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क्यों पैंगोलिन नामक जीव की दुनिया में सबसे ज्यादा तस्करी हो रही है?

पैंगोलिन की दुनिया में सबसे ज्यादा तस्करी हो रही है- (Photo- snl)
पैंगोलिन की दुनिया में सबसे ज्यादा तस्करी हो रही है- (Photo- snl)

पैंगोलिन (Pangolin) से चीन में पारंपरिक दवाएं (traditional medicines in China) बनती आई हैं. साथ ही इसका मांस काफी ऊंचे दामों पर मिलता है, जो ताकत देने वाला माना जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 19, 2021, 2:07 PM IST
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पैंगोलिन एक ऐसा जानवर है, जिसकी दुनिया में सबसे ज्यादा तस्करी हो रही है. तस्करी की वजह है चीन, जहां इस जानवर की खाल और मांस से पारंपरिक दवाएं बनाए जा रही हैं. इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) के मुताबिक दुनियाभर के वन्‍य जीवों की अवैध तस्‍करी में अकेले 20 फीसद का योगदान पैंगोलिन का ही है.

धड़ल्ले से होती आई तस्करी
सांप, छिपकली की तरह दिखने वाला ये जीव स्तनधारी जीवों की श्रेणी में आता है. दशकों से दुनियाभर के देशों से इसकी तस्करी हो रही है और तस्करी के जरिए पैंगोलिन चीन या फिर वियतनाम पहुंच रहे हैं. यहां इस जीव की दवाएं बनाई जाती हैं, जो काफी महंगे दामों पर चीन के कोने-कोने में अमीरों तक पहुंचती हैं. हालत ये हुई कि पैंगोलिन विलुप्त होने वाले जीवों की श्रेणी में पहुंच गए.

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अब जाकर चीन ने रोक की पहल की


काफी विरोध के बाद साल 2020 के जून में चीन ने पैंगोलिन को अपनी पारंपरिक दवाओं की सामग्री की लिस्ट से हटाया. चीन के हेल्थ टाइम्स अखबार में ये बात आई. इसके बाद भी पशु अधिकारों की बात करने वालों को तसल्ली नहीं हो सकी.

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ये शर्मीले जीव धरती पर लगभग 60 मिलियन सालों से पाए जाते हैं


अब भी नहीं है सुरक्षित 
इसकी वजह ये है कि पैंगोलिन को सामग्री की लिस्ट से तो हटा दिया गया लेकिन अब भी pharmacopoeia की लिस्ट में इसके होने का डर है. बता दें कि pharmacopoeia चीनी दवाओं की सामग्री के ही हवाले से इस्तेमाल होने वाली टर्म है. तो हो रहा है कि आधिकारिक तौर पर भले ही चीन अपनी पारंपरिक दवाओं में पैंगोलिन को गायब दिखाए लेकिन अंदर कोई गड़बड़ हो सकती है. पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था इनवायरमेंट इनवेस्टिगेशन एजेंसी (EIA) ने इस बारे में पहले ही संदेह जता दिया था.

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यहां ये समझना जरूरी है कि आखिर पैंगोलिन का चीनी दवाओं से क्या संबंध हैं. इसके लिए सबसे पहले तो पैंगोलिन के बारे में जानते हैं. ये शर्मीले जीव धरती पर लगभग 60 मिलियन सालों से पाए जाते हैं. ये चींटियां खाकर गुजारा करते हैं.

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एक किलो की कीमत 27000 रुपए
शरीर पर कड़ी और सुनहरी-भूरी स्केल्स वाले इन जीवों का मांस खूब शौक से खाया जाता है. इसके एक किलो की कीमत लगभग 27000 रुपए तक होती है, इसलिए चीन में ये एग्जॉटिक जानवरों की श्रेणी में मिलता है. यानी वेट मार्केट में दूसरे कम कीमत के सस्ते जीवों के साथ पैंगोलिन नहीं बिकता, बल्कि महंगे रेस्त्रां ही इसे बेचते या पकाते हैं.

china medicine
पैंगोलिन का सबसे ज्यादा इस्तेमाल ट्रेडिशनल चाइनीज मेडिसिन (TCM) में होता है


बनती है कई किस्म की दवाएं 
इसका दूसरा और सबसे ज्यादा इस्तेमाल ट्रेडिशनल चाइनीज मेडिसिन (TCM) में होता है. बता दें कि चीनी दवाओं का कारोबार लगभग 130 बिलियन डॉलर का माना जाता है. इसके तहत कई तरह के जंगली-जानवरों से दवाएं बनाई जाती हैं, जैसे पैंगोलिन के अलावा सांप, बिच्छू, मकड़ी और कॉक्रोच. पैंगोलिन के मांस से अलग दवाएं बनती हैं तो इसके स्केल्स से अलग किस्म की दवा बनती हैं. हर दवा का उपयोग अलग बीमारी के लिए होता है.

पैंगोलिन के स्केल्स यानी शरीर की ऊपरी कड़ी परत से बनने वाली दवाएं चॉकलेट के बार की तरह दिखती है लेकिन काफी कठोर होती है. इसे गर्म पानी या अल्कोहल में घोलकर पिया जाता है. इसके अलावा पैंगोलिन के मांस को नई मां को पिलाया जाता है ताकि उसे ताकत मिल सके. बहुत से लोग इसे जूस में डालकर पीना पसंद करते हैं. ट्रेडिनशल मेडिसिन बनाने वाले इसे धूप में सुखाकर कैप्सूल में बदलते हैं और फिर इसे भारी कीमत पर बेचा जाता है.

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पैंगोलिन के मांस के एक किलो की कीमत लगभग 27000 रुपए तक होती है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


चीन में गधों की तस्करी भी खूब
इस जीव के अलावा चीन में हाल ही में गधों की तस्करी की भी बात सामने आई थी. गधों के चमड़े से बनने वाले जिलेटिन यानी गोंदनुमा पदार्थ से चीन में एजियाओ (ejiao) नाम की दवा बनाई जाती है. Traditional Chinese Medicine (TCM) के तहत आने वाली ये दवा शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने के लिए दी जाती है. इसके अलावा जोड़ों के दर्द में भी ये कारगर दवा मानी जाती है. रिप्रोडक्टिव समस्या में भी गधे की चमड़ी से बना जिलेटिन दवा की तरह लेते हैं.

बीमारियों के इलाज के अलावा इससे यौन ताकत बढ़ने का दावा भी होता है, इस वजह से भी चीन में इसकी भारी डिमांड है. The Donkey Sanctuary के मुताबिक साल 2013 से 2016 के बीच एजियाओ दवा का उत्पादन 3,200 टन से बढ़कर 5,600 टन हो गया. यानी हर साल इसके उत्पादन में लगभग 20 फीसदी बढ़ोत्तरी हो रही है.
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