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Premchand B’day Special: पहले नवाब राय के नाम से लिखा करते थे धनपतराय

मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) के पहले उर्दू में लिखा करते थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) के पहले उर्दू में लिखा करते थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

मंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) का नाम धनपतराय था पहले उन्होंने नवाब राय (Nawab Rai) नाम से लेखन किया और बाद में प्रेमचंद नाम से हिंदी साहित्य (Hindi Literature) लेखन करने लगे.

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    भारत में हिंदी साहित्य (Hindi Literature) में मंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. कहा जाता है कि हिंदी भाषा (Hindi Language) को साहित्य में प्रेमचंद के लेखन ने ऐसी ऊंचाइयां दी है जो शायद ही कोई और लेखक दे सका. आज 31 जुलाई को देश प्रेमचंद की जयंती मना रहा है. प्रेमचंद का हिंदी पर तो अधिकार था ही, वे ऊर्दू में भी लेखन किया करते थे. सच तो यह है कि हिंदी पर ज्यादा लिखने से पहले उन्होंने उर्दू में ही ज्यादा लिखा. उन्होंने समाज के कई विषयों को छूते हुए अपना लेखन दुनिया को दिया, लेकिन उनका लेखन जिस तरह से खुद को आम भारतीय जनमानस से जुड़ा उसकी मिसाल साहित्य में देखने को बहुत ही कम मिलती है.

    मुंशी प्रेमचंद का जन्स 31 जुलाई 1880 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही गांव में एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनका मूल नाम धनपतराय श्रीवास्तव था. उन्हें हिंदी और उर्दू के लोकप्रिय कहानीकार, उपन्यासकार और विचारक के रूप में जाना जाता है. उनके मशहूर उपन्यास गोदान, कफन, ठाकुर का कुआं, प्रेमाश्रम, सवा सेर गेंहू और बहुत सी कहानियां में ग्रामीण जीवन की बानगी है जिसे उनके बचपन में गांव में रहने का प्रमाण दर्शाता है.

    गरीबी में की पढ़ाई
    प्रेमचंद को बचपन से ही पढ़ने का शौक तो था, लेकिन वे लेखक नहीं बनना चाहते थे. फिर भी 13 साल की उम्र में उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था. गरीबी में ही  प्रेमचंद ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पूरी की. इस बीच उन्होंने अपने पिता को भी खो दिया. इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य, पर्सियन और इतिहास जैसे विषयों से स्नातक की पढ़ाई पूरी की.

    लेखन में नाम बदलना
    शुरुआती दिनों में जब उन्होंने स्कूल इंस्पेक्टर की सरकारी सेवा में रहते हुए कहानी लिखना शुरू किया, उस समय वे ‘नवाब राय’ नाम से उर्दू में लेखन किया करते थे. जब अंग्रेजी हुकूमत ने 1908 में प्रकाशित हुआ उनका पहला कहानी-संग्रह ‘सोजे वतन’ जब्त किया, तब उन्हें नवाब राय नाम छोड़ना पड़ा. बाद में वे प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे.

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    मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) का पहला कहानी-संग्रह ‘सोजे वतन’ के रूप में 1908 में प्रकाशित हुआ था. (फाइल फोटो)

    साहित्य का दिया विशाल भंडार
    प्रेमचंद ने कहानी, उपन्यास, समीक्षा, लेखन, सम्पादन, संस्मरण, नाटक, अनुवादन, जैसी कई विधाओं में साहित्य सृजन किया लेकिन वे मशहूर कहानीकार और उपन्यासकार  केतौर पर ही हुए.  उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियां, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की.

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    पहला उपन्यास सेवासदन
    1918 में प्रेमचंद का उनका पहला हिंदी उपन्यास सेवासदन प्रकाशित हुआ. कहा जाता है कि इसी की अत्यधिक लोकप्रियता ने प्रेमचंद को उर्दू से हिंदी का कहानीकार बना दिया था उनकी लगभग सभी रचनाएँ हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित होती रहीं. 1921 में गांधी जी की असहयोग आंदोलन की वजह से उन्होंने अपने सराकरी नौकरी छोड़ दी और पूर्णतः साहित्य सेवा में लग गए.

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    मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) अपने आखिरी समय में मंगलसूत्र नाम का उपन्यास लिख रहे थे जिसे वे पूरा नहीं कर सके थे. (फाइल फोटो)

    श्रेष्ठ सृजन कार्य
    सरकारी नौकरी छोड़न के बाद उन्होंने पत्रिका संपादन के क्षेत्र में कदम रखा, लेकिन कहानी और उपन्यास लिखते रहे. 1922 में प्रेमाश्रण और 1925 में रंगभूमि नाम से उपन्यास प्रकाशित हउए.  उनका निर्मला उपन्यास वास्तव में चांद नाम की मासिक पत्रिका के लिए लिखा गया धारावाहिक उपन्यास है.  इसके बाद कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि और गोदान जैसी रचनाएं आईं गोदान ने उन्हें सबसे ज्यादा प्रसिद्धि दी जो आज भी साहित्य प्रेमियों के पसींदीदा उपन्यासों में से एक है.

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    इसके साथ ही प्रेमचंद ने मासिक पत्रिका हंस का प्रकाशन, हिंदी साप्ताहिक जागरण के प्रकाशन शुरू किया उन्होंने दयाराम भवनी की कंपनी में कहानीकार की नौकरी भी की और बम्बई जाकर भी फिल्मों के लिए लेखन किया,फिल्म मजदूर की कहानी भी उनकी ही लिखी हुई है. अपने अंतिम दिनों में वे मंगलसूत्र नाम का उपन्यास लिख रहे थे, लेकिन उसे पूरा करने से पहले ही 8 अक्टूबर 1936 को दुनिया छोड़ गए.

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