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प्रिंटिंग का वो 'प्रिंस', जिसने लखनऊ में लगाया एशिया में सबसे पहले आधुनिक छापाखाना

भारतीय प्रिंटिग व्यवसाय के पायनियर मुंशी नवल किशोर (न्यूज18ग्राफिक)

भारतीय प्रिंटिग व्यवसाय के पायनियर मुंशी नवल किशोर (न्यूज18ग्राफिक)

03 जनवरी 1836 में अलीगढ़ में ऐसा शख्स पैदा हुआ जिसने सही मायनों में देश में पहला आधुनिक छापाखाना स्थापित किया. उनका नाम ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

वह शख्स जिसने देश का पहला आधुनिक प्रिंटिंग हाउस शुरू किया और कई भाषाओं में किताबें छापीं
उन्होंने छोटी प्रेस को आधुनिक तकनीक और सुविधाओं वाली बड़ी प्रेस में बदला और इसकी कई शाखाएं कई शहरों में स्थापित कीं
मिर्जा गालिब के प्रकाशक बने. कहना चाहिए कि उत्तर भारत में तब पढ़ने का चस्का उन्होंने पैदा किया

पता नहीं लखनऊ में अब किसी को उनका नाम भी मालूम होगा या नहीं. हालांकि यूपी की राजधानी में एक मार्ग उनके नाम पर भी है. उनका नाम मुंशी नवल किशोर था. उन्हें भारतीय प्रिंटिंग का प्रिंस कहा जाता है. एशिया का सबसे पुराना छापाखाना उन्होंने लखनऊ में स्थापित किया था. पहले छोटा और फिर खासा आधुनिक, जिसमें ब्लैक एंड व्हाइट से लेकर कलर तक एक से एक किताबें छपीं. आज उन्हीं नवल किशोर का जन्मदिन है.

वैसे तो भारत में प्रिंटिंग का इतिहास 1556 में शुरू होता है, जबकि पुर्तगाल से ईसाई मिशनरी ने गोवा में पहला प्रिंटिंग प्रेस लगाया था. इस प्रेस ने 1577 में एक पुर्तगाली किताब का तमिल अनुवाद छापा था. पहली बार तब कोई चीज भारतीय भाषा में प्रिंट हुई थी. लेकिन उसके बाद अगले 200 सालों तक भारत में किसी भारतीय ने प्रिंटिंग प्रेस की दुनिया में कदम नहीं रखा था. हालांकि यूरोप से व्यापारी भी भारत आकर कारोबार जमाने लगे थे. ईस्ट इंडिया कंपनी भी भारत में आकर टिक चुकी थी. दक्षिण में हालैंड और फ्रांस अपने उपनिवेश बनाने की होड़ में थे. मुगल दरबार में तब किताबें हाथ से कैलियोग्राफी करके ज्यादा लिखी जाती थीं.

आपके शहर से (लखनऊ)

नवल किशोर ने केवल 22 साल की उम्र में लखनऊ में ऐसा प्रिंटिंग व्यवसाय शुरू किया, जो समय के साथ फैला भी और आधुनिक होता गया. उनका छापाखाना बड़ा और आधुनिक तकनीक से लैस था. (फोटो – न्यूज18 ग्राफिक)

प्रिंट को ताकत बना दिया
18वीं सदी के आखिर तक भारतीयों को महसूस होने लगा कि मशीनें जो टैक्स्ट छापती हैं, उनकी अलग ताकत होती है. 19वीं सदी के मध्य में कई भारतीयों ने प्रेस लगाने शुरू किए. मुंशी नवल किशोर भारत में प्रिंट मीडियम के पायनियर थे. ना तो वह प्रसिद्ध लेखक थे और ना ही उन लोगों में जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ तब विद्रोह की मशाल जलाई थी. लेकिन उन्होंने लेखकों की किताबें और उन्हें जनता तक पहुंचाने का काम बखूबी किया. वह तब प्रिंट की एक ताकत बन गए थे.

प्रिंटिग को व्यावसायिक बनाया
उन्होंने प्रिंटिंग को भारत में कामर्शिलाइज किया और छपी किताबों को बहुत कम दामों में लोगों तक पहुंचाया जाति लोगों का ज्ञान बढ़े और साहित्य से लेकर विज्ञान तक में उनकी रुचि जगे. उनकी प्रेस ने ज्यादा चीजें हिंदी और उर्दू में छापीं, जो उस समय के लिहाज से एक बड़ा योगदान था. उन्होंने सही मायनों में देश की पहली बड़ी प्रेस लखनऊ में लगाई, इसका नाम था नवल किशोर प्रेस.

अलीगढ़ से जमींदार परिवार से ताल्लुक
नवल किशोर अलीगढ़ के उस अमीर भार्गव जमींदार परिवार से आते थे, जिनकी जागीर अलीगढ़ के सासनी में थी. उनके परिवार में उनके पुरखों ने मुगलों के यहां अच्छी हैसियत में नौकरियां की थीं. परिवार में संस्कृत पढ़ने लिखने की परंपरा थी. युवा नवल किशोर ने भी इसको अपनाया. चूंकि परिवार मुगलों से जुड़ा था तो जाहिर है कि फारसी भी उन्हें खूब आती थी. उन्होंने 1952 में आगरा कॉलेज में दाखिला लिया. उन्होंने वहां अंग्रेजी और फारसी पढ़ी.

1866 में नवल किशोर प्रेस ने रंगीन और कैलियोग्राफी वाली इस तरह की किताबें भी छापीं, जो तकनीक प्रिंटिंग के लिहाज से समय से आगे थी. (Source: BL Asian and African/Twitter)

अखबार में नौकरी से करियर शुरू
फिर 1954 में वह लाहौर चले गए. वहां उन्होंने कोह-ए-नूर प्रेस में नौकरी कर ली. जो तब पंजाब का पहला उर्दू अखबार कोह-ए-नूर छापता था. एक साल उन्होंने यहां अप्रेंटिसशिप की. और इसी काम ने उन्हें भविष्य में वो काम कराया जिसके वह इस देश में पायनियर बने.जब आगरा लौटे. अपना खुद का अखबार साफिर ए आगरा शुरू किया. और फिर लाहौर गए फिर वापस आगरा आ गए.

लखनऊ में प्रिंटिंग प्रेस लगाया
इस बीच उन्होंने ब्रितानियों का दिल जीता. वह 1958 में लखनऊ चले आए. इस शहर पर ब्रिटिश काबिज थे. शहर में उनकी मौजूदगी आर्थिक से लेकर सांस्कृतिक स्तर पर बदलाव कर रही थी. नवंबर में उन्होंने यहां ब्रिटिश अफसरों की मंजूरी से एक प्रेस लगाई. और उत्तर भारत का पहला उर्दू अखबार अवध अखबार निकालना शुरू किया. जल्दी ही अंग्रेज प्रशासन उन्हें प्रिंटिंग करने का काम बड़े पैमाने पर देने लगा. 1960 में उन्हें इंडियन पैनल कोड को उर्दू में छापने का काम मिला.

मिर्जा गालिब के भी प्रकाशक बने
इसके बाद तो वह किताबें छापने में लग गए. एक के बाद दूसरी किताब. इसी दौरान उन्होंने मिर्जा गालिब से संपर्क साधा और उनके प्रकाशन बने. 1869 में उनके प्रेस ने पहला उर्दू का नॉवेल छापा, जो नाजीर अहमद का लिखा था. इसी दौरान उन्होंने फैसला किया कि वो कुरान का संस्करण बहुत सस्ते दामों में छापेंगे. इसका दाम तब डेढ़ रुपए रखा गया लेकिन ये खूब बिकी और सामान्य मुस्लिमों तक भी पहुंच सकी.

लखनऊ में पता नहीं किसी को उनका नाम याद भी है या नहीं लेकिन लखनऊ के एक मार्ग का नाम उन पर जरूर है. (Source: Guzashta Lakhnau/Facebook)

कई भाषाओं में किताबें छापीं
अगर वह उर्दू की किताबें छाप रहे थे तो हिंदी की किताबें भी प्रकाशित करनी शुरू कीं. तुलसीदास की रामचरित मानस भी उनके प्रेस ने छापी, जो 1873 में 50,000 कापी बिकी. सुरदास की सूर सागर भी उनके प्रेस से छपी. 1880 में उनके प्रेस ने तुलसीदास का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया. 1870 के दशक के आखिर तक वह करीब 3000 किताबें छाप चुके थे, जो हिंदी, उर्दू, फारसी और संस्कृत में थीं. बहुत सी किताबें मराठी और बांग्ला में भी. ज्यादातर किताबें चाहें वो विज्ञान की हो या साहित्य उसे अंग्रेजी से भी अनुवाद करके छापा गया.

प्रिटिंग प्रेस की शाखाएं फैलाने लगे
1877 में उनके प्रेस से निकाला जा रहा अखबार दैनिक हो गया. नवल किशोर ने अपनी प्रेस की शाखाएं कानपुर, गोरखपुर, पटियाला और कपूरथला तक खोलीं. लंदन में एक एजेंसी स्थापित की. वह किताबों को प्रकाशित करने के साथ उनकी बिक्री करने का काम भी कर रहे थे. उनका प्रेस मार्केटिंग और एडवर्टाइजिंग में भी आगे था.यही नहीं उस जमाने के लिहाज से उनकी प्रेस ना केवल आधुनिक थी बल्कि नई तकनीक से लैस भी.

प्रिंटिंग बिजनेस को खासे मुनाफे में बदला
उत्तर भारत में कदम जमाने के बाद वह कोलकाता गए. वहां प्रेस खोला. कई किताबें छापीं. प्रिटिंग की दुनिया में तब उन्हें देश का राजा समझे जाने लगा था. इसके साथ साथ वह आगरा कालेज की कमेटी में थी. कई संस्थाओं, शिक्षा संस्थानों में संरक्षक की भूमिका निभाई. 1895 में उनका निधन हो गया. उनके द्वारा स्थापित प्रेस बिजनेस बहुत मुनाफा दे रहा था. उसने उस दौरान लोगों के पढ़ने की आदत को भी बढ़ाया. तब ज्यादातर लोग जो किताब पहली बार पढ़ते थे, वो नवल किशोर प्रेस से प्रकाशित हुई रहती थी.
बाद में भारत सरकार ने उन पर डाक टिकट निकाला. हालांकि उनके निधन के बाद नवल किशोर प्रेस का सितारा डूबने लगा. बाद में ये उनके उत्तराधिकारियों में बंट गई.

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