि ये चुनाव तीन महीने के अंदर हो जाएं.

हालांकि बांग्लादेश के जन्म और पाकिस्तान के बगैर शर्त समर्पण के बाद भारत ने युद्धविराम की घोषणा की तो वाजपेयी खुश नहीं थे. उनका कहना था कि वो इस फैसले से पूरी तरह सहमत नहीं हैं. उनका मानना था कि इस लड़ाई को पश्चिमी पाकिस्तान तक भी ले जाना चाहिए था ताकि पाकिस्तान की आक्रमकता हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाए.

इंदिरा को अटल ने कहा-दुर्गा से कम नहीं
हालांकि इस युद्ध विराम के बाद बिहारी वाजपेयी ने सदन में कहा था कि जिस तरह से इंदिरा ने इस लड़ाई में अपनी भूमिका अदा की है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है. सदन में युद्ध पर बहस चल रही थी और वाजपेयी ने कहा कि हमें बहस को छोड़कर इंदिरा की भूमिका पर बात करनी चाहिए जो किसी दुर्गा से कम नहीं थी.

पत्रकार विजय त्रिवेदी की किताब ‘हार नहीं मानूंगा- एक अटल जीवन गाथा’ में भी इस बात का जिक्र मिलता है. किताब में दावा किया गया है कि एक बैठक में वाजपेयी ने डीपीटी से कहा था, "इंदिरा ने अपने बाप नेहरू से कुछ नहीं सीखा. मुझे दुख है कि मैंने उन्हें दुर्गा कहा."

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First published: December 16, 2019, 1:21 PM IST
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