कासिम सुलेमानी की मौत का अमेरिका को कैसे जवाब देगा ईरान, भारत के लिए क्‍या हैं संकट के मायने

ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद उनकी जगह लेने वाले सैन्‍य अधिकारी का रुख अमेरिका को लेकर ज्‍यादा सख्‍त हो सकता है.
ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद उनकी जगह लेने वाले सैन्‍य अधिकारी का रुख अमेरिका को लेकर ज्‍यादा सख्‍त हो सकता है.

ईरान (Iran) की कुद्स फोर्स (Quds Force) के कमांडर मेजर जनरल कासिम सुलेमानी (Qasem Soleimani) की अमेरिकी हवाई हमले (US Airstrike) में मौत के बाद मध्‍य पूर्व में अशांति और विवाद बढ़ना तय है. इस बार ईरान प्रॉक्‍सी फोर्सेस (Proxy Forces) की कार्रवाई से बढ़कर कोई कदम उठा सकता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 30, 2020, 11:25 AM IST
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ले. जनरल सईद अता हसनैन

नया साल 2020 और नया दशक मध्‍य पूर्व (Middle East) में उभरते नए संकट के साथ शुरू हुआ है. ईरान (Iran) की कुद्स फोर्स (Quds Force) के कमांडर मेजर जनरल कासिम सुलेमानी (Qasem Soleimani) की शुक्रवार को बगदाद एयरपोर्ट के नजदीक अमेरिकी हवाई हमले (US Airstrike) में मौत हो गई. कुद्स फोर्स ईरान की इस्‍लामिक रिवाल्‍यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) का हिस्‍सा है. उनके सलाहकार और इराकी कमांडर अबु मेहदी अल-मुहंदीस (Abu Mahdi al-Muhandis) अमेरिका के हमले में पहले ही मारे जा चुके थे. सुलेमानी के बारे में ज्‍यादा जानने के लिए आपको क्षेत्र में पिछले सात-आठ साल से चल रहे विद्रोह पर नजर डालनी होगी.

सुलेमानी की कुद्स फोर्स का दुनिया में नहीं कोई मुकाबला
सुलेमानी की अहमियत ईरान के बाहरी सुरक्षा हितों की देखभाल के लिए एक विशेष बल को बढ़ावा देने की उनकी क्षमता थी. उनकी कुद्स फोर्स का पूरी दुनिया में कोई मुकाबला नहीं है. अमेरिका की एक मैगजीन ने कुद्स फोर्स के लिए लिखा था कि यह फोर्स अमेरिकी एजेंसी सीआईए और स्‍पेशल फोर्सेस की संयुक्‍त शक्ति के बराबर ताकतवर है. मैगजीन के मुताबिक, कुद्स फोर्स अपनी इंटेलिजेंस के आधार पर सैन्‍य अभियान चलाती है. ईरान ने शिया मुस्लिमों की मौजूदगी वाले क्षेत्रों में अपना दखल बढ़ाने का फैसला किया था. इसके बाद सुलेमानी की कुद्स फोर्स ने शिया मुस्लिमों के हितों की रक्षा के लिए कई बार स्‍थानीय बलों का अस्‍थायी नियंत्रण अपने हाथ में लिया.
कासिम के कारण ही है लेवंट रीजन में तेहरान का दखल


कासिम सुलेमानी की जबरदस्‍त रणनीति के कारण ईरान की पश्चिमी सीमा से लेबनान तक फैले लेवंट रीजन में तेहरान का दखल हो गया है. कासिम ने इजरायल को पीछे धकेलने के लिए लेबनानी हिजबुल्‍ला और हमास से बेहतर संबंध बनाए. सुलेमानी की ही रणनीति के कारण बशीर असद का अस्तित्‍व बना रहा. हो सकता है कि दो महीने पहले आरामको ऑयल पर हुए हमले में भी कासिम का दिमाग हो. इस हमले के बाद सऊदी अरब (Saudi Arabia) का तेल उत्‍पादन कुछ समय के लिए 50 फीसदी रह गया था. इराक में 2019 के आखिरी सप्‍ताह में तेजी से बदले घटनाक्रम के कारण अमेरिका (US) ने उन्‍हें मार गिराया.

बगदाद में प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी दूतावास पर हमला कर दिया था. अमेरिका इससे काफी नाराज था.


आखिरी सप्‍ताह में तेजी से बदला इराक में घटनाक्रम
इराक (Iraq) के किरकुक में 27 दिसंबर को अमेरिकी सैन्‍य प्रतिष्‍ठान पर हमला हुआ. इसमें एक अमेरिकी कॉन्‍ट्रैक्‍टर की मौत हो गई थी. इसके बाद अमेरिका ने 29 दिसंबर को हवाई हमला कर दिया, जिसमें 25 विद्रोही मारे गए. इराक ने अमेरिका के इस हमले को अपनी संप्रभुता के खिलाफ माना. इसके बाद बगदाद (Baghdad) के नजदीक ताजी में एक अमेरिकी सैन्‍य ठिकाने पर हमला किया गया. इसके बाद 31 दिसंबर को भीड़ ने अमेरिकी दूतावास परिसर पर हमला कर दिया. अमेरिका ने अपने कुछ सैनिकों को तुरंत कुवैत से बगदाद भेज दिया. साथ ही अमेरिका से भी सैकड़ों सैनिकों को मध्‍य पूर्व भेज दिया.

ट्रंप ने कहा था- ईरान को चुकानी पड़ेगी भारी कीमत
अमेरिका अपने सभी इंटेलिजेंस माध्‍यमों के जरिये सुलेमानी को ढूंढ रहा था. राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) ने भी अमेरिकी दूतावास पर हमले के बाद सख्‍त लहजे में धमकी दी थी कि ईरान को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. सुलेमानी की मौत पर अमेरिकी अधिकारियों ने संतोष जाहिर किया. उनका कहना है कि वह मध्‍य पूर्व में कई अमेरिकी सैनिकों की मौत की वजह था. अमेरिका के पूर्व उपराष्‍ट्रपति जो बिडेन ने कहा, 'अमेरिकी प्रशासन ने कहा था कि उसका लक्ष्‍य ईरान की ओर से भविष्‍य में होने वाले हमलों को रोकना है. लेकिन, अब इस कार्रवाई के उलटे नतीजे निकलना तय है.'

अब मध्‍य पूर्व में अशांति और तनाव बढ़ना तय है
मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की अमेरिकी हवाई हमले में मौत के बाद मध्‍य पूर्व में अशांति और तनाव बढ़ना तय है. इस बार ईरान प्रॉक्‍सी फोर्सेस (Proxy Forces) की कार्रवाई से बढ़कर कोई कदम उठा सकता है. फिलहाल स्‍पष्‍ट तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि ईरान कहां, कब और कितनी ताकत के साथ पलटवार करेगा. इस घटना के बाद ट्रंप की ईरान रणनीति पर बहस की जा सकती है. इस समय ईरान और अमेरिका में से कोई भी युद्ध का इच्‍छुक नहीं है. सुलेमानी की जगह लेने वाला मिलिट्री कमांडर ज्‍यादा काबिल हो सकता है या उसका रवैया अमेरिका को लेकर ज्‍यादा खतरनाक हो सकता है. वहीं, सुलेमानी की मौत के बाद ईरान और मजबूती से एकजुट हो सकता है.

कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान ज्‍यादा मजबूती के साथ एकजुट हो सकता है.


सीधे युद्ध में तब्‍दील हो सकती है प्रॉक्‍सी वॉर
मध्‍य पूर्व में जारी प्रॉक्‍सी वॉर अब सीधे युद्ध में तब्‍दील हो सकती है. इसमें अमेरिका ईरान के संशाधनों पर हमला कर सकता है. हालांकि, अब सबकुछ ईरान की प्रतिक्रिया पर निर्भर है. ईरान या तो सीधे अमेरिकी प्रतिष्‍ठानों पर हमला कर सकता है या इजरायल जैसे उसके सहयोगियों पर हमला कर सकता है. ईरान आरामको पर ड्रोन हमला कर अपनी सैन्‍य क्षमता का प्रदर्शन कर चुका है. यहां सवाल यह भी उठता है कि इस पूरे घटनाक्रम का भारत पर किस तरह असर पड़ेगा. मध्‍य पूर्व में किसी भी तरह की उथलपुथल का भारत में तेल की कीमतों पर सीधा असर पड़ता है.

भारत पर पड़ेगा ईरान की उथलपुथल का असर
ईरान में चल रहे घटनाक्रम के कारण तेल की कीमतों में पहले ही तीन फीसदी का उछाल आ गया है. अगर यह ज्‍यादा बढ़ा तो भारत में तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी. इस समय भारत की अर्थव्‍यवस्‍था खराब दौर से गुजर रही है. भारत अपनी ईंधन जरूरतों का 80 फीसदी आयात करता है. ईरान में उथलपुथल का सबसे खराब असर भारत पर पड़ता है. इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र में मौजूद 80 लाख भारतीयों पर भी बुरा असर पड़ेगा. इराक में ईरान का प्रभाव कुछ कम है. ऐसे में वह अमेरिका को सऊदी अरब में जवाब दे सकता है. अगर ऐसा हुआ तो भारत के लिए तेल की जरूरतें पूरा करना और भी मुश्किल हो जाएगा.
(लेखक श्रीनगर में सेना की 15वीं कोर के पूर्व कमांडर हैं. अब वह कश्‍मीर में सेंट्रल यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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