दुनिया के इस इलाके पर क्यों है चीन की नज़र? क्यों इसे लेकर छिड़ सकता है युद्ध भी...

आस्ट्रेलियाई महाद्वीप का पैसिफिक रीजन में अब चीन ने अपनी मौजूदगी जाहिर कर दी है. वो यहां के 14 छोटे द्वीपीय देशों में जमकर धन का निवेश कर रहा है. इससे अमेरिका के साथ आस्ट्रेलिया चिंतित है

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 9:07 PM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 9:07 PM IST
दुनियाभर में अब तक पैसिफिक क्षेत्र को सबसे शांत इलाकों में गिना जाता रहा है लेकिन अब शायद ऐसा नहीं रहेगा, क्योंकि चीन के कदम यहां भी पड़ गए हैं. इस इलाके के 14 छोटे गरीब द्वीपीय देशों में चीन मोटे लोन के रूप में जमकर धन बहा रहा है. माना जा रहा है कि आने वाले समय में इनमें से कई द्वीपों में चीन अपना सैन्य बेस बनाएगा. अब तक पैसिफिक क्षेत्र में आस्ट्रेलिया का दबदबा था, लेकिन चीन की मौजूदगी ने उसकी सुरक्षा चिंता को बढा दिया है.

चीन ने जिस तरह से इस पूरे इलाके में अपनी नजरें गड़ा दी हैं, उससे आस्ट्रेलिया में आशंका की स्थिति बन चुकी है. पिछले कुछ दिनों से आस्ट्रेलियाई मीडिया में चीन विरोधी लहर चल रही है. आस्ट्रेलिया को लग रहा है कि चीन आने वाले बरसों में उसके लिए बड़ा खतरा बनकर उभरेगा. माना जा रहा है कि चीन की इस हरकत से दुनिया के इस हिस्से में ना केवल तनाव बढ़ सकता है बल्कि आस्ट्रेलिया और चीन के बीच संघर्ष की नौबत भी आ सकती है.

हालांकि चीन ने अपनी ताजातरीन डिफेंस व्हाइट पेपर में आस्ट्रेलिया पर ही पैसिफिक रीजन में तनाव बढाने के आरोप लगाए हैं. वैसे माहौल तब और गर्मा गया जबकि अमेरिका ने घोषणा की कि वो उत्तरी आस्ट्रेलिया में नेवल सैन्य बनाएगा. अमेरिका के पहले से इस रीजन में कुछ सैन्य बेस हैं.

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चीन जिस अंदाज में पैसिफिक रीजन के छोटे छोटे द्वीपीय देशों में पहुंचकर उन्हें अपने धन से ललचा रहा है, लगभग उसी अंदाज में उसने पहले एशिया में अपना अभियान शुरू किया था. उसके बाद वो अफ्रीका पहुंचा, जहां की बड़ी जमीनों और बेशुमार प्राकृतिक संसाधनों ने उसे ललचाया. पैसिफिक क्षेत्र के जिन 14 देशों के लिए चीन ने अपनी थैली का मुंह खोला है, वो सभी कभी ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा थे, अब आजाद हैं लेकिन सभी विकास की दृष्टि से पिछड़े हैं. साथ ही यहां गरीबी, अशिक्षा और बीमारियों का राज रहता है. ये दुनिया के ऐसे इलाके में भी तब्दील हो चुके हैं, जिन्हें हमेशा ही मदद की जरूरत रहती है.

पैसिफिक इलाके में 14 छोटे छोटे द्वीपीय देश हैं, जहां अब चीन अपना प्रभाव बढाने में लगा है


वैसे ये इतने छोटे भी नहीं कि इन्हें नजरंदाज किया जा सके. ये बात सही है कि चीन अगर कहीं पहुंचता है या कहीं वो अपने धन का मायाजाल फैलाता है तो उसमें हमेशा उसकी मंशा सही नहीं रहती है. एशिया से अफ्रीकी देशों तक में ये देखा जा चुका है.
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पैसिफिक क्षेत्र इन 14 द्वीपों को अगर मिला दें तो इनका भूभाग रूस से ज्यादा बड़ा हो जाएगा. इन द्वीपों में सभी में खाली पड़े बड़े भू-भाग हैं. बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधन भी. शायद चीन की नजरें इन दोनों पर  टिकी हैं. फिर दुनिया के इस इलाके में वो अपनी सैन्य ताकत भी बढाने का इच्छुक है.

किस तरह यहां धन बहा रहा है
लंबे समय से आस्ट्रेलिया इन इलाके के देशों को सबसे ज्यादा मदद देता रहा है. आस्ट्रेलिया इस क्षेत्र का सबसे धनी देश है. आस्ट्रेलिया ने अब यहां के देशों को जो मदद की है, वो शिक्षा, खाद्य, दवा के रूप में ज्यादा रही है. लेकिन चीन इससे अलग इंफ्रास्ट्रक्चर में पैसा बहा रहा है. वो यहां सड़कों और बड़ी बिल्डिंग्स का संजाल तो बिछा ही रहा है, साथ ही एयरपोर्ट्स और अन्य महत्वपूर्ण संरचना खड़ी करने में मदद कर रहा है.

ये सारे प्रोजेक्ट्स चीनी कंपनियों के हाथ में हैं. वो तेजी से इन्हें बना रही है. इसमें खर्च होने वाला पैसा भी वही लगा रही है. लेकिन ये सारा धन लोन के रूप में है, जिसे इन सारे देशों को वापस करना होगा.

चीन के समाचार पत्र "साउथ चाइना मार्निंग पोस्ट" के अनुसार इन 14 द्वीपीय देशों मेंं करीब ढाई करोड़ की आबादी रहती है. इनकी कुल जीडीपी चीन की जीडीपी के एक फीसदी से भी कम है. इसके बाद भी अगर चीन यहां पर बेतहाशा पैसा खर्च कर रहा है, तो उसे मालूम है कि यहां लगाया हुआ उसका धन शायद ही मिले, लिहाजा जब ये देश चीन के कर्ज के जाल में फंस जाएंगे तो अप्रत्यक्ष तौर पर वो चीन के प्रभाव में होंगे. इन सभी देशों की सरकारों पर उसका असर और दखल दोनों बढ़ सकेगा.

छोटे पैसिफिक द्वीपीय देशों में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण में चीन मोटा धन लगा रहा है, जो इन देशों को लोन के रूप में दिया जा रहा है


वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है, "पैसिफिक क्षेत्र के कुछ देशों की हालत तो ये भी है कि यहां बीस फीसदी आबादी मूलभूत जरूरतों को पूरा नहीं कर पाती." हालांकि वर्ष 2017 में लोवी इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट कहती है, " मदद ने यहां के लोगों के जीवनस्तर को उठाया है."

क्या यहां सैन्य बेस बनाना चाहता है चीन 
पिछले दिनों एक खबर आई थी कि चीन अब पूरी दुनिया के हर हिस्से में अपना सैन्य बेस बनाना चाहता है ताकि वो महाशक्ति बन सके. लिहाजा ये भी तय है कि ये 14 देशों में कुछ देश उसे सैन्य बेस की भी जगह देंगे. यही पहलू आस्ट्रेलिया और अमेरिका दोनों को परेशान कर रहा है. उन्हें लगता है कि इससे क्षेत्रीय संतुलन गड़बड़ाएगा और तनाव बढेगा.

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"सीएनएन" में प्रकाशित एक रिपोर्ट में आस्ट्रेलिया के एक एक्सपर्ट माइकल ओ कीफ कहते हैं, "आस्ट्रेलिया निश्चित तौर पर बहुत ज्यादा चिंतित है. चीन जिस तरह बड़े पैमाने पर इन द्वीपीय देशों में धन बहा रहा है, उसके दूरगामी परिणाम खतरे वाले हो सकते हैं."

कुछ दिनों पहले चीन ये घोषणा कर चुका है कि वो दुनियाभर में अपने सैन्य बेस का विस्तार करने वाला है. अप्रैल 2018 में सिडनी हेराल्ड ने ये रिपोर्ट प्रकाशित की, "वनातु में चीन अपना सैन्य बेस बनाने जा रहा है, उसके लिए उसकी वनातु सरकार से बातचीत हो चुकी है." हालांकि वनातु और चीन दोनों ने इसका खंडन किया है.

अगर चीन यहां सैन्य बेस बनाता है तो अमेरिका और आस्ट्रेलिया दोनों के लिए परेशानी बढाने वाली बात  होगी. अमेरिका की मौजूदगी इस क्षेत्र द्वितीय विश्व युद्ध के दिनों से है. हालिया घटनाक्रमों के मद्देनजर उसने उत्तरी आस्ट्रेलिया में अपना सैन्य बेस बनाने की घोषणा कर दी है.

माना जा रहा है कि चीन इन पैसिफिक द्वीपीय देशों में अपने साम्राज्यवाद की लिप्सा में सैन्य बेस भी बनाना चाहता है


ये सभी देश लोन शायद ही वापस कर पाएं 
आस्ट्रेलिया में अमेरिकी राजदूत आर्थर बी चैवहाउस कहते हैं, " जिस तरह चीन बड़े पैमाने पर पैसिफिक देशों में लोन पर पैसा बहा रहा है, उससे ये तय है कि वो देश इन्हें वापस करने की स्थिति में नहीं रहेंगे और तब चीन उनसे सियासी फायदा लेने लगेगा."

इन 14 देशों में छह ऐसे हैं, जिन्हें इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (आईएमएफ) ने उधार की दृष्टि से उच्च जोखिम वाले देशों में रखा है यानि ये ऐसे देश हैं, जो शायद ही लोन चुका पाएं. तीन उस जोखिम की सीमारेखा पर हैं. इन देशों में चीन यद्यपि हर देश को लोन दे रहा है लेकिन टोंगा में चीन का लोन बहुत ज्यादा है. अमेरिका का एक और रिसर्च ग्रुप कहता है कि बीजिंग मोटा लोन देने के बाद एक तरीका और अपनाता है, वो इस दोबारा सौदेबाजी करता है और फिर उन देशों की विदेशी और घरेलू नीतियों में अपना हित चाहता है.

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क्यों चीन यहां रहा है निवेश 
वैसे सबसे बड़ा सवाल यही है कि चीन पैसिफिक द्वीपों में निवेश क्यों कर रहा है. और ऐसे देशों में जो एकदम अलग थलग हैं, जिसकी इकोनॉमी बहुत छोटी है, जो शायद उधार को वापस भी नहीं कर पाएं. हालांकि इस बारे में पूछे गए किसी भी सवाल पर चीन का वही रटा रटाया जवाब होता है, "चीन बराबरी, आपसी मदद और ओपन सिद्धांत के आधार पर पैसिफिक द्वीपीय देशों की मदद कर रहा है, जिसमें कोई सियासी दावपेंच नहीं है. वो बस इस इलाके के लोगों के जीवन को सुधारना चाहता है."

यहां प्रचुर खनिज है, सोने की खाने हैं तो वन्य संपदा भी
हालांकि चीन के यहां पहुंचने के कई कारणों में एक बड़ा कारण दुनिया के इसे इलाके में भी अपने सियासी और सामरिक असर को बढाना है तो इस इलाके के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी. दक्षिण पैसिफिक द्वीपीय इलाकों में प्रचुर मात्रा में लकड़ी है तो खनिज और खासी मछलियां. पापुआ न्यू गिनिया सोना, निकिल की खानें हैं तो द्रवीकृत नेचुरल गैस और घने लकड़ियों वाले जंगल. यहां धीरे धीरे रहने वाले चीनियों की संख्या भी बढ़ने लगी है. यहां फिलहाल 80 हजार चीनी रह रहे हैं. कुछ चीनी उन चीनी व्यापारियों के वंशज हैं, जो यहां व्यापार के सिलसिले में 1800 के आसपास आए थे.

ये पैसिफिक रीजन का देश नौरू है, इन सबी देशों के बारे में कहा जाता है कि यहां विपुल तौर पर प्राकृतिक संपदा और खनिज संसाधन हैं, जिन पर भी चीन की नजर है


हालांकि 2000 में यहां के सोलोमन पापुआ न्यू गिनिया और टोंगा द्वीपों में चीन विरोधी भावनाएं भी भड़कीं. लेकिन चीन उन्हें खत्म करने में सफलता हासिल कर ली. पापुआ में बड़ी बेरोजगारी है और चीन अपने कंस्ट्रक्शन के काम में स्थानीय लोगों को बड़े पैमाने पर नौकरियां देकर उन्हें खुश कर दिया है.

क्या चीन के कोई राजनयिक निहितार्थ भी हैं 
हां, ऐसा भी माना जा सकता है. पहला मुद्दा ताइवान का है. जिस पर चीन लगातार अपना दावा जताता आया है. केवल 16 देश उसे आधिकारिक तौर पर मान्यता देते हैं और उनमें से छह देश इस पैसिफिक रीजन के हैं. लंबे समय से चीन ताइवान के इन सहयोगियों को करीब लाने की कोशिश में लगा है लेकिन वो चाहता है कि ये सभी एक चीन के सिद्धांत का पालन करें.  वैसे ताइवान खुद भी  इस इलाके में निवेश कर रहा है हालांकि वो चीन की तुलना में काफी कम है. लेकिन ये बात सही है कि इस क्षेत्र के सभी देश धीरे धीरे चीन के असर में आ रहे हैं और ताइवान से राजनयिक दूरी बढाने लगे हैं.

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भविष्य में टक्कर और तनाव की आहट 
हालात बता रहे हैं कि दुनिया में सबसे शांत माना जाने वाला ये इलाका भी अब भविष्य में तनाव और टक्कर की आहट दे रहा है.  आस्ट्रेलिया खुद इस हालत से काफी चिंतित है. उसकी चिंताएं अपनी सुरक्षा को लेकर ज्यादा हैं. पिछले दिनों यहां के मीडिया में चीन विरोधी लहर भी देखने को मिली है. .ये तय है कि इस इलाके का क्षेत्रीय संतुलन अब बिगड़ गया है और आने वाले बरसों में इसका ज्यादा असर यहां देखने को मिलेगा.

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First published: July 31, 2019, 9:07 PM IST
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