भारत के सामने आखिर इतना मजबूर क्यों नज़र आ रहा है पाकिस्तान?

पाकिस्तान (Pakistan) जिस तरह लगातार कश्मीर पर आर्टिकल 370 (Article 370) में बदलाव पर नाराजगी जाहिर कर रहा है और व्यापार (India-Pakistan trade)के साथ कई तरह पाबंदियां लगाने की घोषणाएं की हैं, वो उसकी मजबूरी ज्यादा है. खस्ता आर्थिक हालत ने भी उसके हाथ बुरी तरह बांध दिए हैं

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: August 9, 2019, 6:00 AM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: August 9, 2019, 6:00 AM IST
भारत में आर्टिकल 370 (Article 370) में संशोधन के बाद जब से कश्मीर (Kashmir) और लद्दाख (Ladakh) को केंद्रशासित प्रदेश घोषित किया गया है, तब से पाकिस्तान (Pakistan) की नाराजगी कम होने का नाम नहीं ले रही. प्रधानमंत्री इमरान खान (Pakistan Prime minister Imran Khan) रोज सेना के अफसरों के साथ मीटिंग कर रहे हैं, भारत को चेतावनी पर चेतावनी दे रहे हैं. जब लगा कि ये भी काफी नहीं है तो उन्होंने भारत के साथ व्यापार पर रोक लगाने और भारतीय से राजनयिक रिश्तों को डिग्रेड कर डाला.

पिछले कई दिनों से पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली (Pakistan national assembly)कश्मीर पर नाराजगी जाहिर करने वाली बहस पर बहस कर रही है. भारत को कोस रही है. उससे भी मन नहीं भरा तो विरोध में एक प्रस्ताव पास कर डाला. फिर पाकिस्तान के वजीरे-ए-आजम इमरान खान (Pakistan Prime minister Imran Khan) ने कई मीटिंग्स बुलाकर भारत को आगाह करने की कोशिश की. फिर सारे मामले पर विचार-विमर्श के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक हुई, जिसमें पाकिस्तान सेना (Pakistan military) के उच्चाधिकारी शामिल थे.

ये भी गनीमत थी. इसके बाद गुरुवार की दोपहर में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा कि हम इस पूरे मामले को संयुक्त राष्ट्र में लेकर जाएंगे, क्योंकि भारत ने नियमानुसार गलत काम किया है. पाकिस्तान साथ ही साथ कोशिश कर रहा है कि पूरी दुनिया से उसे इस मामले पर समर्थन मिले.

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पाकिस्तान की इस पूरी कवायद का नतीजा क्या निकला-

  • पाकिस्तान किसी भी तरह की कोई कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पाया है.

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  • भारत से उसे राजनयिक संबंधों की वरीयता कम की है, जिसका कोई असर भारत पर नहीं पड़ने वाला

  • एयरस्पेस में उसने फिर पाबंदी लगाने की घोषणा की है, लेकिन ये कदम उसने इस तरह उठाया है कि लगता है कि इसके जरिए अपनी जनता को बहकावे में ज्यादा रख रहा है, क्योंकि ये पाबंदी केवल लाहौर के ऊपर उड़ने पर है और वो भी केवल पांच घंटों के लिए.

  • व्यापारिक संबध तोड़ने की बात की है, जिसका नुकसान उसे ज्यादा है, क्योंकि भारत से जो सामान वहां जाते थे, उस पर भाड़ा कम लगता था. अब जो सामान आएगा वो दूर से आएगा और इस पर खर्च ज्यादा लगेगा और वो सामान भारत की तुलना में कहीं ज्यादा महंगा पड़ेगा, यानि कंगाली के आलम में पाकिस्तान का आटा और गीला


पिछले कुछ दशकों में पाकिस्तान ने कश्मीर के नाम पर खुद अपनी आवाम को भी जिस तरह भड़काया है, उसके बाद अब उनके गुस्से को संभालना हुक्मरानों के लिए मुश्किल हो रहा है


  • समझौता एक्सप्रेस रोक दी गई है. हालांकि ऐसा कई बार हो चुका है. जब भी तनाव होता है तो समझौता एक्सप्रेस रोक दी जाती है. ये कदम भी एक तरह से प्रतीकात्मक ज्यादा लगता है

  • तीन-चार दिनों तक गीदड़भभकियां देने के  बाद पाकिस्तान ने अचानक सुर बदल लिए कि मामले को कूटनीतिक तौर पर सुलझाने की कोशिश करेंगे

  • कई दिनों तक पाकिस्तान ने कोशिश की कि कश्मीर पर भारत के कदम के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाए लेकिन इस पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का रुख काफी ठंडा रहा.

  • खुद उसका अपना मीडिया भी लिख रहा है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में इस मामले को ले जाने से कोई फायदा नहीं होने वाला.


क्या पाकिस्तान वाकई गंभीर है 
दरअसल पाकिस्तान ने आजादी के बाद से कश्मीर को लगातार अपनी अवाम के बीच भावनात्मक मुद्दा बनाने की कोशिश की.  इस गुब्बारे को यूं फुलाता रहा कि असल मुद्दों से जनता को भटकाते रहें. उन्हें केवल कश्मीर में संघर्ष की बात बताकर बरगलाते रहें. पिछले कई दशकों से पाकिस्तान में जनता के दिमाग में यही डाला जाता रहा है कि कश्मीर के लिए किस कदर उसके हुक्मरान और सेना लड़ाई लड़ रही है.

लिहाजा पाकिस्तान की जनता को कभी उस आतंकवाद से कोई दिक्कत नहीं हुई, जिसके जरिए भारत और कश्मीर में अस्थिरता फैलाई जाती रही थी. जनता के हक की बड़ी धनराशि सेना और आतंकवादियों के पास जाती थी.  जनता भी गफलत में रही कि उसके हुक्मरान वाकई कश्मीर में शानदार काम को अंजाम दे रहे हैं. लेकिन अब पूरे पाकिस्तान को ये लग रहा है कि ये क्या हो गया है.

पाकिस्तान की स्थिति अब दो पाटों में फंसी जैसी हो गई है. एक ओर उसकी गुस्सा अवाम है और दूसरी ओर भारत. ऐसे में अब वो करे तो क्या करे


दो पाटों के बीच फंसे पाकिस्तानी हुक्मरान और सेना
ज्योंही भारत में यूपीए सरकार ने आर्टिकल 370 के प्रावधानों में रद्दोबदल कर कश्मीर में सारी तस्वीर बदल डाली तो पाकिस्तान के लोग हैरान रह गए कि रातोंरात बाजी ही पलट गयी. पाकिस्तान की जनता के दिमाग जिस तरह सालों से कश्मीर को भरा जाता रहा है, उससे वो उसके लिए बड़ा मुद्दा रहा है.  अब जनता में गुस्सा है. वहां जनता सड़कों पर उतर कर विरोध जाहिर कर रही है-उसके निशाने पर कोई और नहीं बल्कि उनकी सरकार और सेना है, जिसे वो निकम्मा मानते हुए कोस रहे हैं.

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लिहाजा पाकिस्तान के सामने कोई और रास्ता बचा नहीं कि वो भारत पर नाराजगी जाहिर करने के साथ चेतावनी देने का दिखावा कर सके, वही काम वो पिछले कई दिनों से कर भी रहे हैं. कहा जा सकता है कि पाकिस्तान की सरकार और सेना इस समय दो पाटों के बीच खुद को फंसा हुआ पा रही है-एक ओर उसकी अपनी नाराज जनता है और दूसरी ओर भारत. जनता की नाराजगी इसलिए और ज्यादा है क्योंकि उसके सामने रोटियों के लाले पड़े हुए हैं. महंगाई जबरदस्त तरीके से बढ़ चुकी है. रोजाना की चीजें खरीदना मुश्किल हो रहा है. रोज-ब-रोज उसे नए तरह के करों का सामना करना पड़ रहा है.

पाकिस्तान पर अभी फिलहाल 97 अरब डॉलर का कर्ज लदा हुआ है, वो ऐसे में कैसे उबरे-उसकी सबसे बड़ी चिंता यही है-अगर उसने लड़ाई का खयाल भी किया तो ये उसे उल्टे भारी पड़ेगा


आर्थिक तौर पर खस्ताहाल 
माना जा रहा है कि पाकिस्तान की ये हालत हुक्मरानों के भ्रष्टाचार और सेना के अनाप-शनाप खर्चों के कारण हुई है. 97 अरब डॉलर का कर्ज के नीचे पाकिस्तान बुरी तरह दबा हुआ है. वो दुनियाभर में घूम-घूमकर कर्ज मांग रहा है और कोई कर्ज देने को तैयार नहीं.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से लेकर विश्व बैंक जैसी वित्तीय संस्थाओं ने या तो हाथ खड़े कर दिये हैं या फिर शर्तें इतनी कड़ी कर दी हैं कि आने वाले समय पाकिस्तान को बाहरी देशों से कुछ भी खरीदना और मांगना असंभव जैसा होने वाला है.

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ऐसे में पाकिस्तान के लिए भारत के खिलाफ कोई भी लड़ाई लड़ना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही होगा. ये बात अब पाकिस्तान भी जान रहा है कि किसी भी लड़ाई भारत का बेशक कुछ ना बिगड़े लेकिन उसका नुकसान ऐसा होगा कि देश चलाना भी टेढी खीर हो जाएगा.

एक समय वो भी था जब कश्मीर में भारतीय सेना हीरो थी और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे आम थे


ऐतिहासक तौर पर क्या है सच्चाई 
वैसे अगर ऐतिहासिक घटनाओं की बात की जाए या आजादी के बाद के हालात की ओर देखा जाए तो कश्मीर के लोग तब किसी भी हालत में पाकिस्तान में नहीं मिलना चाहते थे. वो भारत और पाकिस्तान के बीच स्वतंत्र अस्तित्व रखने के पक्ष में थे. तब कश्मीर में सबसे बड़ी सियासी पार्टी के नेता शेख अब्दुल्ला बार बार कहते थे कि वो जीते-जी कभी कश्मीर का पाकिस्तान में विलय नहीं होने देंगे. महाराजा हरि सिंह से लेकर शेख अब्दुल्ला दोनों का मानना था कि अगर पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जे की कोशिश की तो वो भारत में मिलना पसंद करेंगे.

तब घाटी में पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगते थे
जब कश्मीर पर पाकिस्तान समर्थित कबाइलियों ने हमला किया और भारतीय फौजें वहां पहुंचीं तो कश्मीर की जनता ने दिल से भारतीय सेना के लिए नारे लगाए. तब कश्मीरी अवाम को भारत में विलय से कोई गुरेज नहीं था.  उस समय पूरे कश्मीर में पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगते थे. उनके खिलाफ गुस्सा हमेशा भरा रहता था.

इसे भांपकर ही पाकिस्तान ने तब खुद संयुक्त राष्ट्र की जनमतसंग्रह की शर्त पर अडंगेबाजी की, क्योंकि तब उसे आशंका थी कि अगर रायशुमारी होती है तो तयशुदा तरीके से कश्मीरी लोग भारत के साथ जाएंगे. लेकिन उसके बाद पाकिस्तान ने अपना लक्ष्य बना लिया कि उसे किसी ना किसी तरह कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद का जहर बोना है. जिसमें कहना चाहिए कि वो कामयाब रहा. लेकिन अब पाकिस्तान को भी मालूम है कि कश्मीर की लड़ाई में जो टर्न आ गया है, उसमें वो इसे गंवाने वाला है.

इन मामलों में देश के दूसरे हिस्सों से बेहतर है जम्मू कश्मीर

 

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First published: August 9, 2019, 5:40 AM IST
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