आज इस मशहूर डकैत के भाई का चुनाव प्रचार करेंगी प्रियंका गांधी

बुंदेलखंड के इलाके में इस डकैत की छवि रॉबिनहुड वाली है, जिससे उसके भाई और बेटे को राजनीति में सहायता मिलती है.

News18Hindi
Updated: April 29, 2019, 11:58 AM IST
आज इस मशहूर डकैत के भाई का चुनाव प्रचार करेंगी प्रियंका गांधी
डकैत ददुआ (फाइल फोटो)
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Updated: April 29, 2019, 11:58 AM IST
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी सोमवार को बांदा जिले में दस्यु सरगना ददुआ के भाई और पूर्व सांसद बाल कुमार पटेल के लिए चुनाव प्रचार करेंगीं. बाल कुमार पटेल पहले भी बुंदेलखंड से सांसद रह चुके हैं. हालांकि पटेल ने पिछले महीने ही सपा का हाथ छोड़कर कांग्रेस का हाथ थामा था.

कांग्रेस में शामिल होने से पहले पटेल ने दिल्ली जाकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी से मुलाकात की थी. बुंदेलखंड में उनका कुर्मी समुदाय के बीच अच्छा आधार माना जाता है.



बाल कुमार पटेल का इतिहास कैसा रहा है?
ददुआ के एनकाउंटर के बाद पहली बार बाल कुमार पटेल 2009 में मिर्जापुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे. 2014 लोकसभा चुनावों में भी सपा ने उन्हें टिकट दिया था. लेकिन मोदी लहर में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 2019 में अखिलेश यादव ने बाल कुमार पर भरोसा न दिखाते हुए बीजेपी से आकर सपा में शामिल हुए श्यामा चरण गुप्ता को उम्मीदवार घोषित कर दिया. इसके बाद बाल कुमार कांग्रेस में आ गए और अब कांग्रेस के उम्मीदवार हैं.

क्या थी ददुआ के आतंक की कहानी?
दुर्दांत दस्यु ददुआ का जुलाई, 2007 में STF ने अंत कर दिया था. बांदा, ललितपुर, चित्रकूट, भिंड, मुरैना और जालौन की सरजमीं पर ददुआ का आतंक करीब चार दशकों तक हावी रहा था. इस इलाके में ददुआ की छवि बिल्कुल रॉबिनहुड वाली थी. आज भी उसमें कुछ खास कमी नहीं आई है. यही कारण है कि कुछ साल पहले फतेहपुर के धाता ब्लॉक में उसकी मूर्ति लगाई गई थी और उसके भाई और पुत्र चुनावी राजनीति में प्रभावशाली बने हुए हैं.

ददुआ का असली नाम शिवकुमार पटेल था. वह चित्रकूट के देवकली गांव में पैदा हुआ था. 22 साल की उम्र में 8 लोगों की गोली मारकर हत्या करने के बाद वह डकैत बन गया और पाठा, बुंदेलखंड के जंगलों में रहने लगा. इन लोगों को ददुआ ने इसलिए मारा था क्योंकि इन्होंने उसके पिता की हत्या कर दी थी. पुलिस के पास ददुआ को मारने तक उसकी एक ढ़ंग की तस्वीर नहीं थी और उसे मारने के बाद उसकी लाश की शिनाख्त DNA रिपोर्ट के आधार पर की गई थी.
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कभी नहीं आया पुलिस के हाथ
इसके अलावा भी ददुआ के बारे में लोग बड़ी रुचि से यह बात भी बताते हैं कि वह जब तक जिया, कभी पुलिस के हाथ नहीं लगा और उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश पुलिस के लिए हमेशा सिरदर्द बना रहा. ददुआ का आतंक इतना बढ़ चुका था कि यूपी पुलिस ने उसे जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर सात लाख का ईनाम रख दिया था.

इसलिए ददुआ ने बनवाया था हनुमान मंदिर
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ददुआ के पुत्र, विधायक बन चुके वीर सिंह बताते हैं कि 1992 में एक दफे ददुआ इलाहाबाद, बांदा और फतेहपुर के संयुक्त पुलिस अभियान के दौरान गन्ने के खेतों में घेर लिया गया. उस ओर पुलिस के करीब 500 जवान थे तो ददुआ के पास सिर्फ 72 साथी थे. ददुआ ने उसी दौरान बच जाने पर हनुमान मंदिर स्थापना का प्रण लिया था और बचने पर 2004 में उसी जगह पर पंचमुखी हनुमान का मंदिर बनवाया.

क्या था ददुआ का कारोबार?
शुरुआत में ददुआ बीड़ी बनाने में काम आने वाले तेंदूपत्ते के कारोबार में गैरकानूनी तरीके से लगा. बाद में उसने सरकारी ठेकेदारों से कमीशन वसूलने का काम शुरू कर दिया. एनकाउंटर के वक्त तक राजनीति और राजनीतिज्ञों में उसकी खासी रुचि हो चुकी थी.

ददुआ को पहले बसपा के कुछ प्रभावशाली लोगों को संरक्षण प्राप्त था हालांकि बाद में उसका रुझान सपा की राजनीतिक की ओर हो गया. इसी बीच उसका बेटा सपा से ही जिला परिषद् अध्यक्ष बना. हालांकि इसके बाद 2007 में हुए यूपी के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत हुई और ददुआ पर पुलिस ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया. एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ददुआ और उसके गिरोह को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने 100 करोड़ रुपये खर्च किए थे.

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