साकारात्मक नजरिए से बच जाती है कमजोर होने से याद्दाश्त-शोध

उम्र (Aging) के साथ याद्दाश्त (Memory) कमजोर होने के प्रभाव को साकारात्मक नजरिए से कम किया जा सकता है.. (तस्वीर: Pixabay)
उम्र (Aging) के साथ याद्दाश्त (Memory) कमजोर होने के प्रभाव को साकारात्मक नजरिए से कम किया जा सकता है.. (तस्वीर: Pixabay)

दिमाग (Brain)से संबंधित शोध से पता चला है कि सकारात्मक नजरिया (Positive outlook) रखने से बढ़ती उम्र से कम होती याद्दाश्त (memory) को बचाया जा सकता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 31, 2020, 2:04 PM IST
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इंसान (Humans) की याद्दाश्त (Memory) प्रकृति की बहुत ही अनोखी देन है. लेकिन इसके साथ जुड़ी समस्याएं विज्ञान (Science) के लिए आज भी बहुत जटिल चुनौती हैं. इंसान अपनी सारी यादें (Memory) उम्र भर (Lifelong) सहेज कर नहीं रखा पाता. ओल्ड एज (Old Age) में इस याद्दाश्त को कायम नहीं रख पाना आम बात है. याद्दाश्त कायम कर पाने के लिए कई शोध हुए हैं. ताजा शोध के नतीजों में कहा गया है कि सकारात्मक नजरिया (Positive attitudes) यादाश्त कायम रखने में मददगार साबित हो सकता है.

याद्दाश्त पर नजरिये का असर
पहले के अध्ययनों से पता चला है कि बहुत से शारीरिक और भावनात्मक कारक जीवनभर तक हमारी याद्दाश्त को कायम रखने की क्षमता पर नकरात्मक प्रभाव डालते हैं.साइकोलॉजिकल साइंस जर्नल में प्रकाशित इस नए अध्ययन से पता चला है कि जो लोग खुद को उत्साहित और जोश में महसूस करते हैं उन लोगों को अधिक उम्र में याद्दाश्त कम होने का अनुभव होने की संभावना कम हो जाती है.

किस पर किया अध्ययन
ये नतीजों इन शोधों में से एक माना जा रहा है जो हेल्दी एजिंग पर सकारात्मक सोच के प्रभाव में की जा रही हैं. शोधकर्ताओं की टीम ने 991 मध्य आयु और अधिक उम्र के अमेरिकी व्यस्कों के आंकड़ों का विश्लेषण किया जिन्होंने तीन समयावधियों के राष्ट्रीय अध्ययन में भाग लिया था. ये अध्ययन 1995 और 1996, 2004 से लेकर 2006 तक, और 2012 एवं 2014 तक किए गए थे.



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शोध से पता चला है कि उम्र बढ़ने (Aging) के साथ याद्दाश्त (Memory) तेजी से कमजोर भी होती है. सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


कैसे किया अध्ययन
हर आंकलन में प्रतिभागियों ने अपने द्वारा अनुभव किए गए 30 दिनों तक के विभिन्न प्रकार के साकारत्मक भावों की जानकारी देनी थी. अंतिम दो आंकलनों में प्रतिभागियों ने अपनी याद्दाश्त के प्रदर्शन का टेस्ट भी दिया था. ये टेस्ट उनकी प्रस्तुति के तुरंत बाद और फिर 15 मिनट बाद हुए थे.

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यह संबंध जानने की कोशिश
लोग खुद को उत्साहित और जोश में महसूस करने की स्थिति को मनोविज्ञान में ‘सकारात्मक प्रभाव’ कहते हैं. शोधकर्ताओं ने ‘सकारात्मक प्रभाव’ और याद्दाशत कमजोर होने, बढ़ती उम्र लिंग, शिक्षा, निराशा, और नकारात्क प्रभाव के बीच के संबंध की पड़ताल की. नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर और इस शोध कि वरिष्ठ लेखिका क्लॉडिया हासे ने बताया, “हमारी पड़ताल से पता चला है कि उम्र बढ़ने के साथ याद्दाश्त कमजोर हो जाती है.”

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खुद को उत्साहित रखने का दिमाग (Brain)के सेहत (Health) पर अच्छा असर डालता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


‘सकारात्मक प्रभाव’ का असर
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्नातक और अध्ययन की प्रमुख लेखिका एमिली हिटनर ने बताया कि ऊंचे स्तर के ‘सकारात्मक प्रभाव’ वाले व्यक्तियों में एक दशक के समय में बहुत तेजी से याद्दाश्त कम नहीं हुई. उन्होंने पाया कि उन लोगों में याद्दाश्त तेजी से कम हुई जिनमें ‘सकारात्मक प्रभाव’ का स्तर कम या नहीं था.

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भविष्य में होने वाले शोध ‘सकारात्मक प्रभाव’ और याद्दाश्त में संबंध स्थापित करने के लिए शारीरिक स्वास्थ्य और सामाजिक संबंध जैसे कारक शामिल कर सकते हैं. याद्दाश्त का संबंध आमतौर पर शारिरिक स्वास्थ्य से भी जोड़कर देखा जाता है. कहा भी जाता है कि स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ दिमाग रह सकता है.
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