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PM Narendra Modi Birthday: संन्यास से पीएम बनने तक के जीवन की कुछ खास बातें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) शुक्रवार को 71 साल के हो गए हैं. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) शुक्रवार को 71 साल के हो गए हैं. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

PM Narendra Modi Birthday: पीएम नरेंद्र मोदी के शुरुआती जीवन (Youth Life) को देख कर कोई कह ही नहीं सकता था कि वे आगे चल कर भारत के प्रधानमंत्री (Prime Minister of India) बनेंगे.

  • News18Hindi
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    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) का आज 71वां जन्मदिन है. ऐसे में प्रधानमंत्री के तौर पर उनके दूसरे कार्यकाल के बीच के हिस्से में, उनके कार्यों के साथ उनकी योजनाओं का भी अवलोकन और विश्लेषण होगा. उनके बारे में कई बातें ऐसी हैं, जो देश के अन्य प्रधानमंत्रियों से उन्हें अलग करती हैं. वहीं उनकी बड़ी लोकप्रियता का रहस्य तो उनके विरोधी तक जानने की कोशिश करते रहते हैं. उनके शुरुआती  जीवन को देख कर कहना मुश्किल होता है कि वे कभी देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं. उनके युवा जीवन से प्रधानमंत्री बनने तक के सफर में कई जानकारियां बहुत रोचक और आश्चर्य वाली भी लगती है.

    सैनिक स्कूल की अधूरी ख्वाहिश
    पीएम मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 में गुजरात के वडनगर में हुआ था. वे बचपन में गुजरात के जामनगर के सैनिक स्कूल में जाना चाहते थे, लेकिन आर्थिक अभाव के कारण यह संभव ना हो सका.  स्कूल के दिनों में वह गुजरात के महेसाणा रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने में अपने पिता की मदद किया करते थे. जहां 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान उन्होंने स्टेशन से गुजरने वाले सैनिकों को चाय पिलाई थी.

    संन्यास के लिए यात्रा
    18 साल की उम्र में कॉलेज जाने की जगह उन्होंने अपनी पत्नी सहित घर बार छोड़ कर संन्यास की राह ले ली और अगले दो साल उत्तर और उत्तर पूर्व भारत की यात्रा करते रहे. इस दौरान वे स्वामी विवेकानंद के वेलूर मठ, असम में सिलिगुड़ी और गुवाहाटी, अल्मोड़ा के अद्वैत आश्रम और राजकोट के रामकृष्ण मिशन में भी रहे, वे किसी भी जगह लंबे समय तक नहीं टिक सके क्योंकि उन्होंने जरूरी कॉलेज शिक्षा नहीं ली थी.

    गृह राज्य में वापसी
    पीएम मोदी खुद मानते हैं कि स्वामी विवेकानंद के जीवन का उनपर बहुत गहरा प्रभाव रहा. इसके बाद वे कुछ दिनों तक वडनगर में आए और फिर अहमदाबाद अपने चाचा के यहां चले गए, जो गुजरात राज्य सड़क परिवहन निगम की कैंटीन में काम करते थे. यहीं से उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत  हुई.

    पहली राजनैतिक गतिविधि
    1971 में वे दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतत्व में जनसंघ के सत्याग्रह में शामिल हुए थे जो उनकी पहली राजनैतिक गतिविधि थी. उस समय की इंदिरा गांधी सरकार ने बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी को खुला समर्थन नहीं दिया जिसकी वजह से मोदी को कुछ दिनों के लिए राजनैतिक कैदी के रूप में तिहाड़ जेल जाना पड़ा.

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    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) को कई साहसिक फैसले लेने के लिए जाना जाएगा. (फाइल फोटो)

    आपातकाल में मोदी
    1971 के युद्ध के बाद उन्होंने अपने चाचा के साथ काम करना बंद कर दिया और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्ण प्रचारक बन गए. आपातकाल में मोदी को आरएसएस की गुजरात लोक संघर्ष समिति का सचिव बनाया गया है. इसके बाद जल्दी ही आरएसएस पर प्रतिबंध लग गया और मोदी गिरफ्तारी से बचते हुए काम करने के लिए जगह बदलते रहे.

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    क्या काम किया इस दौरान
    आपातकाल के खिलाफ प्रचार सामग्री छपवा कर दिल्ली भिजवाना, राजनैतिक शरणार्थियों के लिए कोष जमा करना, संगठन के लोगों का नेटवर्क बनाकर उन्हें सुरक्षित रखना, उनके एक कार्यों में शामिल थे. इस दौरान उन्होंने कभी संन्यासी तो कभी सिख का भेष भी धारण किया. उनकी सिख वेषभूषा वाली तस्वीर आज भी इंटरनेट पर मिलती है.

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    प्रधानमंत्री बनने से पहले ही नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के गुजरात विकास मॉडल की सफलता दुनिया भर में चर्चित हो गई थी.

    आरएसएस से बीजेपी
    आपातकाल के बाद मोदी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग से राजनीतिक विज्ञान में बीए की डिग्री हासिल की और बाद में गुजरात यूनिवर्सिटी से डिस्टेंस लर्निंग छात्र के रूप में एमए की डिग्री प्राप्त की. 1979 में मोदी दिल्ली आ गए, लेकिन जल्दी ही वे वापस लौट गए और 1985 में आरएसएस से बीजेपी में भेज दिए गए. 1987 में मोदी के निर्देशन में भाजपा ने अहमदाबाद नगर निगम का चुनाव जीता, जिसके बाद वे गुजरात बीजेपी के संगठन सचिव चुने गए.

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    रथयात्रा से गुजरात के सीएम तक
    इसके बाद 1990 में उन्होंने लालकृष्ण अडवाणी की रथ यात्रा की जिम्मेदारी संभाली, कुछ समय के लिए वे राजनीति से दूर रहे, लेकिन 1994 में वापसी की और उन्हें 1995 में गुजरात में  भाजपा की विधानसभा चुनावों में जीत का श्रेय भी मिला. इसके बाद वे बीजीपी के राष्ट्रीय सचिव बने.

    गुजरात में 1998 के चुनाव में भाजपा की जीत का श्रेय भी उनके प्रयासों को दिया गया. अक्टूबर 2001 में वे केशुभाई पटेल के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री बने और फिर साल 2014 तक लगातार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. उनके कार्यकाल में गुजरात का विकास मॉडल खूब चर्चा में रहा. साल 2014 में देश के प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने गुजरात सीएम का पद छोड़ दिया.

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