संक्रमण से उबरे हर मरीज के प्‍लाज्‍मा का कोरोना के इलाज में नहीं हो सकता इस्‍तेमाल, जानें क्‍या हैं रक्‍तदान की शर्तें

संक्रमण से उबरे हर मरीज के प्‍लाज्‍मा का कोरोना के इलाज में नहीं हो सकता इस्‍तेमाल, जानें क्‍या हैं रक्‍तदान की शर्तें
कोरोना वायरस से ठीक हो चुके हर मरीज का प्‍लाज्‍मा दूसरे मरीज के इलाज में नहीं किया जा सकता है.

कोरोना वायरस (Coronavirus) के गंभीर मरीजों के इलाज के लिए डॉक्‍टर्स संक्रमण से उबर चुके लोगों के ब्‍लड से लिए गए प्‍लाज्‍मा का इस्‍तेमाल कर रहे हैं. ऐसे में संक्रमण से उबर चुके लोग प्‍लाज्‍मा डोनेट करने को आगे आ रहे हैं. आइए जानते हैं कि किसका प्‍लाज्‍मा लिया जा सकता है और किसका नहीं...

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 28, 2020, 2:02 PM IST
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कोरोना वायरस (Coronavirus in India) के मरीजों का इलाज करने के लिए डॉक्‍टर्स अलग-अलग तरीकों का इस्‍तेमाल कर रहे हैं. इनमें कोई भी इलाज अब तक पूरी तरह कारगर नहीं माना गया है. ज्‍यादातर मामलों में प्रयोग के तौर पर इलाज किया जा रहा है और किसी एक तरीके से फायदा होने पर उसे दूसरे मरीजों पर भी आजमाया जा रहा है. प्‍लाज्‍मा थेरेपी (Plasma Therapy) भी ऐसा ही एक तरीका है, जिसका अभी क्‍लीनिकल ट्रायल ही चल रहा है. डॉक्‍टर्स अभी इस तकनीक से कोरोना मरीजों के इलाज को लेकर पूरी तरह से आश्‍वस्‍त नहीं हैं.

हालांकि, प्‍लाज्‍मा थेरेपी से इलाज के अच्‍छे नतीजे सामने आ रहे हैं और कोरोना मरीज तेजी से ठीक हो रहे हैं. ऐसे में डॉक्‍टर्स ठीक हो चुके मरीजों से प्‍लाज्‍मा डोनेट करने का आग्रह कर रहे हैं और लोग भी आगे आकर रक्‍तदान कर रहे हैं. इसी बीच बॉलीवुड गायक कनिका कपूर (Kanika Kapoor) ने भी प्‍लाज्‍मा डोनेट करने की इच्‍छा जताई, लेकिन डॉक्‍टर्स ने उनका ब्‍लड लेने से इनकार कर दिया. ऐसे में सवाल उठता है कि क्‍या संक्रमण से उबर चुका हर मरीज प्‍लाज्‍मा डोनेट नहीं कर सकता है? क्‍या इसकी कुछ खास शर्तें हैं? आइए जानते हैं इन सभी सवालों के जवाब...

हीमोग्‍लोबिन या वजन कम होने पर नहीं लिया जाएगा प्‍लाज्‍मा
स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का कहना है कि प्‍लाज्‍मा डोनेट करने के लिए वही शर्तें लागू होती हैं, जो रक्‍तदान में जरूरी होती हैं. इस बारे में इम्‍यूनोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. स्‍कंद शुक्‍ल का कहना है कि अगर इलाज के बाद कोरोना वायरस से उबर चुका कोई व्‍यक्ति प्‍लाज्‍मा देकर दूसरे मरीजों को ठीक करने में मदद करना चाहता है तो सबसे पहले उसका हीमोग्‍लोबिन चेक किया जाता है. अब अगर उसका हीमोग्‍लोबिन 12.5 ग्राम प्रति डेसीलीटर नहीं होगा तो उसका प्‍लाज्‍मा नहीं लिया जाएगा. वह उदाहरण देकर समझाते हैं कि मान लीजिए किसी गांव की रतिदेवी संक्रमित हुईं और वह इलाज के बाद स्‍वस्‍थ हो गईं. अब वह चाहती हैं कि उनके प्‍लाज्‍मा से बाकी लोगों की मदद की जाए, लेकिन पौष्टिक आहार नहीं मिल पाने के कारण उनका वजन 45 किग्रा से कम है तो डॉक्‍टर्स उनका प्‍लाज्‍मा लेने से इनकार कर सकते हैं.
स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का कहना है कि प्‍लाज्‍मा डोनेट करने में सामान्‍य तौर पर ब्‍लड डोनेट करने की शर्तें लागू होंगी.




ब्‍लड प्रेशर या हैपेटाइटिस पेशेंट डोनेट नहीं कर सकते ब्‍लड
डॉ. शुक्‍ल के मुताबिक, रक्‍तदान के लिए व्‍यक्ति का ब्‍लड प्रेशर ठीक होना भी जरूरी है. वहीं, 18 से कम और 60 साल से ज्‍यादा उम्र के लोगों का ब्‍लड भी नहीं लिया जाता है. यानी 18-60 साल के व्‍यस्‍क का ही ब्‍लड लिया जा सकता है. इसके अलावा अगर कोई संक्रमण से उबर चुका व्‍यक्ति हैपेटाइटिस का मरीज रहा हो या हो तो उसके प्‍लाज्‍मा का इस्‍तेमाल भी कोरोना वायरस के इलाज में नहीं किया जा सकता है. यही नहीं अगर किसी व्‍यक्ति ने हैपेटाइटिस-सी या एंटी-रैबीज का एक साल के अंदर इलाज कराया हो तो भी रक्‍तदान नहीं कर सकता है. साथ ही अगर किसी व्‍यक्ति ने रक्‍दान करने से 72 घंटे पहले एस्प्रिन खाई हो या दांतों का ट्रीटमेंट कराया हो तो भी रक्‍तदान नहीं कर सकता है. वहीं, सामान्‍य तौर पर उन लोगों का रक्‍त भी नहीं लिया जाता है, जिन्‍होंने छह महीने के भीतर टैटू बनवाया हो या कान छिदवाया हो.

डोनर में वायरस लोड और एंटीबॉडीज का आकलन जरूरी 
संक्रमण से उबर चुके मरीज का प्‍लाज्‍मा इलाज के लिए लेने के दौरान उसमें वायरल लोड का भी ध्‍यान रखा जाता है. एक निजी अस्‍पताल में क्रिटिकल केयर एक्‍सपर्ट डॉ. राजेंद्र का कहना है कि अगर किसी पेशेंट में कोरोना वायरस का हैवी लोड नहीं रहा होगा तो ठीक होने के बाद भी उसका प्‍लाज्‍मा नहींं लिया जाता है क्‍याेंकि उसकी एंटीबॉडीज संक्रमण से मुकाबला नहीं कर पाएंगी. उनका कहना है कि ठीक हो चुके मरीज का प्‍लाज्‍मा लेने में उसके अंदर बनने वाली एंटीबॉडीज का सबसे ज्‍यादा ध्‍यान देना होता है. दरअसल, ठीक हो चुके मरीज की एंटीबॉडीज ही नए मरीज को कोरोना वायरस से मुकाबला करने और जल्‍दी ठीक होने में मदद करती हैं.

डॉ. राजेंद्र ने कहा कि ठीक हो चुके मरीज में भी एंटीबॉडीज बनते रहने का समय अलग होता है. कुछ मरीजों में काफी समय तक एंटीबॉडीज बनती रहती हैं और कुछ लोगों में ठीक होने के बाद जल्‍द ही इनका बनना बंद हो जाता है. अगर किसी व्‍यक्ति में ठीक होने के बाद एंटीबॉडीज का बनना बंद हो चुका है या प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडीज कोरोना से लड़ने में कमजोर हैं तो उसका प्‍लाज्‍मा नए मरीज के लिए किसी काम का नहीं होगा. डॉ. राजेंद्र का कहना है कि अभी लोग किसी भी इलाज के भरोसे न रहें. अभी ज्‍यादातर इलाज ट्रायल स्‍टेज में है. अभी सोशल डिस्‍टेंसिंग के नियमों का पालन करना, सार्वजनिक जगहों पर जाने से बचना और बचाव उपायों का सख्‍ती से पालन करके ही कोरोना से बचा जा सकता है.

संक्रमण से उबर चुके मरीज का प्‍लाज्‍मा इलाज के लिए लेने के दौरान उसमें वायरल लोड का भी ध्‍यान रखा जाता है.


डायबिटीज के पेशेंट के प्‍लाज्‍मा का नहीं हो सकता इस्‍तेमाल
स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी भी गंभीर बीमारी के मरीज रहे व्‍यक्ति को रक्‍तदान की अनुमति नहीं होती है. जैसे पीलिया के मरीज रहे व्‍यक्ति का प्‍लाज्‍मा नहीं लिया जा सकता है. डॉ. स्‍कंद शुक्‍ल कहते हैं कि मान लीजिए किसी व्‍यक्ति को डायबिटीज है और उसे संक्रमण हो जाता है. ट्रीटमेंट के बाद वो ठीक हो जाता है और प्‍लाज्‍मा डोनेट करना चाहता है तो डॉक्‍टर्स उसका ब्‍लड लेने से इनकार कर देंगे. वहीं, महिलाओं को पीरियड्स के दौरान और उसके कुछ दिन बाद तक ब्‍लड डोनेट नहीं करने की सलाह दी जाती है. इसके अलावा छोटे बच्‍चों को फीड कराने वाली महिलाओं का भी ब्‍लड नहीं लिया जा सकता है. साथ ही अगर किसी व्यक्ति ने एक महीने के भीतर किसी भी तरह का टीका लगवाया होगा तो उसका प्‍लाज्‍मा कोरोना पेशेंट के इलाज में इस्‍तेमाल नहीं किया जा सकता है.

रक्‍तदान के पैमाने पर फिट हुआ तो ही लिया जाएगा प्‍लाज्‍मा
नोएडा में रोटरी ब्‍लड बैंक में मेडिकल ऑफिसर डॉ. वीके स्मिथ ने बताया, 'सबसे कोरोना मरीज का इलाज करने वाले डॉक्‍टर यह तय करेंगे कि डोनर में वायरस लोड कितना था. क्‍या वह इस समय ब्‍लड डोनेट करने की स्थिति में है. वहीं, ये भी देखा जाता है कि उसे संक्रमण से उबरे हुए कम से कम 14 दिन हो चुके हों तभी उसका प्‍लाज्‍मा लिया जा सकता है. इसके अलावा उसके शरीर में एंटीबॉडीज की स्थिति का आकलन भी करना जरूरी होता है.

तमाम पैमानों पर फिट होने के बाद जब डॉक्‍टर्स उसके प्‍लाज्‍मा को लेने की मंजूरी दे देते हैं तो उसकी रक्‍दान के पैमानों पर जांच की जाती है. अगर उसका हीमोग्‍लोबीन कम होगा या उसका वजन कम होगा तो उसका प्‍लाज्‍मा लेने से इनकार कर दिया जाएगा. कोरोना वायरस से ठीक हो चुके मरीज का प्‍लाज्‍मा लेने में भी उन सभी नियमों का पालन किया जाता है, जो सामान्‍य समय में रक्‍दान के लिए अनिवार्य होते हैं. अगर किसी व्‍यक्ति ने तीन महीने के अंदर रक्‍तदान किया हो तो उसका प्‍लाज्‍मा नहीं लिया जा सकता है.

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