हमारी हर दूसरी सांस के लिए महासागरों से आती है हवा, जानिए क्या भूल रहे हैं हम

हमारी हर दूसरी सांस के लिए महासागरों से आती है हवा, जानिए क्या भूल रहे हैं हम
फायटोप्लैंक्टॉन भी पेड़ पौधे की तरह हवा शुद्ध करते हैं.

महासागरों में फायटोप्लैंक्टॉन (Phytoplankton) भी वही भूमिका निभाते हैं जो हमारे पेड़ पौधे फिर भी हम इन्हें नजरअंदाज कर रहे हैं.

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नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन (Climate change) और ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) के खतरे अब दुनिया के समाने मुखर होते जा रहे हैं. इसके लिए लोगों सहित वैज्ञानिकों का ध्यान केवल जमीन पर होने वाली गतिविधियों सहित वहां के पेड़ पौधों पर है. लेकिन एक शोध से पता चला है कि दुनिया का आधी कार्बनडाइऑक्साइड को जैविक पदार्थ में बदलने का काम महासागरों  के खास जीव फायटोप्लैंक्टॉन (phytoplankton) करते हैं.

इनकी खास भूमिका है
आमतौर पर महासगारों के पारिस्थितिकी तंत्र या विज्ञान (Ecosystem) में फायटोप्लैंक्टॉन (phytoplankton) का खास किरदार होता है. इन दिनों बायोलॉजी में सबसे चर्चित विषयों में से एक यही है कि कैसे फायटोप्लैंक्टॉन का उत्पादन ग्लोबल वार्मिंग को प्रभावित कर रहा है. एक शोध के मुताबिक ये जीव समुद्र में बड़ी मात्रा में कार्बन संबंधी प्रक्रिया में भागीदार है और उनकी भागीदारी धरती पर पेड़ पौधों से कम नहीं है.

क्या होते हैं फायटोप्लैंक्टॉन
फायटोप्लैंक्टॉन समुद्र की सतह पर जीने वाले स्वतंत्र रूप से तैरते हुए पौधे होते हैं. यानि की ये वे जीव होते हैं जो समुद्र की सतह पर होते हैं और प्रकाश संश्लेषण की सहायता से खुद के लिए भोजन भी तैयार करते हैं. ये आंखों से प्रत्यक्ष हमें दिखाई नहीं देते, लेकिन इनकी पृथ्वी की कार्बन चक्र में अहम भूमिका होती है. वे धरती पर मौजूद पेड़ पौधों की क्षमता के बराबर ही कार्बनडाउऑक्साइड अवशोषित कर लेते हैं.



पृथ्वी पर कार्बन संबंधी भागीदारी में योगदान
नए शोध में यूरोपीय स्पेस एजेंसी के क्लाइमेंट चेंज इनिशिएटिव के 20 साल तक के जमा किए आंकड़ों का अध्ययन किया गया है. इसमें यह जानने की कोशिश की गई है कि हमारी पृथ्वी के प्राणी कितना कार्बन संबंधी प्रकिया में भागीदारी कर रहे हैं. इसी अध्ययन से यह चौंकाने वाली जानकारी हासिल हुई है.

Indian Ocean
ग्लोबल वार्मिंग का महासगरों पर भी अध्ययन करने क जरूरत है.


प्राथमिक उत्पादन का महत्व
इस अध्ययन में को समझने के लिए एक शब्द समझना होगा. यह है प्राथमिक उत्पादन (primary production) . पारिस्थितिकी विज्ञान में प्राथमिक उत्पादन का अर्थ उस जैविक पदार्थ के उत्पादन से जो फोटोसिंथेसिस के जरिए कार्बनडाइऑक्साइड,पानी और सूरज के प्रकाश की मदद से बनता है. इस प्रक्रिया का सीधा प्रभाव वायुमंडल, महासागरों में कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा पर पड़ता है. जिसमें पानी के जीवों पर सबसे ज्यादा असर होता है.

फायटोप्लैंक्टॉन की भूमिका पर रखनी होगी नजर
माना जाता है कि ग्रीनहाउस गैसों के निरंतर वृद्धि से महासागरों की सतह का तापमान लगातार बढ़ता ही जाएगा. इसके साथ ही फायटोप्लैंक्टॉन के प्राथमिक उत्पादन पर भी व्यवस्थित तरीके से निरंतर नजदीकी नजर बनाए रखनी होगा. सैटेलाइट की तस्वीरों और इन जगहों पर से जमा किए गए आंकड़ों से हमें पूरी दुनिया के फायटोप्लैंक्टॉन के बारे में जानकारी और उनके जलवायु परिवर्तन पर प्रतिक्रिया मिल सकेगी .

प्राथमिक उत्पादन के अहम आंकड़े
हाल ही में रिमोट सेंसिंग जर्नल में प्रकाशित शोध में वैज्ञानिकों ने प्राथमिक उत्पादन के दूरगामी स्वरूप और उसके साल दर साल होने वाले बदला का अध्ययन किया है. इस प्राथमिक उत्पादन में जगह, मौसम और साल तक के हिसाब से बदलाव होता है. शोधकर्ताओं ने पाया कि कार्बन का वार्षिक प्राथमिक उत्पादन हर साल 38 से 42 गीगाटन की मात्रा में होता है. उन्होंने पाया कि बहुत क्षेत्रीय कारक भी विविधता लाते हैं जिसें तटों के पास ज्यादा उत्पादन होता है.

हमारा ध्यान केवल धरती के पेड़ पौधों पर ही
शोधकर्ताओं का मानना है कि कार्बन उत्सर्जन और प्राथमिक उत्पादन के मामले में हमारा ध्यान धरातल पर ही होने वाली गतिविधियों पर जाता है, लेकिन महासगारों के फोयटोप्लैंक्टॉन पर नहीं जबकि वे भी हमें उतना ही प्रभावित करते हैं जितना पेड़ पौधे.  इसके अलवा जलवायु परिवर्तन का असर  इन पर भी गहरा हो रहा है.

एक शोधकर्ता ने इस बात को समझाने के लिए कहा कि हम जो सांस लेते हैं उसमें से हर दूसरी महासागर से आती है. यानि उसके लिए जो ऑक्सीजन महासागर से आती है. शायद यह हमें अपने पर्यावरण के लिए फायटोप्लैंक्टॉन के प्रति भी सजग कर सके.

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