कश्मीर में पकड़ाया पाकिस्तानी जासूस कबूतर, जानिए कैसे कराई जाती है इनसे जासूसी

कश्मीर में पकड़ाया पाकिस्तानी जासूस कबूतर, जानिए कैसे कराई जाती है इनसे जासूसी
कबूतरों का सीमा पार करना आसान है क्योंकि आमतौर पर उनपर कोई शक नहीं करता (Photo-pixabay)

दूसरे विश्वयुद्ध (second world war) के दौरान ब्रिटिश आर्मी (British Army) ने 250000 से भी ज्यादा कबूतरों (pigeon) को जासूसी (spying) के लिए तैनात किया था.

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हाल ही में जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) में इंटरनेशनल बॉर्डर (international border) पर एक कबूतर (pigeon) मिला. माना जा रहा है कि वो पाकिस्तान का जासूस (pakistani spy) है. वैसे ये पहला मौका नहीं, पहले भी जासूस कबूतर सरहद पार करते रहे हैं. कबूतरों का सीमा पार करना आसान है क्योंकि आमतौर पर उनपर कोई शक नहीं करता. वहीं ड्रोन या किसी इंसान के सीमा के आसपास होते ही खुफिया अमला सतर्क हो जाता है. यही वजह है कि दुनिया के बहुत से देश जासूसी के लिए कबूतरों का सहारा लेते रहे हैं.

कबूतर ही क्यों, कोई दूसरा पक्षी क्यों नहीं!
इसका जवाब है कबूतरों के घर वापस लौटने की खासियत. कबूतर एकमात्र ऐसा पक्षी है जो हर हाल में अपने मालिक (जिससे उन्हें दाना मिलता है) के पास लौटकर आता है. इन्हें Homing pigeon कहते हैं. चूंकि ये काफी समझदार और घरेलू होते हैं इसलिए उन्हें प्रशिक्षण देना आसान होता है. कबूतरों की एक प्रजाति, जिसे Racing Homer कहते हैं, एक बेहद खास कबूतर होते हैं. उन्हें इस तरह से ट्रेन किया जाता है कि वे तेजी से उड़े और गंतव्य तक पहुंचकर वापस लौट सकें. पहले और दूसरे वर्ल्ड वॉर के दौरान कबूतरों की इसी प्रजाति को एक से दूसरी तरह जासूसी या संदेश पहुंचाने के इस्तेमाल किया गया.

ड्रोन की जगह कैमरे वाले कबूतर भी तैयार हुए जो दुश्मन देश की सीमा से घूमकर-फिरकर लौट आया करते (Photo-pixabay)




कैमरे वाले कबूतर


तब ड्रोन की जगह कैमरे वाले कबूतर भी तैयार हुए जो दुश्मन देश की सीमा से घूमकर-फिरकर लौट आया करते. असल में उनके पैरों पर कैमरा लगा होता था. कैमरे वाले रेसिंग होमर का जिक्र साल 1907 में मिलता है. तब कबूतर पालने के शौकीन एक ब्रिटिशर जूलियस न्यूब्रोनर ने एक छोटा कैमरा तैयार करके अपने कबूतरों पर लगाया ताकि ये देखा जा सके कि वे कहां से कहां जाते हैं. इसी खोज से प्रेरित होकर पहले वर्ल्ड वॉर के दौरान जर्मन सेना ने कबूतरों के पैरों में कैमरे फिट कर दिए थे.

लाखों कबूतरों को मिली नौकरी
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कबूतरों का इस्तेमाल बढ़ा. तब यूएस और ब्रिटेन में कबूतर पालन करने वालों ने अपने सारे पक्षी सेना को दे दिए थे. तब ब्रिटिश सेना ने ढाई लाख के लगभग कबूतरों को नौकरी पर रखा था. तब 32 कबूतरों को उनकी बहादुरी के लिए Dickin Medal भी मिला था. अमेरिका के Central Intelligence Agency (CIA) ने पीजन मिशन शुरू कर दिया, जिसका मकसद ही था कबूतरों को ट्रेन्ड करके उनसे जासूसी करवाना. The Smithsonian में इसका जिक्र मिलता है कि सेना इसके लिए एनिमल ट्रेनर्स को नियुक्त करती थी, जो कबूतरों को जासूसी सिखाते थे. कौवों का भी इस्तेमाल होता था. इन दोनों को ही सिखाया जाता था कि किसी चीज को किसी खास जगह पर पहचानकर कैसे रखना है. फोटो दिखाकर उन्हें किसी खास चेहरे को पहचानना भी सिखाया जाता था.

फोटो दिखाकर उन्हें किसी खास चेहरे को पहचानना भी सिखाया जाता है (Photo-pixabay)


बायोवेपन की तरह इस्तेमाल की भी बात उठी
युद्ध के दौरान काम करने वाले कबूतरों को वेतन या खास भत्ता मिलता था, जिसके तहत उन्हें अच्छी क्वलिटी के कॉर्न और बाजरा दिया जाता था. साथ ही रहने के लिए भी उपयुक्त माहौल दिया जाता था. तब कबूतरों का उपयोग इतना ज्यादा था कि यूके की एयर मिनिस्ट्री ने Pigeon Policy Committee बना रखी थी, जो तय करती थी कि कबूतरों का किस हद तक उपयोग होगा. इसमें यहां तक तय हो गया कि कबूतरों को bioweapon की तरह भी इस्तेमाल कर सकते हैं यानी किसी तय जगह पर जाकर बम गिरा देना. हालांकि थोड़े ही दिनों बाद पक्षियों को नुकसान के मद्देनजर इसे रद्द कर दिया गया.

सदियों पहले भी करते थे जासूसी
वैसे माना जाता है कि किसी भी तकनीक की खोज से काफी पहले से भी कबूतरों का उपयोग जासूसी के लिए होता आया था. जैसे छठवीं सदी में पर्शिया के शासक कबूतरों का काफी उपयोग करते थे. यहां तक कि संदेशवाहक के तौर पर भी कबूतरों को भेजा जाता था. प्राचीन रोम में भी जूलियस सीजर कबूतर जासूस रखता था. उन्नीसवीं सदी में फ्रांस और जर्मनी की लगातार लड़ाई के दौरान फ्रेंच सैनिकों ने कबूतरों के जरिए जासूसी शुरू की. इसपर जवाबी कार्रवाई करते हुए जर्मन सेना ने बाज पाल लिए जो कबूतरों का शिकार कर सकें. इतिहासकारों का मानना है कि साल 1870–71 के दौरान 1 अरब से भी ज्यादा संदेश भेजे गए थे.

तकनीक की खोज से काफी पहले से भी कबूतरों का उपयोग जासूसी के लिए होता आया था (Photo-pixabay)


याद में बना है मैमोरियल
लंदन में हाइड पार्क के पास युद्ध में शहीद कबूतरों और दूसरे जानवरों की याद में Animals In War Memorial बना है. इसे बनाने के लिए आम लोगों ने चंदा दिया, जिससे लगभग 1.4 मिलियन पाउंड जमा हुए. इन पैसों से बेहद खूबसूरत मैमोरियल तैयार हुआ, जिसमें कबूतरों, घोड़ों और उन तमाम पशुओं का जिक्र है जो इंसानों के युद्ध में बेमौत मारे जाते हैं. साथ ही उनका भी जिक्र है, जो सेना की तरह ही हमारे साथ लड़ाई लड़ते रहे और शहीद हुए.

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