लैब में बने शुरुआती भ्रूण ने दिया विज्ञान और नैतिकता के बीच नए विवाद को जन्म

मानव भ्रूण(Human Embryo) पर इस तरह का शोध पहली बार किया गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

मानव भ्रूण(Human Embryo) पर इस तरह का शोध पहली बार किया गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

दो अलग शोधों (Research) में वैज्ञानिकों ने शुरुआती मानव भ्रूण (Human Embryo) के समकक्ष संरचना विकसित करने में सफलता पाई है. लेकिन इसने कई नैतिक सवाल (Ethical Questions) भी खड़े कर दिए हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 19, 2021, 5:44 PM IST
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चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) में पहली बार ऐसा हुआ है कि वैज्ञानिकों ने मानव कोशिका (Human Cells) का उपयोग कर ऐसे संचरना बनाई जो मानव भ्रूण (Human Embryo) के शुरुआती चरण की तरह है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे भ्रूण संबंधी शोधों को बल मिलेगा जबकि उसके लिए वास्तविक भ्रूणों को छेड़ने की जरूरत ही नहीं होगी. इस तरह के दो स्वतंत्र अध्ययनों के नतीजे विज्ञान और नैतिकता के बीच एक बहस को जन्म दे रहे हैं.

वैज्ञानिकों को जोर- शोध के लिए है उनका काम

हाल ही में नेचर जर्नल में प्रकाशित दो शोधपत्रों में विस्तार से बताया गया है कि कैसे वैज्ञानिकों की दो टीम ने स्वतंत्र रूप से ऐसी संरचना विकसित करने में सफलता पाई है.  वैज्ञानिकों ने जोर देकर कहा है कि उनका कार्य केवल शोध के लिए है, प्रजनन के लिए नहीं. इस दावे के बाद भी इस शोध ने नए नैतिक प्रश्न पैदा कर दि हैं.

अध्ययन के नए आयाम खुलने की उम्मीद?
यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास में साउथ वेस्टर्न मेडिकल सेंटर के स्टेम सेल जीवविज्ञानी जुन वू का कहना है, “शुरुआती मानव विकास का अध्ययन करना बहुत ही ज्यादा मुश्किल है. यह एक तरह का ब्लैक बॉक्स कहा जा सकता है. हम मानते हैं कि हमारा मॉडल इस क्षेत्र को खोल रहा है. आप अपने मत का परीक्षण बिना मानवीय भ्रूणों पर प्रयोग किए कर सकते हैं“

स्टेम और त्वचा की कोशिकाओं से हुआ प्रयोग

वू की टीम ने भ्रूण स्टेम कोशिकाओं का उपयोग किया और दूसरी टीम ने त्वचा की कोशिकाओं को फिर से प्रोग्राम किया जिसे वे ऐसी कोशिकाओं की गेंद बन सके जो मानव विकास के बहुत ही शुरुआती चरणों से मेल खाती हैं. इन गेंदों को ब्लास्टोसिस्ट कहा जाता है.ब्लास्टोसिस्ट अंडे के निषेचण के कुछ दिन बाद, लेकिन कोशिका के गर्भ में जुड़कर भ्रूण बनने से पहले बनीं.



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ये संरचनाएं निषेचन (Fertilization) के बाद के तीन से दस दिन की अवस्था से मिलती हैं. (फाइल फोटो)

दो अलग –अलग नाम

शोधकर्ताओं के मॉडल के निशेचण के जरिए ब्लास्टोसिस्ट से अंतर बताने के लिए, शोधकर्ताओं ने अपनी संरचना को  आई ब्लैस्टॉइड्स (iBlastoids) और ह्यूमन ब्लास्टॉइड्स (human blastoids) नाम दिया है. दूसरी टीम की अगुआई करने वाले और ऑस्ट्रेलिया की मोनैश यूनिवर्सिटी के एपीजेनेटिसिस्ट जोस पोलो का कहना है कि पहली टीम को उसे ब्लास्टोसिस्ट के समतुल्य नहीं मानना चाहिए.

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केवल शोध के लिए?

दोनों ही समूह ने इस बात पर जोर दिया है कि उनकी बनाई संरचना प्राकृतिक भ्रूण के समान नहीं है. और यह स्पष्ट  नहीं है क्या ये संरचना वास्तविक भ्रूण में विकसित हो सकते हैं या नहीं. वू की टीम ने चार दिन के कल्चर के बाद संरचना की वृद्धि रोक दी थी. वू का कहना है कि ब्लास्टॉइड्स भ्रूण की बाद के चरण की संरचना विकसित करने में कम कारगर हैं.

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इन शोधों ने एक बार फिर भ्रूण अनुसंधान (Embryo Research) पर नैतिक बहस को जन्म दे दिया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

निषेचन के कितने करीब

इससे पहले वैज्ञानिक लैब में चूहों की कोशिकाओं में इस तरह की संरचना पैदा कर चुके हैं. लेकिन मानवीय कोशिकाओं पर यह पहला प्रयोग है. दोनों नए मॉडल निषेचन के तीन से दस दिन तक के समतुलन्य संरचना बनाने में सफल रहे हैं.  इससे पहले पिछले साल शोधकर्ताओं ने निषेचन के 18 से 21 दिन तक के भ्रूण के समकक्ष संरचना को बनाया था.

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फिलहाल मानव भ्रूण संबंधी शोद अमेरिका और उसके कई राज्यों में प्रतिबंधित है. वहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसे हालात में बिना कानून का उलंघन किए ही शोध हो सकता है. वहीं इसमें किसी तरह का गर्भधारण नहीं हैं. कुछ वैज्ञानिकों के लिए ब्लास्टोसिस्ट और निषेचन में अंतर स्पष्ट नहीं है. एक सवाल यह भी है कि अगर ये संरचनाएं वास्विक भ्रूण से मिलती हैं तो उन्हें भ्रूण की तरह मानने के क्या मानदंड होंगे.

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