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अब बना राम मंदिर ट्रस्ट, ऐसे चला था सुप्रीम कोर्ट में मामला और मिली जीत

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: February 5, 2020, 8:55 PM IST
अब बना राम मंदिर ट्रस्ट, ऐसे चला था सुप्रीम कोर्ट में मामला और मिली जीत
राम मंदिर मामले पर 9 साल चली सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अयोध्या राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद (Ayodhya ram mandir babri masjid controversy) पर फैसला सुनाया था. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि को हिंदू पक्ष को देने और वहां भव्य राम मंदिर निर्माण करने का फैसला दिया था.

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  • Last Updated: February 5, 2020, 8:55 PM IST
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अयोध्या (Ayodhya) में राम मंदिर (Ram Mandir) निर्माण को लेकर मोदी सरकार (Modi Government) ने बड़ा फैसला लिया है. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के आदेश के बाद संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) ने कहा है कि केंद्रीय कैबिनेट ने अयोध्या में राममंदिर निर्माण को मंजूरी दे दी है. पीएम मोदी ने मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का ऐलान कर दिया है. इस ट्रस्ट का नाम श्री राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र रखा गया है. केंद्र सरकार के कब्जे वाली राम मंदिर परिसर के करीब 67 एकड़ जमीन भी ट्रस्ट को दी जाएगी.

9 नवंबर 2019 को आया बहुप्रतीक्षित फैसला
पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला सुनाया था. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि को हिंदू पक्ष को देने और वहां भव्य राम मंदिर निर्माण करने का फैसला दिया था. जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या के बाहरी क्षेत्र में 5 एकड़ जमीन देने की बात कही थी. मोदी सरकार ने अब यूपी की योगी सरकार से आग्रह किया है कि वो मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ जमीन देने की व्यवस्था करे.

राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मसला वर्षों से चला आ रहा था. हिंदू और मुस्लिम पक्ष के बीच मुकदमेबाजी 1950 में ही शुरू हो गई थी. उसके बाद ये मामला उलझता ही चला गया. इस मसले के राजनीतिक रंग लेने के बाद इसकी पेंचगिदियां और बढ़ गईं.

30 सितंबर 2010 का इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला इस मामले को लेकर अहम पड़ाव रहा. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित परिसर के मालिकाना हक पर फैसला सुनाते हुए उसे तीन हिस्सों में बांट दिया था. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट में भी ये मामला 9 वर्षों तक चला, तब जाकर इसपर फैसला आ सका.

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पीएम मोदी ने राम मंदिर ट्रस्ट बनाने का ऐलान किया है


सुप्रीम कोर्ट में इस तरह चला मामलादिसंबर 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अखिल भारत हिंदू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली. हिंदू महासभा ने विवादित परिसर के एक तिहाई भाग मुस्लिमों को देने के खिलाफ अपील की थी. मई 2011 में हिंदू महासभा की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी.

इसके बाद 5 दिसंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने के 7 साल बाद इस मामले की सुनवाई शुरू हुई. सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में तीन जजों की बेंच ने इस मामले की सुनवाई शुरू की. इसके बाद मामले की सुनवाई फरवरी 2018 तक के लिए स्थगित कर दी गई. इस मामले को बड़ी बेंच को भेजने की सलाह दी गई.

8 फरवरी 2018 को मामले की सुनवाई फिर शुरू हुई. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कुछ और दस्तावेज मांगे. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की रोज सुनवाई की मांग की गई. हालांकि कोर्ट ने इसे ठुकरा दिया. मामले को मार्च 2018 के लिए स्थगित कर दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट में भी खिंचता रहा मामला
सुप्रीम कोर्ट में भी ये मामला लंबा खिंचता रहा. 14 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में हस्तक्षेप करने वाली 30 अर्जियां दाखिल की गई. सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी अर्जियों को खारिज कर दिया. कोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार से कहा कि किसी भी थर्ड पार्टी को अर्जी देने से रोका जाए. इस मामले के सिर्फ ऑरिजनल पार्टी को ही सुना जाएगा.

इसके बाद 23 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले के मुस्लिम पक्षकार ने दलील दी कि अयोध्या विवाद में इस्माइल फारूखी के फैसले पर फिर से विचार किया जाए. 1994 के इस्माइल फारूखी मामले के फैसले में मस्जिद को इस्लाम में नमाज पढ़ने के लिए जरूरी जगह मानने से इनकार कर दिया था.

27 अप्रैल 2018 को हिंदू पक्ष की तरफ से बहस करते हुए सीनियर वकील हरीश साल्वे ने कहा कि ये पूरा मामला जमीन पर मालिकाना हक को लेकर है और इसे इसी तरह से लिया जाना चाहिए. इस मामले की राजनीतिक और धार्मिक संवेदनशीलता को देखते हुए इसे बड़ी बेंच को भेजने की सलाह दी गई.

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सरकार ने अपने कब्जे वाली 67 एकड़ जमीन भी राम मंदिर ट्रस्ट को देने का ऐलान किया है


सुप्रीम कोर्ट में 'हिंदू तालिबान' शब्द के इस्तेमाल पर मचा बवाल
15 मई 2018 को सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की तरफ से बहस करते हुए सीनियर वकील राजीव धवन ने कहा कि किसी भी तरह से ये संदेश नहीं जाना चाहिए कि हिंदू धर्म की पूजा पद्धति मुस्लिम धर्म की पूजा पद्धति से ज्यादा महत्वपूर्ण या ज्यादा अहमियत रखती है. संविधान का आर्टिकल 25 और आर्टिकल 26 सभी धर्म के लोगों को समान धार्मिक अधिकार देता है.

इसके बाद 13 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट में शिया वक्फ बोर्ड की तरफ से कहा गया कि वो अपनी मर्जी से अपने हिस्से की जमीन हिंदू पक्ष को देने को तैयार है. वक्फ बोर्ड का कहना था कि शांति और सौहार्द बनाने के लिए उसे अपनी हिस्से की जमीन देने में कोई हर्ज नहीं है.

बाबरी मस्जिद विध्वंस का जिक्र करते हुए राजीव धवन ने कारसेवकों के लिए हिंदू तालिबान शब्द का इस्तेमाल किया. उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस की तुलना अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा बामियान प्रतिमाओं के तोड़े जाने से की.

20 जुलाई को हुई सुनवाई में ज्यादा गहमागहमी रही. कोर्ट ने हिंदू तालिबान शब्द का इस्तेमाल किए जाने पर आपत्ति जाहिर की. इसके बाद तीन जजों की बेंच ने इस बात पर मशविरा किया कि क्या इस्माइल फारूखी मामले पर फिर से विचार करने की जरूरत है?

27 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारूखी केस के फैसले पर दोबारा विचार करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने इसकी जरूरत नहीं समझी.

29 अक्टूबर 2018 को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के रिटायर होने के बाद इस मामले की सुनवाई नए बने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में तीन जजों की बेंच ने शुरू की. जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ बाकी के दो जज थे. मामले पर बनी नई बेंच ने केस की सुनवाई जनवरी 2019 तक के लिए स्थगित कर दी.

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अयोध्या में राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद वर्षों से चला आ रहा था


साल 2019 फैसले के लिहाज से अहम साबित हुआ
4 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने इसकी सुनवाई शुरू की. बेंच ने कहा कि मामले की सुनवाई उचित बेंच करेगी. वही कोर्ट अब नए सिरे से सुनवाई की तारीख तय करेगी.
9 जनवरी 2019 को मामले की सुनवाई के लिए पांच जजों के बेंच का गठन हुआ. इस बेंच के अध्यक्ष चीफ जस्टिस रंजन गोगोई बनाए गए. इसके साथ ही बेंच में एसए बोबडे, एनवी रामना, यूयू ललित और डीवाई चंद्रचूड़ को शामिल किया गया.

10 जनवरी 2019 को जस्टिस यूयू ललित ने इस मामले से खुद को अलग कर लिया. उनका तर्क था कि चूंकि उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आरोपी रहे कल्याण सिंह के लिए बहस की थी, इसलिए उनका सुनवाई में शामिल होना ठीक नहीं हैं

25 जनवरी 2019 को जस्टिस यूयू ललित के बेंच से अलग होने के बाद एक नए बेंच का गठन हुआ. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में इस बेंच में जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर को शामिल किया गया.

29 जनवरी 2019 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन देकर विवादित परिसर के पास वाली जमीन को उसके ऑरिजनल मालिक को देने की इजाजत मांगी.
26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से विवाद के हल के लिए मध्यस्थता की संभावना टटोलने को कहा.

जब मध्यस्थता के लिए बनी कमिटी
8 मार्च 2019 को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने अयोध्या मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा. इसके लिए एक मध्यस्थता पैनल का गठन किया गया. पैनल में सुप्रीम कोर्ट के जज एफएमआई खलिफुल्ला, आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर और सीनियर वकील श्रीराम पंचू को शामिल किया गया. कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता को गोपनीय रखा जाए और किसी भी तरह से इसकी रिपोर्ट की जानकारी मीडिया तक नहीं पहुंचे.

10 मई 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की प्रक्रिया के लिए समयसीमा 15 अगस्त तक के लिए बढ़ाई. मध्यस्थता पैनल ने कोर्ट में एक रिपोर्ट सौंपी थी. इसमें समयसीमा बढ़ाने की गुजारिश की गई थी.

11 जुलाई 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर इस मामले का निपटारा मध्यस्थता के जरिए नहीं होता है तो कोर्ट इस मामले की सुनवाई रोज करेगा और उसके आधार पर फैसला सुनाएगा. मध्यस्थता पैनल से उसकी रिपोर्ट सौंपने को कहा गया.

2 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता पैनल इस मामले को निपटाने में नाकाम रहा है. इस मामले में मध्यस्थता के जरिए सेटलमेंट नहीं किया जा सका. कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई 6 अगस्त से दोबारा शुरू होगी. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की रोज सुनवाई होगी.

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अयोध्या में अब भव्य राम मंदिर का निर्माण होगा


जब सुप्रीम कोर्ट में मामले की रोज सुनवाई शुरू हुई
6 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद की रोजाना सुनवाई शुरू हुई.
9 अगस्त 2019 को सीनियर वकील राजीव धवन ने इस मामले की सुनवाई के दिनों पर आपत्ति जाहिर की. उनका कहना था कि वकील को मामले की तैयारी करने में दिक्कत हो रही है. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई हर हफ्ते पांच दिन होगी.

30 अगस्त 2019 को राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की. उन्होंने कहा कि मुस्लिमों का पक्ष रखने की वजह से उन्हें धमकियां मिल रही हैं. उन्होंने चेन्नई के एक प्रोफेसर के ऊपर धमकी देने का आरोप लगाया.

12 सितंबर 2019 को सीनियर वकील राजीव धवन ने कहा कि उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं. उन्होंने कोर्ट को बताया कि उनके क्लर्क को भी धमकाया गया है. सीजेआई रंजन गोगोई ने धवन को सुरक्षा दिलवाने को कहा. हालांकि धवन ने सुरक्षा लेने से इनकार कर दिया.

18 सितंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले के पक्षकार अगर मध्यस्थता से मामले का हल निकालना चाहें तो इस पर कोर्ट को आपत्ति नहीं होगी. कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई और फैसले की अवधि तय करने की अपील की. सभी पार्टियों ने मिलकर बहस और उसके नतीजों के लिए समयअवधि तय की और 18 अक्टूबर तक सुनवाई पूरी कर लेने की डेडलाइन रखी.

जब आई फैसले की घड़ी
16 अक्टूबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 40 दिनों के बाद सुनवाई पूरी कर ली गई है. इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया गया.

9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में अपना फैसला सुनाया. कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राममंदिर निर्माण का रास्ता साफ कर दिया. विवादित जमीन रामलला विराजमान को दी गई. कोर्ट ने कहा कि सरकार एक ट्रस्ट बनाकर मंदिर का निर्माण करवाए. विवादित परिसर पर सरकार का कब्जा होगा. वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद के लिए अयोध्या में किसी दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन दी जाए. कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े के दावे को खारिज कर दिया.

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First published: February 5, 2020, 8:55 PM IST
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