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क्या कमजोर हो गई है पाकिस्तान सेना, लगे हैं ये दो तगड़े झटके

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: December 18, 2019, 8:54 PM IST
क्या कमजोर हो गई है पाकिस्तान सेना, लगे हैं ये दो तगड़े झटके
पिछले 70 सालों से पाकिस्तानी सेना वहां के तंत्र पर बुरी तरह हावी थी लेकिन अब लगता है समय बदल रहा है

पाकिस्तान में एक महीने में वहां की सेना के खिलाफ दो ऐसे फैसले आए हैं कि सेना की ताकत बुरी तरह हिल गई लगती है. पहला फैसला अगर पाकिस्तानी सेना के प्रमुख बाजवा के खिलाफ गया तो दूसरे में पूर्व सैन्य शासक और जनरल परवेज मुशर्रफ को फांसी की सजा सुना दी गई

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  • Last Updated: December 18, 2019, 8:54 PM IST
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पाकिस्तान (Pakistan) और विदेशी मीडिया में आमतौर पर ये चर्चाएं चल रही हैं कि पाकिस्तान की सेना पिछले सत्तर सालों में सबसे कमजोर दिख रही है. उसे हाल में दो बड़े झटके जिस तरह लगे हैं, उसके बाद माना जाने लगा है कि उसकी स्थिति पहले के मुकाबले काफी कमजोर हुई है.

हाल में आए दो फैसलों ने ऐसा ही जाहिर किया है. ये दोनों फैसले एक महीने के अंदर आए हैं, जिन्होंने सेना को बुरी तरह हिलाया भी है. साथ ही उसके आत्मविश्वास पर बड़ी चोट की है. जाहिर है कि ऐसे में अगर पाकिस्तानी सेना को लेकर सवाल उठने लगे हों तो ये स्वाभाविक ही है.

पहला फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दिया था. ये फैसला पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा (Qamar Javed Bajwa) को लेकर था. सुप्रीम कोर्ट ने पहले तो एक झटके में बाजवा के तीन साल के कार्यकाल विस्तार के इमरान खान सरकार के फैसले पर सवाल ही नहीं उठाया बल्कि उसे निलंबित भी कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने इस रुख पर सेना और देश में तहलका मच गया. लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि सुप्रीम कोर्ट ये भी कर सकता है. कोर्ट ने जब पूछा देश के संविधान के किस प्रावधान के तरह सेना प्रमुख बाजवा को रिटायरमेंट के बाद विस्तार दिया गया है तो कोर्ट में ना तो बाजवा के वकील के कुछ बोल पाए और ना खुद बाजवा.





सेना को बड़ा झटका 
हालांकि जख्मों पर मरहम लगाते हुए बाद में कोर्ट ने उनके कार्यकाल के विस्तार पर मुहर तो लगाई लेकिन केवल छह महीने के लिये. पाकिस्तान के इतिहास में सेना की ताकत को देखते हुए ये एक बहुत बड़ा फैसला था.

सेना प्रमुख जनरल बाजवा मन मसोस कर रह गए लेकिन कोर्ट का कुछ नहीं कर सके. बल्कि पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर कोर्ट के इस फैसले को सही ठहराया गया.

दूसरा फैसला मुशर्रफ पर आया
दूसरा फैसला 17 दिसंबर को लाहौर की विशेष अदालत ने सुनाया. मुशर्रफ पर राजद्रोह के मामले में 2013 से ही एक मामला लंबित था जिसमें अब फैसला आया है.

परवेज मुशर्रफ ने 3 नवंबर 2007 को पाकिस्तान में आपातकाल की घोषणा की थी, जिसके सिलसिले में उन पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया गया था. तीन जजों की बेंच ने 2-1 के बहुमत के आधार पर यह फैसला सुनाया है. मुशर्रफ फिलहाल दुबई में रह रहे हैं. पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार किसी सैनिक शासक को फांसी की सजा सुनाई गई है.

हैरानी से भर उठा पाकिस्तान 
पूर्व सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ को जब फांसी की सजा सुनाई तो देशभर में लोग हैरानी से भर उठे. उन्हें कतई उम्मीद नहीं थी कि कोर्ट मुशर्रफ को इतनी कड़ी सजा सुना सकती है.

जब लाहौर की अदालत ने परवेज मुशर्रफ केो फांसी की सजा सुनाई को पाकिस्तान दंग रह गया. इससे पहले कभी पाकिस्तानी जनरलों को ऐसे कड़े फैसलों का सामना नहीं करना पड़ा


ये सबको मालूम है कि मुशर्रफ आज भी पाकिस्तानी सेना में खासे लोकप्रिय हैं. सेना के तमाम अफसर और जनरल उनकी देखरेख में तैयार हुए हैं. कई को उन्होंने खुद ग्रुम किया. ऐसे में मुशर्रफ को फांसी पर लटकाना खुद सेना के लिए बड़ा झटका होगा.

पहली बार पाक सेना ने न्यायपालिका के खिलाफ आवाज उठाई
इसी वजह से पहली बार सेना खुद अपनी न्यायपालिका के खिलाफ खुलकर सामने आई और उसने कहा, इस फैसले से सेना में नाराजगी हैं. मुशर्रफ ने देश को बचाया है ना कि वो कोई गुनहगार हैं.
साफ है कि सेना मुशर्रफ को बचाने के लिए तमाम रास्तों पर जाएगी. सरकार भी दबाव डालेगी. खुद पाकिस्तान सरकार ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने का फैसला किया है. वैसे तो ये काम मुशर्रफ खुद करते तो बेहतर रहता.

कमजोर पड़ा सेना का हौव्वा
जाहिर इन दोनों फैसलों ने सेना और उसके बड़े अफसरान को ना केवल कठघरे में खड़ा किया बल्कि ऐसे फैसले दिए कि लगने लगा कि पाकिस्तान में सेना का हौव्वा कमजोर पड़ रहा है.

पाकिस्तान की इमरान सरकार ने जनरल बाजवा के कार्यकाल को तीन साल का विस्तार दिया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे काटकर छह महीने तक सीमित कर दिया


पिछले 60-70 सालों से पाकिस्तान में सेना एक मजबूत ताकत थी. कोई ताकतवर से ताकतवर संस्था भी उनके खिलाफ जाने का साहस नहीं कर पाती थी. यहां तक की कोर्ट के फैसले भी इसी के मद्देनजर आते थे.

पाकिस्तान बनने के बाद वहां आधे से ज्यादा वक्त सेना के जनरलों का ही शासन रहा है. पाकिस्तान के ताकतवर सैन्य नेतृत्व के मामले में पहली बार किसी अदालत ने दखल दिया है.

बदलते हालात में हैसियत कमतर हुई
आप खुद सोचिए कि ताकतवर सेना को अदालत के आदेश के आगे झुकना पड़ा. ये दोनों फैसले ये भी जाहिर करते हैं कि पाकिस्तान में हालात बदल रहे हैं. सेना की मजबूत पकड़ कमजोर पड़ रही है. बल्कि उसकी इमेज भी बुरी तरह से डेंट हुई है. सियासी हैसियत भी कमतर हुई है.

पाकिस्तान में हमेशा से सेना का एक प्रतीकात्मक कद रहा है कि वो दायरे से बाहर है लेकिन कोर्ट ने काफी हद तक इसे कम किया है. कोर्ट ने ये भी दिखाया कि कोई कितना ही ताकतवर क्यों ना हो, बेशक सेना का जनरल ही हो लेकिन कानून से ऊपर नहीं है. सेना को संदेश है कि वो अपना काम करे.

सेना के कमजोर होने की कई और भी वजहें हैं, जिसमें अंतरराष्ट्रीय दबाव से लेकर अमेरिकी मदद का बंद होना भी शामिल है


कई और भी वजहें हैं 
हालांकि पाकिस्तान में सेना के कमजोर पड़ते जाने की कई वजहें और भी हैं. अमेरिका समेत अंतरराष्ट्रीय दबाव है कि पाकिस्तान में सेना अब कोई गड़बड़ी ना करे. आतंकवादियों को प्रश्रय देने के चलते पहले ही उसकी काफी किरकिरी हो चुकी है.

अमेरिका इस देश की आर्थिक मदद बंद कर चुका है, पाकिस्तान की वित्तीय हालत खस्ता है. दुनिया की तमाम वित्तीय संस्थाओं ने अल्टीमेटम दिया है कि पाकिस्तान सेना की करतूतें बंद होनी चाहिए, वो आतंकवाद का जनक बनने से बाज आए, अन्यथा मदद बंद हो जाएगी.

पाकिस्तान में पिछले कुछ सालों में मीडिया की ताकत बढ़ रही है. उसके साथ ही सिविल सोसायटी की आवाज भी बुलंद हुई है. ये सब कुछ वो बातें हैं, जो बताती हैं कि पाकिस्तान में समय बदल रहा है. साथ ही सेना की हैसियत भी. हालांकि अभी पाकिस्तान सेना की ताकत को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकते लेकिन उस पर अब काफी दबाव है.

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First published: December 18, 2019, 8:54 PM IST
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स्रोत: जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, U.S. (www.jhu.edu)
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