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सूर्य के कमजोर रहते काफी गर्म हो गई थी पृथ्वी, वैज्ञानिकों ने खोजी इसकी वजह

युवा पृथ्वी (Earth) की सतह काफी गर्म हुआ करती थी, जबकि तब सूर्य से भी रोशनी आज के मुकाबले कम ही आ पाती थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

युवा पृथ्वी (Earth) की सतह काफी गर्म हुआ करती थी, जबकि तब सूर्य से भी रोशनी आज के मुकाबले कम ही आ पाती थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

पृथ्वी (Earth)पर 3-4 अरब साल पहले युवा कमजोर सूर्य (Sun) के बावजूद बहुत अधिक तापमान हुआ करता था. इस विरोधाभास की व्याख्या करते हुए वैज्ञानिकों ने इसका कारण CO2 बताया है.

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    आज से तीस से चार अरब साल पहले युवा पृथ्वी (Earth) बहुत गर्म थी. उस समय सूर्य (Sun)आज की तीव्रता से केवल 70-80 प्रतिशत ही चमका करता था. वहीं उस समय पृथ्वी पर किसी तरह की ग्लेशियर हिम तक नहीं थी. ऐसे में पृथ्वी की गर्म जलवायु के पीछे की वजह जानना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ा सवाल रहा है. सूर्य और पृथ्वी के बीच के इस विरोधाभास को युवा कमजोर सूर्य का विरोधाभास कहते हैं.  लेकिन नए शोध में शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि उस समय पृथ्वी पर भारी मात्रा में कार्बनडाइऑक्साइड (Carbon dioxide) का मौजूद रहना इसकी सबसे अच्छी व्याख्या हो सकती है.

    बर्फ को गोला होना चाहिए था
    वैज्ञानिकों का मानना है कि उस समय को हालात के हिसाब से बिना प्रभावी ग्रीन हाउस गैस के युवा पृथ्वी एक बर्फ का गोला बन जाती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. चाहे कार्बन डाइऑक्साइड हो, या मीथेन या फिर कोई दूसरी ही ग्रीन हाउस गैस, पृथ्वी उस समय गर्म कैसे रही यह लंबे समय से वैज्ञानिकों में बहस का विषय रहा है.

    CO2 ही हो सकती है सही व्याख्या
    नए अध्ययन में कलोन यूनिवर्सिटी के डेनियल हेरवार्ट्ज, गोटिंगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ एंड्रियास पैक और डेनमार्क की ऑरहूस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ थोर्सन्टन नागेल के इस नए शोध में बताया गया है कि उच्च कार्बन डाइऑक्साइड स्तर ही इसकी सही व्याख्या हो सकती है.

    एक और जवाब भी
    शोध में बताया गया है कि इससे एक दूसरी भूवैज्ञानिक समस्या का समाधान मिलता है जिसमें महासागरों के तापमान के ज्यादा होने की वजह का भी पता चलता है. यह अध्ययन प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेश्लन एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित हुआ है. शुरुआती महासागरों का तापमान भी पृथ्वी विज्ञान में खासा विवाद का विषय रहा है.

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    युवा पृथ्वी (Earth) की सतह काफी गर्म हुआ करती थी, जबकि तब सूर्य से भी रोशनी आज के मुकाबले कम ही आ पाती थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    गर्म होने के प्रमाण
    ऐसे प्रमाण मिले हैं कि पहले महासागर बहुत गर्म हुआ करते थे. बहुत पुरानी चूना पत्थर और सिलिका की चट्टानों पर ऑक्सीजन के आइसोटोप के मापनों से पता चलता है कि वे समुद्री पानी का तापमान 70 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर हुआ करता था. इन आइसोटोप को जियोथर्मामीटर कहा जाता है.

    ऑक्सीजन की संरचना में बदलाव
    उस समय कम तापमान तभी संभव हो सकता था जब समुद्री जल ने अपने ऑक्सीजन आइसोटोप की संचरचना को  बदल दिया हो. लेकिन यह माना जाता रहा था कि इसकी संभवना नहीं है. नए अध्ययन के मॉडल सुझाते हैं कि वायुमंडल में उच्च कार्बन डाइऑक्साइड स्तर ही इसकी सही व्याख्या हो सकते हैं, क्योंकि उनसे महासागरों की संरचना में भी बदलाव हो गया होगा.

    और कारण नहीं हो सकते
    CO2 ही पृथ्वी की गर्म जलवायु और जियोथर्मामीटरों के महासागरों में गर्म पानी के संकेत देने का कारण हो सकती है. हेरवार्ट्स का कहना है कि समुद्री जल में ऑक्सीजन के अलग अलग आइसोटोप को शामिल करने पर भी तापमान 40 डिग्री से ज्यादा का नहीं हो सकता था. मीथेन की अधिक मात्रा भी जलवायु गर्म कर सकती थी, लेकिन उससे समुद्री जल गर्म नहीं होता.

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    उस समय महासागरों (Oceans) में भी तापमान 70 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हुआ करता था. (फाइल फोटो)

    CO2 ही दोनों का कारण
    दोनों ही परिघटनाओ का कारण अधिक CO2 का होना ही हो सकता है. आज अगर पूरा वायुमडंल CO2  का होता तो उतनी मात्रा तब के वायुमंडल में होने से दोनों घटनाओं के नतीजे मिल पाते. आज वायुमंडल में CO2 केवल एक ट्रेस गैस है यानि बहुत कम मात्रा वाली गैस है. पैक का कहना है कि यह एक बार के दबाव वाली CO2 ज्यादा लगती है, लेकिन आज के शुक्र ग्रह पर 90 बार के दबाव वाली CO2 है.

    कम होती गई CO2 की मात्रा
    पृथ्वी के वायुमंडल और महासागरों से कार्बन डाइऑक्साइड हट गई और कोयले, तेल, गैस और काले शेल एवं चूना पत्थर के रूप में जमा हो गई. ये कार्बन के भंडार महासागरों में मौजूद हैं, लेकिन युवा पृथ्वी पर महाद्वीप नहीं थे. इसलिए कार्बन की भंडारण क्षमता सीमित थी. यही कारण है कि तब और आज की पृथ्वी की वायुमंडल में CO2 की मात्रा में इतना अंतर है.

    टेक्टोनिक प्लेट ने सब कुछ बदल दिया था. विशाल भूभाग के होने से सिलिकेट अपरदन में तेजी आई जिससे CO2 चूना पत्थर में बदलने लगा. इसके साथ ही टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण कार्बन पृथ्वी के मेंटल में भी जाने लगा. इससे CO2 वायुमंडल में तेजी से कम होने लगा. यही वजह है कि आज कार्बन डाइऑक्साइड बहुत ही कम मात्रा में है.

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