#MISSIONPAANI : अगली पीढ़ी को क्यों पंजाब में मिलेगा रेगिस्तान?

#DigitalPrimeTime : हाल के दिनों में पंजाब की हालत ऐसी हो गई है कि पंजाब में सिंचाई के लिए पानी की बेहद किल्लत है. कई इलाकों का भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है. पंजाब में पानी के हालात के पीछे के कारणों और आने वाले खतरों को टटोलती रिपोर्ट.

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: July 10, 2019, 9:00 PM IST
Vivek Anand | News18Hindi
Updated: July 10, 2019, 9:00 PM IST
पंजाब का नाम सुनते ही आपके दिमाग में क्या कौंधता है? शायद पंजाब का नाम लेते ही ज्यादातर लोगों के मन में जो तस्वीर बनती है, वो है- खेत-खलिहान, हरियाली, हरे-भरे बाग-बगीचे, धान और गेहूं की लहलहाती फसलें, सरसों के पीले फूल से सजे खेत. पंजाब मतलब देश का सबसे खुशहाल प्रदेश. पंजाब जिसके नाम का मतलब ही है- पं मतलब पांच और आब मतलब पानी.

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पांच नदियों के पानी वाला क्षेत्र है पंजाब और वो पांच नदियां हैं- झेलम, चेनाब, रावी, व्यास और सतलज. जिस राज्य का नाम ही पानी के ऊपर पड़ा हो वहां पानी की क्या कमी होगी? लेकिन क्या सच में ऐसा है. हकीकत बेहद डरावनी है. पंजाब का पानी खत्म होता जा रहा है. जिस प्रदेश का नाम ही पांच नदियों के पानी के ऊपर रखा गया, अब वो बूंद-बूंद पानी के लिए तरसने वाला है.

जिस प्रदेश की खुशहाली के पीछे साठ के दशक की हरित क्रांति का हाथ था. जिसने राज्य के किसानों की किस्मत बदल दी. इसमें प्रदेश में पानी की प्रचूरता का बड़ा हाथ था. अब वो पानी सूख चुका है. इस स्तर तक सूख चुका है कि राज्य के कई इलाके डार्क जोन में चले गए हैं. पानी वाला प्रदेश अब बिन पानी सब सून की स्थिति में आ चुका है.

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कैसे बदली पानी वाले प्रदेश की स्थिति
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सबसे पहले तो भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद चेनाब और झेलम नदियों का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के पंजाब के साथ चला गया. पंजाब में सतलज, ब्यास और रावी नदियां ही सिंचाई का साधन हैं. एक वक्त ऐसा था जब पंजाब में नहरों का जाल बिछा था. सिंचाई के लिए किसानों को पानी की कोई कमी नहीं थी. आज नहरें सूख चुकी हैं. नदियों की हालत अच्छी नहीं रही. एक के बाद पंजाब के इलाकों में पानी का संकट पैदा होता जा रहा है.

पानी के लिए जा रही है किसान की जान

आज के वक्त में पंजाब में सिंचाई का सबसे बड़ा साधन है ट्यूबवेल. लेकिन भूजल के अत्यधिक दोहन की वजह से पंजाब के कई हिस्सों का भूजल स्तर काफी नीचे जा चुका है. हालात कितने खराब इसके लिए 2018 का एक उदाहरण सुन लीजिए. संगरूर के एक किसान मनवीर सिंह ने अपने खेतों की सिंचाई के लिए ट्यूबवेल लगवाने की सोची. जहां पहले 50-60 फीट पर पानी निकल आता था. वहां ट्यूबवेल के लिए अब सैकड़ों फीट का बोरवेल करना पड़ रहा है.

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पंजाब के कई इलाके डार्क जोन में चले गए हैं


 

ट्यूबवेल लगवाने के लिए मनवीर सिंह को 4 लाख का कर्ज लेना पड़ा. लाख जतन करने के बाद भी मनवीर 4 लाख का कर्ज नहीं चुका पा रहा था. परेशान मनवीर ने एक दिन फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. खेतों की सिंचाई के लिए पानी का इंतजाम करना इतना महंगा हो चुका है कि किसान जान देने लगे हैं.

पंजाब के संगरूर में सिंचाई के पानी के लिए पहले ट्यूबवेल की जरूरत नहीं थी. नहरों से हफ्ते में एक बार सिंचाई का पानी मिल जाया करता था. लेकिन अब नहरें सूख चुकी हैं. संगरूर जिला पंजाब के डार्क जोन में आ चुका है. ऐसा इलाका जहां भूजल स्तर 200 फीट से नीचे चला गया हो. संगरूर के ज्यादातर गांवों में ग्राउंड वाटर का लेवल 350 से 500 फीट नीचे चला गया है. किसानों को इतने नीचे लेवल पर गए पानी के स्तर में ट्यूबवेल लगवाने में 5 से 7 लाख रुपए का खर्च करना पड़ रहा है.

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पंजाब में पानी को लेकर कानून तक बनाना पड़ा है


20-25 साल में रेगिस्तान बन जाएगी पंजाब की धरती

सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की एक रिपोर्ट ने खतरनाक जानकारी दी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक जितनी तेजी से पंजाब की धरती के नीचे से पानी गायब होता जा रहा है, वो दिन दूर नहीं जब पंजाब की धरती रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगी. अभी 1 हजार फीट की गहराई तक पानी के जो भी रिसोर्सेज हैं, वो अगले 20-25 साल में सूख चुके होंगे. ये रिपोर्ट अलार्मिंग है.

सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के 138 ब्लॉक में से 110 ब्लॉक में भूजल का अत्यधिक इस्तेमाल हो रहा है. यहां भूजल के स्तर को बनाए रखने की सख्त जरूरत है लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

नब्बे के दशक में हुई दिक्कत की शुरुआत

नब्बे के दशक में पंजाब सरकार ने सिंचाई के लिए बिजली के इस्तेमाल में किसानों को सब्सिडी देनी शुरू की थी. इसके बाद किसानों में ट्यूबवेल के जरिए सिंचाई की परंपरा बढ़ती ही चली गई. नब्बे के दशक के पहले 42 फीसदी खेतों में सिंचाई के लिए नहर के पानी का इस्तेमाल होता था. अब 72 फीसदी खेतों की सिंचाई के लिए ट्यूबवेल का सहारा लिया जाता है और नहरों के पानी के जरिए सिर्फ 28 फीसदी खेतों की सिंचाई होती है.

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पंजाब के कई इलाकों में भूजल का स्तर 350 से 500 फीट नीचे चला गया है


1980 में पंजाब में ट्यूबवेल की संख्या 1 लाख 90 हजार थी जो कि 2015-16 में बढ़कर 14 लाख हो चुकी है. इसमें 12 लाख ट्यूबवेल बिजली के जरिए चलती है और बाकी के ट्यूबवेल डीजल इंजन के जरिए.

सिंचाई के लिए परेशान हो रहे पंजाब के किसान

भूजल का स्तर किस तरह से नीचे गिरा है, इसे लुधियाना के एक उदाहरण के जरिए समझा जा सकता है. 1982 में लुधियाना 20 फीट पर पानी निकल आता था. 10 साल बाद ट्यूबवेल के लिए 35 फीट तक की बोरिंग की जाने लगी. लेकिन 10 वर्षो में भूजल का स्तर सिर्फ 15 फीट नीचे गिरा था. आज ट्यूबवेल लगाने के लिए 400 फीट गहरी बोरिंग करनी पड़ रही है. इतने गहरे से पानी निकालने के लिए ट्यूबवेल लगाने का खर्च बढ़कर 7 लाख तक हो गया है.

हरित क्रांति पंजाब में फसलों की बहार लेकर आया. पंजाब में धान, गेहूं, मक्का, दालें और सब्जियों का उत्पादन में जानदार वृद्धि हुई. लेकिन लगातार फसलों के उत्पादन के लिए पानी का इस्तेमाल भी बढ़ा. इसलिए सिंचाई के नए साधन भी अपनाने पड़े. सिंचाई के लिए ट्यूबवेल पर निर्भरता बढ़ती ही गई. इसकी वजह से भूजल का स्तर लगातार नीचे गिरता गया. मोहाली में कई जगहों पर भूजल का स्तर 800 फीट नीचे तक चला गया है.

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पानी की कमी की वजह से धान की खेती का टाइम अप्रैल-मई से बढ़ाकर जून-जुलाई कर दिया गया है


पानी के लिए पंजाब सरकार को कानून तक बनाने पड़े

2009 में भूजल के स्तर को बनाए रखने के लिए पंजाब सरकार ने एक फैसला लिया. सरकार ने धान की बुआई के लिए पानी की जरूरत मानसून के पानी से पूरी करने की अपील की. पहले पंजाब के किसान रबी की फसल के तुरंत बाद अप्रैल-मई से ही धान की बुआई शुरू कर देते थे. इसके लिए वो ट्यूबवेल से सिंचाई का सहारा लिया करते थे. अब धान की बुआई का समय बढ़ाकर जुलाई-अगस्त कर दिया गया है. ताकि ट्यूबवेल पर निर्भरता कम हो और भूजल का स्तर बना रहे. पंजाब सरकार इस पर कानून तक बना चुकी है.

लेकिन समस्या का अंत नहीं है. मोटे तौर पर एक किलो धान उपजाने के लिए करीब साढ़े पांच हजार लीटर पानी की जरूरत होती है. किसान बताते हैं कि पहले यहां मई के महीने के अंत से ही बारिश होनी शुरू हो जाती थी. मानसून का मूड भी बदला है. बारिश नियमित नहीं होती. बारिश के पानी के लिए जुलाई तक इंतजार करना पड़ता है.

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पंजाब अब पहले जैसा खुशहाल नहीं रहा


पंजाब का पानी बना रहा कैंसर का मरीज

पंजाब में पानी कम ही नहीं हुआ है. पंजाब का पानी जहरीला भी हुआ है. खाद और कीटनाशक के अत्यधिक इस्तेमाल से भूजल प्रदूषित हुआ है. पानी में आर्सेनिक की मात्रा पाई जाने लगी है. नाइट्रेट और सल्फेट की मात्रा बढ़ी है. ऐसे जहरीले पानी की वजह से कैंसर जैसी भयानक बीमारी फैल रही है. मालवा क्षेत्र में कैंसर के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है. इसकी सबसे बड़ी वजह जहरीला पानी ही है.

यहां के कैंसर के रोगियों में इतना इजाफा हुआ है कि इस रूट से गुजरने वाली एक ट्रेन का नाम ही कैंसर ट्रेन रख दिया गया है. अबोहर से बीकानेर जाने वाली सवारी गाड़ी को कैंसर ट्रेन का नाम दिया गया है. क्योंकि इस ट्रेन से इलाके के कैंसर मरीज बीकानेर के चैरिटेबल कैंसर अस्पताल में इलाज कराने जाते हैं. पंजाब जिसका नाम ही पानी पर है. अब वो पानी के लिए मर रहा है. पानी की वजह से मर रहा है.

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First published: July 10, 2019, 9:00 PM IST
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