Explained: क्यों महिलाओं को नौकरी पर रखने के कारण पेरिस पर लगा जुर्माना?

एक विभाग को महिलाओं की ज्यादा नियुक्ति का खामियाजा 80 लाख रुपयों के तौर पर देना पड़ा- सांकेतिक फोटो (pixabay)

एक विभाग को महिलाओं की ज्यादा नियुक्ति का खामियाजा 80 लाख रुपयों के तौर पर देना पड़ा- सांकेतिक फोटो (pixabay)

पेरिस के एक विभाग को महिलाओं की ज्यादा नियुक्ति का खामियाजा 80 लाख रुपयों के जुर्माने के (Paris is being fined for appointing too many women) तौर पर देना पड़ा. कानून का कहना है कि इससे लैंगिक संतुलन बिगड़ता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 19, 2020, 3:39 PM IST
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फ्रांस के कानून ​विभाग ने पेरिस सिटी हॉल (Paris city hall) में शीर्ष पदों पर ज्यादा महिलाओं (More Women Appointed) की नियुक्ति के लिए 90 हजार यूरो यानि 80,46,720 रुपये का जुर्माना लगाया है. इन महिलाओं की नियुक्ति वर्ष 2018 में हुई थी. इसपर कानून विभाग ने कहा कि पुरुषों और महिलाओं की नियुक्ति में फर्क लैंगिक संतुलन को खराब करता है.

बता दें कि साल 2018 में सिटी हॉल में 11 महिलाओं और 5 पुरुषों को नियुक्त किया गया. इस तरह से 69 प्रतिशत अपॉइंटमेंट महिलाओं का रहा. ये नियुक्ति साल 2013 के उस नियम की अनदेखी है, जिसे सुवादेत लॉ कहते हैं. इस नियम के मुताबिक किसी भी सरकारी विभाग में 40 प्रतिशत नियुक्ति महिलाओं, और इतनी ही नियुक्ति पुरुषों की होनी चाहिए.

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ये नियम इस वजह से बना ताकि सिविल सर्विस में ऊंचे पदों तक महिलाओं की भी पहुंच रहे. साथ ही साथ इससे ये भी सुनिश्चित करने की कोशिश हुई कि किसी विभाग में 60 प्रतिशत तक एक ही जेंडर न हो जाए. ये सारे नियम सरकार में महिलाओं की पहुंच और आवाज पक्की करने के लिए बनाए गए. साल 2019 में इस नियम में एक संशोधन हुआ. इसके तहत ये तय हुआ कि अगर किसी सरकारी विभाग में अगर कोई एक जेंडर लगभग 60 प्रतिशत जगह ले तब उस विभाग को जुर्माना देना होगा. इस नियम के आने के साथ ही सिटी हॉल पर जुर्माना ठोक दिया गया.
मेयर एने हिडेल्गो के मुताबिक इस तरह का जुर्माना लगाया जाना बेतुका है


इसपर पेरिस की महिला मेयर की प्रतिक्रिया ही अलग रही. मेयर एने हिडेल्गो के मुताबिक पेरिस सिटी हॉल पर इस तरह का जुर्माना लगाया जाना वैसे तो निहायत गलत और बेतुका है लेकिन वे इससे परेशान नहीं हैं. हिडेल्गो ने जुर्माने की खबर ब्रेक करते हुए कहा कि मुझे खुशी है हमपर इस तरह का जुर्माना लगा.

क्यों फ्रांस में सुवादेत लॉ की जरूरत पड़ी?



यूरोपियन देशों में काफी आगे और काफी उदारवादी फ्रांस में भी महिलाओं के साथ भेदभाव नई बात नहीं. वहां नौकरियों में महिलाएं काफी पीछे हैं और लगभग सारे ऊंचे पदों पर पुरुष ही बैठे हुए हैं. खासकर प्रशासनिक पदों पर हाल और खराब हैं. साल 2018 में वहां केवल 31 प्रतिशत महिलाएं ही सिविल सर्विस में दिखीं. पेरिस की मेयर हिडेल्गो फ्रांसीसी इतिहास में पहली महिला मेयर हैं. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि महिला बराबरी के मामले में फ्रांस भी पिछड़ा हुआ है.

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नौकरियों में महिलाओं के साथ भेदभाव खत्म करने के लिए सुवादेत लॉ बना. ये पक्का करता है कि किसी भी सरकारी सेवा में दोनों जेंडर समान मौके पाएं. हालांकि ऐसा हो नहीं रहा. इंडियन एक्सप्रेस में मिनिस्ट्री ऑफ पब्लिक सर्विस 2015 के हवाले से ये भेदभाव बताया गया है.

नौकरियों में महिलाओं के साथ भेदभाव खत्म करने के लिए सुवादेत लॉ बना- सांकेतिक फोटो (pixabay)


इसमें साफ है कि राज्य प्रशासनिक सेवा के लगभग 2.4 मिलियन कर्मचारियों में से वे महिलाएं पीछे होती चली गईं, जो मातृत्व अवकाश पर रहीं. बच्चे के जन्म के तीन साल बाद भी वे ये फर्क पाट नहीं सकीं, बल्कि अपने समान ओहदे वाले पुरुषों से कम तनख्वाह पाती रहीं. ये आंकड़ा केवल उन महिलाओं के बारे में है, जिनकी एक संतान है. अगर कोई कर्मचारी दूसरे या अधिक बच्चों के लिए प्लान करे तो वो जाहिर तौर पर करियर में अपने पुरुष सहकर्मी से कई गुना पीछे चली जाती है. इस पीछे जाने को विशेषज्ञ एक खास टर्म से पुकारते हैं- मदरहुड पेनल्टी. यानी मातृत्व के कारण महिलाओं को अपने शरीर पर तकलीफों के अलावा आर्थिक खामियाजा भी भुगतना पड़ता है. वर्कप्लेस पर ये अंतर काफी साफ दिखता है.

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टर्म की शुरुआत में फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों ने वादा किया था कि महिला अधिकार उनकी सरकार के सबसे अहम मुद्दों में से होगा. हालांकि इसके बाद भी फ्रांस में वर्कप्लेस पर महिलाओं की संख्या नहीं बढ़ी. और अब बढ़ी हुई संख्या पर कानून मंत्रालय ने जुर्माना लगा दिया. इसपर फ्रांस में फिलहाल जोरदार बवाल मचा हुआ है.

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फैशन और आधुनिकता के देश फ्रांस में साल 2013 में ही महिलाओं को पैंट पहनने का अधिकार मिला. इसी साल की शुरुआत में फ्रांस की सरकार ने दो सौ साल पुराने उस प्रतिबंध को खत्म किया, जिसके मुताबिक वहां महिलाओं को पैंट पहनने की मनाही थी. 17 नवंबर 1800 को लागू ये कानून असल जिंदगी में पहले ही खत्म हो चुका था लेकिन औपचारिक तौर पर ये कानून की किताबों में मौजूद था. संसद में बात उठने पर इसे पूरी तरह से हटा दिया गया. वैसे बता दें कि ये कानून भी महिलाओं को दफ्तर में काम करने या घुड़सवारी जैसे ताकत वाले काम करने से रोकने के लिए बना था.
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