लालू ने अड़ंगा नहीं लगाया होता तो मुलायम होते PM, ये सात लोग भी थे प्रधानमंत्री पद के दावेदार

देवेगौड़ा बताते हैं, 'मुलायम सिंह यादव का नाम सामने आया लेकिन दो दूसरे यादव नेताओं ने अपने हाथ पीछे खींच लिए.' पढ़िए पूरी कहानी, जो पीएम बनते-बनते रह गए...

Janardan Pandey | News18Hindi
Updated: May 16, 2019, 3:37 PM IST
लालू ने अड़ंगा नहीं लगाया होता तो मुलायम होते PM, ये सात लोग भी थे प्रधानमंत्री पद के दावेदार
लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव की फाइल फोटो
Janardan Pandey | News18Hindi
Updated: May 16, 2019, 3:37 PM IST
लोकसभा चुनाव 2019 के अंतिम पड़ाव तक विपक्ष सर्वसम्मति से अपना नेता नहीं चुन पाया है. कई नेता खुद को देश के अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं. इनमें उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी गठबंधन से मायावती, पश्चिम बंगाल से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, तेलंगाना से सीएम के चंद्रशेखर राव और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम अग्रणी है. वहीं आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह ने एक फॉर्मूला‌ दिया है, 'पांच साल, पांच प्रधानमंत्री'. हालांकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस तरह की बातों को कोरी कल्पना बताते हुए पीएम मोदी को ही देश का अगला पीएम बता रही है.

नरेंद्र मोदी के अगले प्रधानमंत्री बनने या चुनाव बाद महागठबंधन से किसी एक नेता के पीएम बनने की दोनों ही स्थितियों में उस लिस्ट में इजाफा होगा जो भारत के प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन बनते-बनते रह गए.



गुलजारीलाल नंदा, कार्यवाहक प्रधानमंत्री
गुलजारीलाल नंदा भारत के इकलौते कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे हैं. इसका मतलब ये है कि वो भारत के प्रधानमंत्री पद की सारी जिम्मेदारियां निभाते हुए भी स्वतंत्र रूप से भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन पाए. उन्होंने भारत के पहले लोकसभा चुनाव में चुनाव लड़ा था. वो मुंबई सीट से जीतकर नेहरू सरकार में योजना, सिंचाई एवं बिजली मंत्री बने. इसके बाद 1957 आम चुनाव में एक बार फिर से वो चुनाव जीतकर श्रम व रोजगार और नियोजन मंत्री बने. इसके बाद वो योजना आयोग के उपाध्यक्ष बनाए गए.

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Guljarilal nanda

पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद ऐसी स्थिति आई कि देश को एक नया प्रधानमंत्री चुनना था. लेकिन ऐसा करने के बजाए 13 दिन के लिए गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया. ऐसा ही मौका पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु भी आया, लेकिन उन्हें स्वतंत्र तौर पीएम बनाए जाने के बजाए फिर से 13 दिन का कार्यवाहक पीएम बनाया गया.
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के कामराज, अपने बजाए इंदिरा गांधी को दे दी तरजीह
के कामराज कांग्रेस पार्टी की रीढ़ माने जाते थे. पार्टी के अंदर उनकी साख की कोई सानी न थी. वह जो फैसला करते ज्यादातर वक्त में वही सर्वमान्य होता. साल 1964 में जब पंडित नेहरू का निधन हुआ तो वो कांग्रेस के अध्यक्ष थे. पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्‍त्री के निधन के बाद एक बार फिर उनके पास देश को एक नया पीएम देने की बारी आई. तब माना जा रहा था कि कामराज देश के अगले प्रधानमंत्री हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने खुद के बजाए इंदिरा गांधी को देश का पीएम बनाना ठीक समाझा.

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जगजीवन राम, उपप्रधानमंत्री बनकर करना पड़ा संतोष
जगजीवन राम भी उन्हीं शीर्ष नेताओं में से हैं जो आजादी के बाद पहले चुनाव से ही जीतकर संसद पहुंचते रहे. वो पहली सरकार से ही केद्रीय मंत्री दर्जा प्राप्त नेता थे. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय वो कांग्रेस में इंदिरा के बाद दूसरे नंबर के नेता माने जाते थे, लेकिन आपातकाल के दौरान उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया. वो जनता पार्टी में कमोबेश सबसे प्रमुख नेता के तौर पर उभरे. यह तय माना जा रहा था कि जनता पार्टी की सरकार के पीएम जगजीवन राम ही बनेंगे, लेकिन उन्हें उप प्रधानमंत्री पद ही मिला.

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देवीलाल, उप प्रधानमंत्री पद ही आया इनकी किस्मत
देवीलाल को 1990-91 की जनता दल, नेशनल फ्रंट की सरकार में प्रधानमंत्री बनने के कई मौके आए. वो आपातकाल से उभरे नेता थे और हरियाणा में अपने नेतृत्व कौशल को बतौर मुख्यमंत्री साबित कर चुके थे. लेकिन पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह और बाद में चंद्रशेखर उनसे आगे निकल गए. देवीलाल को इन दोनों ही प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में उप प्रधानमंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा.

Devi Lal

ज्योति बसु ने खुद ठुकराया पीएम पद
1996 में जब संसद में अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वास मत पारित करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया तब नेशनल फ्रंट ने सरकार बनाने की पेशकश की. उस वक्त नेशनल फ्रंट के बाद कोई सबसे विश्वसनीय और सर्वमान्य चेहरा था तो वो था 23 सालों तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु का. लेकिन उन्होंने अपनी पार्टी की ओर से अनुमति ना होने की बात कर पीएम बनने से मना कर दिया. हालांकि बाद में उन्होंने इसे अपनी ऐतिहास‌िक भूल कहा था.

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मुलायम सिंह यादव के सामने यादव ने ही डाला अड़ंगा
उत्तर प्रदेश में भूमिपुत्र के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव के पीएम बनने का सपना जून 1997 में पूरा होने वाला था. एचडी देवेगौड़ा की सरकार तब गिर गई जब नए कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने उससे समर्थन वापस ले लिया. संयुक्त मोर्चा पूरी शिद्दत से एक नए प्रधानमंत्री की तलाश में जुटा हुआ था.

देवेगौड़ा बताते हैं, "मुलायम सिंह यादव का नाम सामने आया, लेकिन दो दूसरे यादव नेताओं ने अपने हाथ पीछे खींच लिए. लालू और शरद यादव ने दूसरे यादव के सामने दूसरी पंक्ति में खड़े होने से इनकार कर दिया."

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उन्होंने बताया, "तब चंद्रबाबू नायडू आए और बोले ज्यादातर लोग मुलायम सिंह यादव के पक्ष में हैं लेकिन कुछ विरोध में भी हैं. अगले दिन आईके गुजराल का नाम समझौते के नाम के तौर पर घोषित किया गया."

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इस बारे में बात करते हुए मुलायम सिंह यादव ने न्यूज 18 से कहा, "ये सच है कि प्रधानमंत्री बनना तय भी हो गया था. आखिरी वक्त में किसने विरोध किया, किसने नहीं बनने दिया, इस बात का कोई मतलब नहीं है."

सोनिया गांधी ने अंतरआत्मा की आवाज सुन पीएम बनने से किया इनकार
सोनिया गांधी ने जब कांग्रेस की कमान संभाली तब माना जा रहा था कि अब कांग्रेस अंतिम पड़ाव पर है. लेकिन यूपीए का गठन कर सोनिया गांधी ने 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्‍ण आडवाणी जैसे फायरब्रांड नेताओं वाली बीजेपी व उनके गठबंधन एनडीए को मात दे दी. तब सिवाय सुषमा स्वराज और उमा भारती के सोनिया गांधी के विपक्ष में कोई आवाज ना थी.

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उनका विरोध भी उनके इटली के होने को लेकर था, लेकिन तब तक सोनिया ने भारतीय नागरिकता भी हासिल कर ली थी. सोनिया गांधी के पीएम बनने का रास्ता साफ हो गया था. लेकिन उन्होंने अपने अंतरआत्मा से आई आवाज को कारण बताकर यह पद लेने से मना किया और मनमोहन सिंह को गद्दी सौंपी.



एलके आडवाणी, उप प्रधानमंत्री से आगे नहीं बढ़ी गाड़ी
पीएम इन वेटिंग शब्दावली का इस्तेमाल लाल कृष्‍ण आडवाणी के लिए ही ज्यादा मशहूर रहा. भारतीय जनता पार्टी के उत्‍थान में लाल कृष्‍ण आडवाणी की सबसे अहम भूमिका है, लेकिन पीएम पद के लिए 1996 और 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर ही सहमति बनी. लेकिन जब बहुमत के साथ एनडीए ने 1999 में सरकार बनाई तो एलके आडवाणी अपनी पीएम बनने की इच्छा को जाहिर कर चुके थे.

LK Advani

इसीलिए साल 2002 में उन्हें उपप्रधानमंत्री चुन लिया गया, लेक‌िन 2004 में बीजेपी चुनाव हार गई. इसके बाद 2009 का आम चुनाव बीजेपी ने अटल के बजाए आडवणी के चेहरे पर लड़ा. यह तय था कि 2009 में बीजेपी चुनाव जीतती तो आडवाणी को ही पीएम की गद्दी मिलती, लेकिन बीजेपी चुनाव हार गई. इसके बाद 2014 आम चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी का उदय हो गया है.

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