जानिए कैसे बेहतर किस्म की दलहन पैदा करने में मदद कर सकेगा यह नया शोध

जानिए कैसे बेहतर किस्म की दलहन पैदा करने में मदद कर सकेगा यह नया शोध
पौधों में सूक्ष्मजीवों में अंतर करने की प्रक्रिया की जानकारी दलहन की फसलों के लिए मददगार हो सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

फलीदार पौधों (Legume plants) पर हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि पौधे लाभकारी और नुकसानदायक सूक्ष्मजीवों (Microbes) में अंतर कैसे करते हैं. इससे जेनेटिक इंजीनियरिंग में क्रांति आ सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 8, 2020, 1:48 PM IST
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पेड़ पौधे (Plants) चल फिर नहीं सकते लेकिन उनमें बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो इंसानों में नहीं होती है. पौधे लाभाकारी सूक्ष्मजीवों को पहचान सकते हैं और खराब, बुरे या अवांछनीय सूक्ष्मजीवों को खुद से दूर रख पाते हैं. ताजा शोध में पता चला है कि लेग्युमे पौधों (Legume plants) में यह क्षमता अणुओं के स्तर पर कैसे काम करती है. इससे जेनेटिक इंजीनियरिंग के क्षेत्र में बेहतर गुणों वाली दालों के उत्पादन में मदद मिल सकती है.

क्यों अहम होती है पौधें में यह खास क्षमता
पौधों में प्रतिरोधक क्षमता (Immune system) इंसानों के मुकाबले बहुत बेहतर मानी जाती है. यहां तक कि इनमें अपने दोस्त और दुश्मन पहचानने तक की क्षमता होती है. पौधों में सूक्ष्मजीवों की ऐसी पहचान करने की क्षमता उनके स्वस्थ उत्पादन और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए बहुत अहम है.

क्या होते हैं लेग्युमे पौधे
लेग्युमे पौधों वास्तव में फलीदार पौधे होते हैं. आमतौर पर इंसानों के लिए उपयोग मटर, सेम जैसे पौधे इस श्रेणी के पौधों में आते हैं. इन पौधों की खास बात यह होती है कि ये वायुमंडलीय नाइट्रोजन को एक सिमबायोटिक बैक्टीरिया (symbiotic bacteria) जिसे रोजोबिया (Rhizobia) कहते हैं, जो उनकी जड़ों में बड़ी तादात में जमा हो जाता है. इससे पौधे सटीक तौर पर बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों की पहचान कर उनसे बच पाते हैं.



क्या पता लगाया है वैज्ञानिकों ने
वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि कैसे ये फलीदार पौधे पैथोजेनिक और सिमबायोटिक सूक्ष्मजीवों के पैदा किए आणविक संकेतों को समझने के लिए रिसेप्टर प्रोटीन (Receptor proteins) में छोटे और स्पष्ट रूप से परिभाषित तरीके (Motifs) का उपयोग करते हैं.

यह खास क्षमता फलीदार पौधों में ही पाई जाती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)




जड़ों की कोशिका में होते हैं ये रिसेप्टर्स
फलीदार पौधे एक अलग तरह का रिसेप्टर प्रोटीन का उपयोग करते हैं जो उनकी जड़ों के कोशिकाओं की बाहरी सतह पर होते हैं. साइंस जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में आरहुस यूनिवर्सटी के अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम ने दर्शाया कि रोगजनक या सहजीवी संकेतक अणुओं की पहचान करने का काम रिसेप्टर्स पर छोटे अणुओं के मोटिफ्स के जरिए होता है जो सुरक्षा अथवा सहजीवन के संकेतो को निर्देशित करते हैं.

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यह थी इस शोध की खास पड़ताल
जमीन पर पाये जाने वाले सभी पौधों में LysM रिसेप्टर होता है जो बहुत से सूक्ष्जीवी संकेतों की पहचान करने में सक्षम होता है, लेकिन पौधा यह कैसे तय करता है कि इस पर सहजीवी की तरह या फिर एक रोगजनक जीवी के तौर पर बर्ताव करना है, यह अभी तक पता नहीं था.

यूं पता लगाई प्रक्रिया
फिज डॉट ओआरजी को जोल्टन बाजोस्की ने बताया, “हमने बहुत ही साधारण सरल और नादान से सवाल से शुरुआत की. क्या हम उसी तरह के रिसेप्टर्स का उपयोकर उन अहम तत्वों की पहचान कर सकते हैं, यदि हम व्यवस्थित विशलेषण के लिए विपरीत क्रिया का उपयोग करें? वहीं काइरा जाइजिल ने बताया, “नोड फैक्टर रिसेप्टर की पहली क्रिस्टल संरचना एक बड़ी उपलब्धि थी जिससे हमें इन रिसेप्टर्स के बारे में बेहतर समझ हासिल हुई. इसी से हमें इन्हें दूसरे पौधों में डालने में प्रयास करने के लिए दिशा मिली.”

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यह शोध पौधों में अतिरिक्त प्रतिरोधक क्षमता पैदा करने में मददगार होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


यह शोध शोधकर्ताओं को प्रतिरोधी रिसेप्टर्स को सहजीवी रिसेप्टर्स में पुनःपरिभाषित करने में मददगार होगा. यह जेनेटिक इंजिनियरिंग के क्षेत्र में दलहन के पौधों में नाइट्रोजन फिक्सिंग सहजीवी प्रक्रिया पैदा करने के दिशा में पहले कदम होगा.

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इस पड़ताल से शोधकर्ताओं को इम्यून रिसेप्टर्स को सिम्बायोटिक रिसेप्टर्स में बदलने मदद मिल सकेगी. यह शोध दलहनों उत्पादन को बढ़ाने और उनक गुणवत्ता बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है. वैज्ञानिकों का लक्ष्य हैं कि जो क्षमता इन लेग्युमे पौधों में है वह अगर दलहन के पौधों में आ जाए तो इससे उनके लिए अनावश्यक रासायनिक खाद के उपयोग करने की जरूरत खत्म हो जाएगी.
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