हम क्यों कोई रंग पसंद करते हैं ?

हमें कोई रंग क्यों पसंद है और क्यों किसी और को वह रंग पसंद नहीं. रंगों को लेकर हमारी धारणा के पीछे कई वजह हैं. एक नहीं कई बातें मिलकर आपको यह फैसला लेने के लिए कहती है कि नीला रंग आप पर ज्यादा फबता है.

News18Hindi
Updated: June 15, 2018, 10:55 AM IST
हम क्यों कोई रंग पसंद करते हैं ?
रंगों को लेकर हमारी धारणाएं कई बातों पर आधारित है
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Updated: June 15, 2018, 10:55 AM IST
हो सकता है कि आपको नीला रंग और आपकी बहन को हरा रंग पसंद हो. आपके दोस्तों को आपसे अलग रंग पसंद हो सकते हैं. रंगों को लेकर हमारी पसंद-नापसंद काफी सख्त होती है. केचअप हमें लाल रंग का ही अच्छा लगता है और चावल ज्यादातर सफेद. वैसे चावल कई रंगों के आते हैं लेकिन सफेद रंग के चावल पर ही अक्सर हमारा हाथ जाता है. रंग को लेकर हमारी सोच बहुत ज्यादा निर्धारित है. अगर कोई हमें यह भी कह दे कि टमाटर लाल रंग का नहीं, भूरे रंग का ज्यादा पौष्टिक होता है, इसके बावजूद हम लाल रंग के टमाटर को ही उठाएंगे.

हम रंगों को जो प्राथमिकता देते हैं, उसके पीछे क्या वाकई कोई तर्क होता है. या फिर यह काम भावुक मन से ज्यादा करते हैं. कुछ शोधकर्ताओं के मुताबिक यह भावुकता वश लिया गया फैसला ज्यादा होता है जो कि बाद में हमारे फैसले लेने के तरीके पर असर डालने लगता है. कार खरीदने के बारे में जब हम सोचते हैं तो इंजिन, मशीन, परफॉर्मेंस के अलावा गाड़ी का रंग भी हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण होता है. क्यों होता है, क्यों हम लाल रंग की गाड़ी को, सफेद से ज्यादा अहमियत देते हैं. जबकि किसी और के लिए नीले रंग की गाड़ी से अच्छा कुछ नहीं.

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बच्चे रंगों को लेकर अलग श्रेणी बना लेते हैं


हम रंग कैसे देख पाते हैं

वहीं रंग को लेकर हमारी पसंद का काफी हद तक सांस्कृतिक असर भी बताया जाता है. यानि जापान में अलग अलग रंग को लेकर सोच, अमेरिकी सोच से अलग होगी. लेकिन रिसर्च ने यह भी पाया है कि रंगों की श्रेणी सांस्कृतिक नहीं जीव विज्ञान यानि बायोलॉजी पर ज्यादा आधारित है. विज्ञान के मुताबिक एक छोटा बच्चा रंगों को लाल, नीला, हरा, पीला और बेंगनी श्रेणी में रखता है. इंसान जो रंग देखता है उसके लिए आंखों के वो सेल जिम्मेदार हैं जिसे कोन्स कहते हैं. ये सेल लाइट की लंबी, मध्यम और छोटी तरंगों को लेकर संवेदनशील होते हैं. इन सेल्स से निकलने वाले सिग्नल का दिमाग जो मतलब निकालता है उसी का नतीजा है रंग की वो रेंज जिसे हम देखते हैं.

रंग के प्रति हमारी सोच कैसे तय होती है

लेकिन क्या बायलॉजी ही कलर को लेकर हमारी धारणा को तय करती है, यह एक बहस का मुद्दा बना हुआ है. इस कड़ी को जोड़ने की कोशिश की जा रही है जिससे यह समझा जाए कि बच्चे अपने रंग की श्रेणी को किस आधार पर बनाते हैं और बड़े होने के बाद रंग को लेकर हमारी सोच में क्या बदलाव आता है. अभी तक जो कोशिश की गई है उससे यह पता चला है कि रंगों को पहचानने में बायलॉजिकल वजह तो है लेकिन बाद में इसमें माहौल और संस्कृति का भी असर पड़ता है. कई देश और संस्कृतियां ऐसी हैं जहां हरे और नीले रंग में अंतर नहीं माना जाता. ऐसी जगह बच्चे भी बड़े होकर इन दोनों रंगों में फर्क करना छोड़ देते हैं. जबकि छोटी उम्र में नीला और हरा रंग उनके लिए अलग अलग ही था.
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हमारी आंखों में मौजूद कोन्स हमें रंग दिखाने के लिए जिम्मेदार है


सकारात्मक प्रतिक्रिया अहम रोल निभाती है

किसी सामान को प्राथमिकता देने के दौरान रंग हम पर असर डालता है. जैसे हमने पीले रंग का फर्नीचर खरीदा, फिर हमने दूसरा सामान भी पीले रंग का ही खरीदा. ऐसा इसलिए क्योंकि जब पहली बार पीले रंग का फर्नीचर खरीदा गया तब उस पर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया ने हमें उस रंग के प्रति वफादार बना दिया. उसके बाद हम कुछ और खरीदने के दौरान भी पीले रंग को प्राथमिकता देने लगे. जब कोई रंग हमें बार बार सुख का एहसास दिलाता है तो हम उसे भविष्य में भी अपने साथ लेकर चलते हैं और वो हमारे जीवन में स्थायी हो जाता है. यही वजह है कि लोकप्रिय कंपनी कैडबरी की मिल्क चॉकलेट को ब्राउन चॉकलेट से ज्यादा तवज्जो नहीं मिल पाती है. क्योंकि चॉकलेट तो भाई ब्राउन ही अच्छी लगती है..

इसी तरह स्कूल की कॉपी में टीचर का लाल पेन से लगाया गोल निशान हमें आगे चलकर भी याद दिलाता है कि लाल रंग यानि खतरा. वहीं नीला रंग हमारे समुद्र या आकाश के शांत होने का एहसास दिलाता है. रंगों का हमारे मिज़ाज पर असर पड़ता है लेकिन इसमें अपवाद भी शामिल हैं. हालांकि अभी तक इन रंगों का असर साफ तौर पर या कहें कि सीधे तौर पर देखने को नहीं मिल पाया है.
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