वो बेखौफ हिंदुस्तानी रानी, जो दुनिया की पहली वैक्सीन के लिए बनी मॉडल

राजकुमारी देवाजम्मन्नी राजपरिवार की दूसरी स्त्रियों के साथ- दाएं (Photo-instagram)
राजकुमारी देवाजम्मन्नी राजपरिवार की दूसरी स्त्रियों के साथ- दाएं (Photo-instagram)

पेंटिंग में इस खूबसूरत रानी ने साड़ी का पल्ला थोड़ा-सा ऊपर उठाया हुआ है. इतिहासकारों के मुताबिक ये अंग्रेजी हुकूमत के दौरान चेचक के टीके के लिए की गई पहली मॉडलिंग (modelling for smallpox vaccine) थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 20, 2020, 6:34 PM IST
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कोरोना की दूसरी लहर के बीच (second wave of coronavirus) वैक्सीन जल्दी से जल्दी लाने की कोशिश हो रही है. इस बीच एक तबका वैक्सीन का विरोध कर रहा है. एंटीवैक्सर्स के नाम से इस समुदाय को वैक्सीन पर अलग-अलग वजहों से एतराज है. ऑस्ट्रेलिया के एक इमाम ने इसे हराम कहते हुए मुसलमानों से टीका न लगवाने को कहा. इस बीच दक्षिण भारत की उन रानियों की कहानी सामने आई है, जिन्होंने दुनिया की सबसे पहली वैक्सीन के लिए मॉडलिंग की. साल 1805 के आसपास की ये पेंटिग बताती है कि कैसे रानी होने के बाद भी जनता की जरूरत को समझते हुए उन्होंने टीके का निशान दिखलाते हुए अपनी पेंटिंग बनवाई होगी.

ये कहानी है राजकुमारी देवाजम्मन्नी (Devajammani) की, जो साल 1805 में लगभग 12 साल की उम्र में मैसूर राजपरिवार पहुंचीं. उनकी कृष्णराज वाडियार तृतीय (Krishnaraja Wadiyar III) से शादी हो रही थी. इसके बाद ही रानी देवाजम्मन्नी को एक नई भूमिका मिली. नई-नवेली रानी ने तब ईस्ट इंडिया कंपनी के अनुरोध पर चेचक के टीके लिए अपनी पेंटिंग बनवाई.

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जैसा कि बीबीसी की एक रिपोर्ट में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के डॉ. निगेल चांसलर मानते हैं कि ये मॉडलिंग टीके को भारत में प्रोत्साहित करने के लिए मकसद से कराई गई होगी. असल में तब चेचक का टीका काफी नया था और एक अंग्रेज डॉक्टर एडवर्ड जेनर की ही खोज था. ऐसे में देश के लोग वैक्सीनेशन प्रोग्राम को शक की नजर से देखते थे. साथ ही साथ बहुतों को ये शक भी था कि टीका लगवाना धर्म के खिलाफ हो सकता है.
तब देश में चेचक के कारण काफी भयावह हालात थे- सांकेतिक फोटो


इस संदेह को कम करने में अंग्रेजों की मदद की वाडियार राजपरिवार ने. इस राजपरिवार पर अंग्रेजी हुकूमत की खास कृपा थी और उन्हें लगभग 3 दशकों तक सत्ता से दूर रहने के बाद अंग्रेजों की मदद से दोबारा गद्दी मिली थी. ऐसे में वे अंग्रेजों का अनुरोध नहीं ठुकरा सके.

कैनवास पर बनी ये ऑइल पेंटिंग उस दौर के लिहाज से काफी साहसिक कोशिश मानी जा सकती है. इसमें छोटी रानी देवाजम्मन्नी तस्वीर में दाहिनी तरफ दिखती हैं. वे अपनी सफेद-धूसर साड़ी का पल्ला ऊपर को उठाए हुए हैं. तस्वीर को देखने पर साफ पता चलता है कि साड़ी का पल्ला नीचे की तरफ हुआ करता था लेकिन इसे जानकर उठाया गया. इस तरह से रानी देवाजम्मन्नी रानी की गरिमा खोए बगैर वैक्सिनेशन का महत्व बता रही हैं.

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बाईं ओर की महिला, जो कि राजा की बड़ी रानी हैं, उनकी नाक के नीचे और चेहरे के दूसरे हिस्से कुछ बदरंग से लग रहे हैं. ये चेचक का असर रहा होगा, जो उतना भयंकर नहीं हो सका. यानी ये रानी भी एक तरह से चेचक के टीके को प्रमोट ही कर रही हैं.

डॉ. चांसलर ने रानियों की मॉडलिंग की अपनी बात को पुख्ता करने के लिए कई जांचें कीं. उनकी ये सारी बातें साल 2001 में एक आर्टिकल के तौर पर छपीं. पेंटिंग की तारीख राजा वाडियार की शादी की तारीख के आसपास की थी. साथ ही कोर्ट का एक रिकॉर्ड भी मिला, जो बताता है कि साल 1806 में रानी देवाजम्मन्नी के टीका लगवाने के कारण दूसरे लोगों पर कितना शानदार असर हुआ और वे भी वैक्सिनेशन के लिए सामने आए. जिस कलाकार थॉमस हिकी ने पेंटिंग बनाई थी, उसने वाडियार राजपरिवार के दूसरे सदस्यों की भी पेंटिंग बनाई थी. इससे भी डॉ. चांसलर की मॉडलिंग थ्योरी को बल मिला.

Devajammani
कैनवास पर बनी ये ऑइल पेंटिंग उस दौर के लिहाज से काफी साहसिक है (Photo-instagram)


अंग्रेजों ने वाडियार राजा की काफी मदद की थी. ये साल 1799 के आसपास की बात होगी, जब उन्होंने मैसूर के ताकतवार राजा टीपू सुल्तान को हराया और गद्दी पर वाडियार्स को बिठा दिया. इस मदद के बदले अंग्रेजी हुकूमत ने वैक्सिनेशन प्रोग्राम को बढ़ावा देने की बात की होगी. इतिहासकार प्रोफेसर माइकल बेनेट ने भी भारत में चेचक के खिलाफ लड़ाई में इस बात का जिक्र किया है. उनकी किताब वार अगेंस्ट स्मेलपॉक्स (War Against Smallpox) में इसका जिक्र है. तब देश में चेचक के कारण काफी भयावह हालात थे. चेहरे से लेकर पूरे शरीर पर इसका प्रकोप रहता था और कई बार आंखें तो कई बार मरीज की जान चली जाती थी. तब पूजा-पाठ के जरिए इसकए इलाज का चलन था. ऐसे में चेचक का टीका लाना हिंदुस्तानी आस्था से खिलवाड़ हो सकता था और ईस्ट इंडिया कंपनी खतरे में आ सकती थी.

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यही सब सोचकर अंग्रेजों ने उन राजपरिवारों से मदद की अपील की, जो उनके साथ किसी भी वजह से दोस्ताना थे. वाडियार्स ऐसे ही राजाओं में से थे. हालांकि तब अंग्रेज जनता के खौफ के मारे अधिकतर मामलों में उनका रिकॉर्ड नहीं रखते थे, जिन्हें टीका दिया जाता था. वाडियार रानी का रिकॉर्ड तो है लेकिन ये पता नहीं चल सका कि उन्हें किस फॉर्म में टीका दिया गया था. रानी की इस मॉडलिंग का काफी सकारात्मक असर रहा. साल 1807 तक एक मिलियन से अधिक वैक्सीन लगाई जा चुकी थीं.

चित्र के बीच में जो महिला है, वो वाडियार कुल की रानी लक्ष्मी अमानी हैं. वे राजा की दादी लगती थीं. रानी ने चेचक से ही अपने पति को खो दिया था, जिसके बाद से वे इसके इलाज के बारे में सोचने लगीं. माना जाता है कि रानियों को टीका लगाने और उसकी मॉडलिंग के लिए प्रोत्साहित करने में इन्हीं का सबसे बड़ा हाथ रहा होगा.
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