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क्या शुक्रग्रह के फॉस्फीन पाए जाने वाले शोध में हो गई थी चूक?

वैज्ञानिकों ने बताया कि शुक्रग्रह (Venus) पर फॉस्फीन (Phosphine) की मौजूदगी की खोज में कहां गलती हो गई थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
वैज्ञानिकों ने बताया कि शुक्रग्रह (Venus) पर फॉस्फीन (Phosphine) की मौजूदगी की खोज में कहां गलती हो गई थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

शुक्रग्रह (Venus) पर पिछले साल फॉस्फीन (Phosphine) के होने के संकेत मिलना का दावा गलत साबित हो गया है. दरअसल सल्फर डाइऑक्साइड (Sulphur dioxide) के संकेत हैं जिसका जीवन से कोई संबंध नहीं है

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 28, 2021, 7:06 PM IST
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क्या शुक्रग्रह (Venus) पर वाकई फॉस्फीन (Phosphine)  की मौजूदगी है? पिछले साल सितंबर में यूके के खगोलविदों की एक टीम ने शुक्र ग्रह के घने बादलों में फॉस्फीन नाम के रसायन की मौजूदगी की उपस्थिति पाए जाने की घोषणा की थी. यह घोषणा पृथ्वी के दो रेडियो टेलीस्कोप (Radio Telscope) के अवलोकनों के आधार पर की गई थी जिससे बहुत से शुक्र ग्रह के विशेषज्ञ हैरान रह गए थे. हालिया अध्ययन ने साबित किया है कि दरअसल फॉस्फीन से मिले संकेत किस और पदार्थ के हैं जो शुक्र पर बहुत ज्यादा मात्रा में हैं और जिसका जीवन से कोई लेना देना नहीं है.

लोगों में जगा था कौतूहल
पृथ्वी के वायुमंडल में फॉस्फीन की बहुत ही कम मात्रा है और वह भी जीवन प्रक्रियाओं के जरिए पैदा होती है. लेकिन शुक्र ग्रह जहां के हालात जीवन के लिए बहुत ही प्रतिकूल हैं फॉस्फीन का पाया जाना लोगों में बहुत कौतूहल जगा गया था. जहां के वातावरण को हेलस्केप कहा जाता है.  जबकि एसिड के बादलों में जीवन के उम्मीद की किरण दिखाई दी थी.

फिर से किया गया अध्ययन
इस खोज पर कई विशेषज्ञों संदेह जाहिर भी किया था. अब यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन के शोधकर्ताओं ने शुक्र ग्रह के वायुमंडल के हालातों का एक मजबूत मॉडल बनाया है जिससे वे रेडियो टेलीस्कोप के अवलोकनों का फिर से आंकलन कर सकें और फॉस्फीन की मौजूदगी के दावे की पड़ताल कर सकें.



फॉस्फीन नहीं कुछ और ही
इस अध्ययन की रिपोर्ट एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित होने के लिए स्वीकृत हो चुकी है. इस रिपोर्ट के अनुसार यूके शोधकर्ताओं की अगुआई में फॉस्फीन की खोज गलत थी. वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में एस्ट्रोनॉमी की प्रोफेसर और इस अध्ययन की सह-लेखिका विक्टोरिया मीडोज ने बताया, “शुक्र ग्रह के बादलों में फॉस्फीन की मौजूदगी के बजाय, आंकड़े किसी और विकल्प की ओर इशारा कर रहे हैं. वे सल्फर डाइ ऑक्साइड की खोज कर रहे थे. सल्फर डाइऑक्साइड शुक्र के वायुमंडल पर तीसरा सबसे ज्यादा पाया जाने वाला रासायनिक पदार्थ है और उसे जीवन के संकेतों में शामिल नहीं किया जाता है.”

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शुक्रग्रह (Venus) पर जीवन के हालात फिलहाल बहुत ही प्रतिकूल हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


सल्फर डाइऑक्साइड
इस ताजा अध्ययन में नासा के वैज्ञानिक भी शामिल हैं. टीम ने दर्शाया कि सल्फर डाइऑक्साइड के जरिए न केवल अवलोकनों की सही व्याख्या कर सकती है बल्कि यह उस जानकारी से भी मेल खाती है जो खगलोविदों के पास अब तक मौजूद है.  शोधकर्ताओं ने दर्शाया कि शुरुआती संकेत जो आए थे वे ग्रह की सतह से नहीं बल्कि शुक्र के ऊपरी वायुमंडल से आए थे जहां फॉस्फीन तो कुछ क्षणों में नष्ट हो जाएगा.

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केवल रेडियो संकेतों पर आधरित
इससे इस मत को बल मिलती है कि सल्फरडाइऑक्साइड ने ही संकेत पैदा किए थे. दोनों तथाकथित फ़ॉस्फीन के संकेत और नया आंकलन रडियो संकेतों पर आधारित है. लेकिन खगोलविद किसी ग्रह पर मौजूद किसी रसायन का अंदाजा वैज्ञानिक वहां से निकले विकरणों के आधार पर करते हैं जिसमें रेडियो, एक्स रे, और दिखाई देने वाला प्रकाश शामिल होता है.

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शुक्रग्रह (Venus) पर फॉस्फीन (Phosphine) की मौजूदगी कुछ पलों के लिए भी मुमकिन नहीं है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


ये संभवना हो सकती थी
साल 2017 में जेम्स क्लर्क मैक्सवेल टेलीस्कोप के जरिए यूके की टीम शुक्र से 266.94 गीगाहर्ट्ज के रेडियो उत्सर्जन पकड़े थे. फॉस्फीन और सल्फर डाइऑक्साइड दोनों ही इस फ्रीक्वेंसी के पास की रेडियो तरंगों को अवशोषित करती हैं. 2019 में इसी टीम ने आल्मा टेलीस्कोल के अवलोकन से पता चला कि 266.94  फ्रीक्वेंसी वाली सल्फर डाइऑक्साइड की मात्रा स्रोत में कम होगी. जिससे उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह संकेत फॉस्फीन से आ रहे हैं.

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शोधकर्ताओं ने पाया की फ़ॉस्फीन जैसे संकेत शुक्र के वायुमंडल से नहीं बल्कि शुक्र के मीजोस्फियर से आ रहे हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि मीजोस्फियर में फॉस्फीन और  ज्यादा अस्थिर होता है. उन्होंने यह भी पाया कि आल्मा के आंकड़ों  का गलत अनुमान लगाया गया. जिसकी वजह स्पैक्ट्रल लाइन डायलूशन प्रक्रिया थी जो आल्मा में एक साइड इफेक्ट का नतीजा था.
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